एलटीटीई के बाद संघर्ष का नया दौर

चुनाव प्रचार
Image caption संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति राजपक्षे की पार्टी की जीत की संभावना

श्रीलंका में क़रीब ढाई दशक तक चले गृहयुद्ध के बाद पिछले साल तमिल विद्रोहियों का जहाँ सफ़ाया हो गया, वहीं सिंहली समुदाय से आने वाले राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे दिन-प्रतिदिन मज़बूत होते चले गए.

अब जबकि गुरुवार को होने वाले संसदीय चुनाव में उनकी पार्टी की जीत तय मानी जा रही है, बहुत से अल्पसंख्यक तमिल अपने भविष्य को लेकर बहुत आशंकित हैं.

हिंदुओं के प्रसिद्ध नेल्लूर मंदिर में ढोलक की आवाज गूँज रही है. मंदिर में स्कूली छात्रों और देश के दक्षिण-पूर्व इलाक़े से आए सिंहली श्रद्धालुओं की भीड़ है.

सिंहली बौद्ध युद्ध के बाद फिर जाफ़ना लौट कर काफी ख़ुश हैं. उनका तमिल हिंदुओं ने स्वागत किया.

मशहूर देवता मुरुगन की पूजा के लिए बौद्ध और हिंदू एक साथ अपनी शर्ट उतारकर मंदिर में प्रवेश करते हैं.

नाराज़गी

तमिल बहुल शहर जाफ़ना में अपने तीन साथियों के साथ आए स्थानीय छात्र रामन कहते है कि गृहयुद्ध ख़त्म होने के बाद जीवन स्तर में सुधार हुआ है.

लेकिन वे तमिल विद्गोहियों की पिछले साल हुई हार के बाद भी जारी प्रतिबंधों से नाराज हैं.

वे कहते हैं, ''अगर सरकार यह सोचती है कि तमिल विद्रोहियों का सफ़ाया हो गया तो यहाँ इतनी जाँच चौकियाँ क्यों हैं?''

रामन कहते हैं, ''अगर वे यह सोचते हैं कि तमिल विद्रोही अब नहीं हैं तो वे हमें अकेला छोड़ दें. इन जाँच चौकियों की वजह से मुझे अपने घर से यहाँ आने में काफ़ी समय लगा.''

तटवर्ती शहर त्रिंकोमाली के लोगों का भी कहना है कि ज़िंदगी और आरामदायक होती जा रही है.

आर संबंदन तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) के बुजुर्ग नेता है और त्रिंकोमाली में चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

टीएनए को तमिल विद्गोहियों का काफ़ी करीबी माना जाता था और आज भी वह तमिलों की सबसे बड़ा और लोकप्रिय राजनीतिक संगठन है.

'ख़तरे में संस्कृति'

संबंदन आरोप लगाते हैं कि देश के उत्तर-पूर्व में हिंदू संस्कृति ख़तरे में है. वे बताते हैं कि पिछले कुछ दिनों में तमिल हिंदुओं के पूजा स्थलों को निशाना बनाया गया है.

टीएनए ने अब तमिल अल्पसंख्यकों के लिए अलग राज्य बनाने की माँग को त्याग दिया है.

लेकिन टीएनए ने अभी तमिल बहुल उत्तरी और पूर्वी प्रांत में तमिल बोलने वाले लोगों की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए संघवाद या स्वायत्तता की मांग को नहीं छोड़ा है.

Image caption लाखों तमिल अब भी शरणार्थी शिविरों में रहते हैं

लेकिन तमिलों की कुछ शिकायतें भी हैं, वे ख़ुद टीएनए के लिए मतदान नहीं कर सकते हैं.

पिछले दिनों राष्ट्रपति पद के चुनावों में भारी सफलता हासिल करने वाले महिंदा राजपक्षे ने पिछले हफ़्ते जाफ़ना में एक रैली को संबोधित किया.

उन्होंने राजनीतिक सुधारों पर नहीं बल्कि विकास की बात की. उन्होंने कहा कि तमिल लोगों को स्कूलों, घरों और रेल की ज़रूरत है.

उस समय उन्होंने कहा था कि विकास परियोजनाएँ तमिलों की शिकायतों को दूर कर देंगी. उन्होंने कहा कि वास्तव में देश में कोई अल्पसंख्यक नहीं है.

जाफ़ना में पार्टी के समर्थक के श्रीश्रवण पवन ने बीबीसी से कहा कि उनके जातीय समूह को विशेष सहायता की ज़रूरत है.

वे चाहते हैं कि एक तिहाई सरकारी नौकरियों को तमिलभाषी तमिलों और मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिया जाए.

श्रीलंकाई तमिलों के पास उनका वोट चाहने वाले नेताओं की एक सूची है.

समस्याएँ

जाफ़ना बस स्टैंड पर इंतजार कर रहीं क़रीब 40 साल की वनाजा उमाकांता कहती हैं कि कोई भी तमिल राजनेता उनके लिए पूरी तरह से ठीक नहीं है.

वह कहती हैं, ''अच्छा नेतृत्व न होने के कारण हमें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा.''

वह कहती हैं, ''जब हमारे पास कोई ऐसा अनुभवी नेता होगा जो तमिल समस्या को समझता हो और हमारे अधिकारों के लिए लड़ सके तो हमारी समस्याओं का समाधान हो सकेगा.''

आने वाले चुनाव में राष्ट्रपति राजपक्षे पहले से और अधिक मजबूत होंगे, ऐसे में वे क्या सोचते हैं असली महत्व उसी का होगा.

इसलिए टीएनए की संघवाद की माँग हो, या राजपक्षे की पार्टी के कुछ सदस्यों की आरक्षण जैसी कोई आकांक्षा, राष्ट्रपति जब तक न चाहें ये सपने ही बने रहेंगे.

तमिलों के अधिकारों के नाम पर दशकों चली लड़ाई के बाद इस जातीय समूह के बहुत से लोगों को लगता है कि अपने और देश के भविष्य की दिशा निर्धारित करने में अब भी उसकी कोई भूमिका नहीं है.

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