पाकिस्तान फ़िल्म जगत को भारतीय फ़िल्मों से उम्मीद

पाकिस्तानी ड्रामा ख़ुदा जमीं से गया नहीं

पाकिस्तान की सिनेमा इंडस्ट्री में भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन के बाद एक नई जान आ गई है, लेकिन फ़िल्म जगत अभी भी काफ़ी बुरी स्थिति में है. कुछ फ़िल्मकारों ने इसे बेहतर बनाने के लिए भारतीय कलाकारों का भी सहारा लिया है.

पाकिस्तान की मशहूर फ़िल्म 'ख़ुदा के लिए' ने कमज़ोर होते फ़िल्म जगत को काफ़ी सहारा दिया है.

प्रतिस्पर्धा के इस युग में यह फ़िल्म इंडस्ट्री अपने पांव जमा नहीं सकी है और पिछले कई सालों से बहुत ही कम फ़िल्में बनीं हैं, यूँ कह लीजिए कि अधिकतर स्टूडियोज़ की जगह बड़े बड़े शॉपिंग मॉल बन गए हैं.

वर्ष 2007 में फ़िल्म ख़ुदा के लिए बनाई गई और भारतीय अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का सहारा लिया गया ताकि मरती हुई फ़िल्म इंडस्ट्री फिर से ज़िंदा हो सके.

इस के बाद वर्ष 2008 में 'रामचंद पाकिस्तानी' फ़िल्म बनाई गई, भारतीय अभिनेत्री नंदिता दास ने मुख्य भूमिका निभाई और इस फ़िल्म का संगीत देबू मिश्र ने दिया.

लोकप्रीय गायक शुभा मुदगल ने अपनी आवाज़ का जादू जलाया. जितनी कामयाबी मिलनी चाहिए थी उतनी नहीं मिली और भारत में भी इन दोनों फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया.

तबाही का कारण

जाने माने फ़िल्म विश्लेषक रहीम ख़ान ने पाकिस्तानी फ़िल्म जगत की तबाई के कुछ कारण बताते हुए कहा, "पाकिस्तान का फ़िल्म जगत इस प्रकार का हो गया है कि लोग इसे देखना पंसद नहीं करते, क्योंकि इसमें कहानी होती ही नहीं है. अनपढ़ लोगों ने इस को तबाही के कगार पर पहुँचा दिया है."

उनके मुताबिक़ आजकल जो थोड़ी बहुत फ़िल्में बन रही हैं उन में बहुत सी ख़ामियाँ हैं और उन्हें ठीक करने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि फ़िल्म की कहानी को महत्व देना चाहिए.

फ़िल्म इंडस्ट्री तो अपने पाँव पर खड़ी नहीं हो सकी है लेकिन भारतीय फ़िल्मों ने सिनेमाघरों की रौनक़ बहाल कर दी.

'थ्री इडियट' सहित नई बनने वाली सभी फ़िल्मों का पाकिस्तान के सिनेमाघरों में प्रदर्शन हो रहा है.

फ़िल्म जानकार अबदुर्रहमान ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, "भारतीय फ़िल्मों ने पाकिस्तान की सिनेमाघरों को फायदा पहुँचाया है लेकिन फ़िल्म जगत इस से प्रभावित हुआ है."

उन्होंने आगे कहा, "हाँ, लेकिन यह है कि भारतीय फ़िल्मों के देखते देखते पाकिस्तानी फ़िल्म जगत फिर से जान पकड़ ले."

पाकिस्तान में जो भी थोड़ी बहुत फ़िल्में बन रही हैं चाहे वह पंजाबी ही क्यों न हो. लोग सिनेमाघरों में उन्हे देखना नहीं चहते.

भारतीय फ़िल्म पसंद

मैंने रावलपिंडी के कुछ छात्रों ने पूछा कि क्या वे पाकिस्तानी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं तो उन्हों ने जवाब दिया कि वे पाकिस्तानी फ़िल्में नहीं देखते क्योंकि जो वह चाहते हैं वह उसमें होता नहीं.

उन्होंने बताया कि वे भारतीय फ़िल्मों को पसंद करते हैं.

फ़िल्म जगत के साथ साथ पाकिस्तान के थियेटर की भी काफी बुरी स्थिति है. 1980 और 90 के दशक में पाकिस्तान का माज़ाहिया थियेटर काफी लोकप्रिय था और देखने वालों की कोई कमी नहीं थी.

उमर शरीफ, सिकंदर लाला और हनीफ़ राजा जैसे फ़नकारों ने इसमें जान डाली थी लेकिन समय बीतने के साथ साथ इस की भी स्थिति बुरी होती गई. उमर शरीफ़ सहित कई कलाकारों ने भारत में जा कर अपने फ़न का प्रदर्शन किया.

जानकारों को आशा है कि पाकिस्तान का फ़िल्म जगत और थियेटर की गाड़ी फिर से पटड़ी पर चलना शुरु करेगी और कामयाबी के साथ आगे बढ़ेगी.

संबंधित समाचार