पाकिस्तान: उथलपथल और ख़ूनख़राबे का साल

Image caption पाकिस्तान में बम धमाके आम बात हो गई है

पाकिस्तान में इस साल शुरु हुए आत्मघाती हमले साल के अंत तक बदस्तूर जारी हैं. अब ये भारत की सीमा के बहुत नज़दीक तक पहुंच गए हैं. दूसरी ओर सरकार की चरमपंथियों के ख़िलाफ़ मुहिम भी जारी है.

राजनीतिक स्तर पर पाकिस्तान में ये साल उथलपुथल रही.

राजनयिक स्तर पर जिस कड़वाहट से भारत के साथ रिश्तों का आगाज़ हुआ था, अंत भी लगभग वैसे ही माहौल में हुई.

साल की शुरुआत इस स्वीकारोक्ति के साथ हुई कि 26 नवंबर के मुंबई हमलों के पीछे मुख्य अभियुक्त अजमल कसाब पाकिस्तानी नागरिक हैं.

तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद दुर्रानी को ये स्वीकार करने पर अपनी नौकरी से हाथ गंवाना पड़ा.

फरवरी में पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने नवाज़ शरीफ़ और उनके भाई शहबाज़ शरीफ़ के चुनाव लड़ने पर पाबंदी बरक़रार रख राजनीतिक बवाल को जन्म दे डाला.

इधर देश भर में मुहिम चली मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिकार चौधरी और अन्य जजों की बहाली की.

देश भर से लोग राजधानी इस्लामाबाद की ओर बढ़ने लगे और दबाव में आई ज़रदारी सरकार को इफ़्तिकार गिलानी की बहाली की घोषणा करनी पड़ी.

लेकिन सबसे गंभीर बात ये थी कि चरमपंथियों ने पूरे पाकिस्तान में अपने पाँव पसार लिए थे.

क्रिकेट पर भी इसकी काली छाया पड़ी. खराब सुरक्षा स्थिति के मद्देनज़र कोई भी देश पाकिस्तान क्रिकेट खेलने नहीं आना चाह रहा था.

श्रीलंका ने हिम्मत और दोस्ती के नाते दौरा किया पर लाहौर में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर हमला हुआ और कुछ खिलाड़ी भी घायल हुए.

हमले और दहशत

पाकिस्तान के लिए हमलों और दहशत के सिलसिले की मानो शुरुआत हो गई थी.

Image caption पाकिस्तानी सेना भी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़े हुए है

मार्च के अंत में भारतीय सीमा से 50 किलोमीटर की दूरी पर, लाहौर के मनावन स्थित पुलिस अकादमी में सुबह हमला हुआ.

तालेबान नेता बैतुल्ला महसूद ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली.

इस बीच स्वात घाटी में लड़कियों के स्कूल तालेबान में बंद करने शुरु किए, कुछ को बमों से उड़ा दिया.

पाकिस्तान सरकार ने पहले तो तालेबान से शांति समझौता किया, शरिया लागू करने और सैन्य कार्रवाई रोकने का वादा किया. लेकिन बावजूद इसके सब कुछ ठीक ठाक नहीं रहा.

अप्रैल में सरकार ने कहा कि वो तालेबान से लड़ेगी. स्वात ऑपरेशन की घोषणा के साथ ही शुरु हुआ मानवीय त्रासदी का सिलसिला.

इस बीच अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान पर अपनी सरकार की नई नीति की घोषणा की.

उन्होंने अल कायदा और तालेबान से निपटने के लिए पाकिस्तान की मदद का वादा किया.

साथ ही केरी लूगर बिल के सहारे पाकिस्तान को डेढ़ अरब डॉलर अगले पांच वर्षों तक देने की घोषणा की.

ये पैसा पाकिस्तान के लोकतंत्र, सड़कों, अस्पतालों के लिए इस्तेमाल होना है.

पर केरी लूगर की सौगात भी पाकिस्तानी नागरिकों को पसंद नहीं आई.

उनको डर था कि इसके साथ की शर्तें देश की संप्रभुता पर सीधा आघात है और ज़रदारी सरकार ने देश के हितों को गिरवी रख दिया है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संसद में नाराज़गी साफ़ तौर पर व्यक्त की और ये दिखाने की कोशिश भी कि अमरीका को पाकिस्तान के लोकतंत्र की इज़्जत करनी चाहिए.

पर इस सब में सेना को सफलताएं भी मिली.

पाकिस्तान तालेबान प्रमुख बैतुल्ला महसूद के मारे जाने की खबरें आईं पर स्थिति कई दिनों तक स्पष्ट नहीं हो सकी.

हकीमुल्ला महसूद ने आते ही तालेबान के ख़तरनाक इरादों का परिचय देना शुरु किय़ा.

हमले पर हमले शुरु हुए और वो भी ऐसे जो प्रशासन को ये संदेश दे रहे थे कि उनकी ताकत बरक़रार है.

रोज़ाना हमले

दिन पर दिन ऐसे हमले पाकिस्तान की सरकार को भी हिला रहे थे.

Image caption पाकिस्तान में विवादास्पद विधेयक समाप्त होने से भ्रष्टाचार के मामले फिर शुरू हो गए हैं

रावलपिंडी में फौज के मुख्यालय पर कथित तालेबान लड़ाकू आए और छह सैनिकों को गोलीबारी कर उन्होंने मार गिराया.

लोग देखते रह गए कि कैसे सेना मुख्यालय भी हमले से नहीं बच पाया. और ऐसे हमलों की ख़बर हर दूसरे दिन सुनाई पड़ने लगे.

पेशावर में कई हमले हुए और अक्तूबर के अंत में मीना बाज़ार में सौ से ज़्यादा लोग मारे गए.

लंबे इंतज़ार और कई घोषणाओं के बाद पाकिस्तान सरकार ने दक्षिणी वज़ीरिस्तान में आख़िर सैन्य कार्रवाई शुरु की.

पर क्या इतनी घोषणाओं ने तालेबान को वहां से हटने का मौक़े तो नहीं दिया ये सवाल ज़रुर बना रहेगा.

और साल का अंत आते आते एक बड़ा राजनीतिक धमाका हुआ.

पाकिस्तान की एक अदालत ने उस विवादास्पद अध्यादेश को अवैध क़रार दिया है जिसके तहत वहां के कई राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज भष्ट्राचार के मामले ख़त्म हो गए थे.

नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के नाम से प्रचलित इस क़ानून के लाभ उठाने वालों में राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी, गृह मंत्री रहमान मलिक, कई अन्य मंत्री, वरिष्ट नेता और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं.

यानि पूरे वर्ष पाकिस्तान में खूनखराबे और अस्थिरता का माहौल रहा.

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