गीत संगीत के प्रेमी हैं पश्तून

पश्तो फ़िल्म
Image caption पाकिस्तान का पश्चिमोत्तर अपनी बहुमूल्य संस्कृति और संगीत के लिए जाना जाता है.

आजकल पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत या सूबा सरहद की बात करते ही चरमपंथी हिंसा की तस्वीर दिमाग में घूम जाती है. शायद अनेक लोगों को यह पता न हो कि सूबा सरहद अपनी विशेष संस्कृति और सुरीले संगीत के लिए जाना जाता है.

यह सही है कि पिछले कुछ सालों से बढ़ते हुए चरमपंथ ने इसकी रौनक़ पर असर डाला है, पर इसे ख़त्म नहीं कर पाया है. हाँ, सांस्कृतिक गतिविधियों में कमी ज़रूर आई है.

पाकिस्तान का यह प्रांत अपनी बहुमूल्य संस्कृति और मनमोहक संगीत के लिए दुनिया भर में जाना जाता है.

दिलचस्प है कि अशांत क़बायली इलाक़े वज़ीरिस्तान के पास ही स्थित शहर डेरा इस्माइल ख़ान के दो नेत्रहीन लड़कों ने साहस जुटा कर आतंक और भैय के इस माहौल में संगीत सीखना शुरु कर दिया है.

साहस और संगीत

17 वर्षीय शोएब ख़ान ने बताया कि लोग उनकी प्रशंसा करते हैं.

उन्होंने बताया, "नहीं सर, लोग तो कुछ नहीं कहते, वे कहते हैं कि अच्छी बात है, कला आनी चाहिए. वे यह देख कर गर्व करते हैं कि एक नेत्रहीन तबला बजा रहा है."

शोएब और उनके साथी ने बताया कि संगीत ने उनके जीवन को आसान कर दिया है और अगर वे संगीत का सहारा न लेते तो इस समाज में काफ़ी मुश्किलों का सामना करते. शोएब के मुताबिक़ संगीत ने उनके अंदर एक बड़ी हिम्मत पैदा कर दी है.

इस प्रांत में एक अनूठी और मज़ेदार परंपरा है कि जब लोग दिन भर के काम काज से लौट कर घर आते हैं और आपसप में एक स्थान पर इकट्ठा होते हैं तो कविताएँ सुनाने की एक महफि़ल होती है जिन में महिलाएँ भी भाग लेती हैं.

पहले यह परंपरा बहुत ज़्यादा थी लेकिन सुरक्षा की बिग़डी हुई स्थिति ने कम ज़रूर कर दिया है लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है.

पश्तो का वैलेंटाईन डे

Image caption पश्तो की संस्कृति में संगीत का चलन बहुत ही अधिक है

यह सुन कर लोगों का अश्चर्य होता कि जिस तरह दिल्ली, मुंबई या कराची में 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे मनाया जाता है उसी तरह पेशावर में भी युवक इस दिन अपनी मुहब्बत का इज़हार कर ही देते हैं.

पेशावर के कुछ छात्रों ने इस दिवस पर अपने विचार देते हुए कहा, "हम यह दिन अपने प्रेमिका को ख़ुश करने के लिए मनाते हैं जिन से हम प्यार करते हैं."

इस प्रांत के पश्तो, हिंदको और सराएकी भाषा में संगीत बहुत ही मशहूर हैं. उस्ताद ग़ुलाम अब्बास सराएकी और पश्तों भाषा के बड़े गायक हैं.

वे कहते हैं कि बढ़ते हुए चरमपंथ के कारण अब संगीत छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन छोड़ नहीं सकते.

उन्होंने आगे कहा, "हम अमन के दूत हैं और युद्ध के समय संगीत गाते हैं."

वे गुनगुनाते हैं, "बग़ैर उसके अब आराम भी नहीं आता, वह शख़्स जिस का मुझे नाम भी नहीं आता- और करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम, मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता."

डेरा इस्माईल ख़ान के रहने वाले उस्ताद अल्लाह नवाज़ भी कहते हैं कि डर की वजह से संगीत ख़त्म होता जा रहा है और उन्हें अब काफ़ी मुश्किलें हो रही हैं.

उन्होंने बताया, "पहले इस शहर का माहौल काफ़ी बेहतर था, पहले कहते थे कि डेरा फूलों का सहरा. संगीत हमारी संस्कृति का हिस्सा है और उस के बग़ैर हम रह नहीं सकते."

उस्ताद अल्लाह नवाज़ के विचार अपनी जगह लेकिन यह हक़ीक़त है कि पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के गायकों और उस्तादों ने अपने संगीत और संस्कृति को ज़िंदा रखा है.

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