काबुल में अहम शांति जिरगा

जिरगा के लिए तैयार मंच
Image caption यह जिरगा आम जिरगा से अलग है क्योंकि यह संविधान में संशोधन नहीं कर सकता सिर्फ़ सुझाव दे सकता है

अफ़ग़ानिस्तान में बुधवार से तीन दिन का राष्ट्रीय जिरगा हो रहा है. राष्ट्रपति हामिद करज़ई इसकी शुरुआत की है.

इसमें नौ साल के युद्ध के बाद तालेबान के साथ शांति समझौते को लेकर राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश की जानी है.

इस सलाहकार बैठक मे 1,600 क़बिलाई नेता, समाज के गणमान्य लोग और संसदीय नेता आदि भाग लें रहे हैं. भाग लेने वालों मे 20 प्रतिशत महिलाएँ भी हैं.

हालांकि सबसे प्रमुख विपक्षी नेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला बैठक में भाग नहीं ले रहे हैं और तालेबान को इसमें शामिल होने का न्यौता नहीं दिया गया है.

अफ़ग़ानिस्तान में 2001 में तालेबान के तख्ता पलटने के बाद ये तीसरा जिरगा है लेकिन शांति बहाली की कोशिश में पहला जिरगा है.

इस जिरगा की सफलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और तालेबान ने पहले ही इसे दिखावा बताते हुए इसकी निंदा की है.

मुद्दा

बीबीसी के संवाददाता मार्टिन पेशेंस ने काबुल से ख़बर दी है कि इस जिरगा में शामिल होने के लिए सैकड़ों प्रतिनिधि काबुल में हैं. इसके लिए एक विशालकाय सफ़ेद टेंट लगाया गया है.

इस बैठक में यह चर्चा की जानी है कि तालेबान से किस तरह से बातचीत की जाए. इस बैठक को हामिद करज़ई के विरोधियों को ध्वस्त करने की कोशिशों के रूप में भी देखा जा रहा है.

हाल के बरसों में तालेबान की ताक़त बढ़ी है.

काबुल और पश्चिमी देशों की राजधानियों में यह अहसास बढ़ता जा रहा है कि इस संघर्ष को ख़त्म करना आवश्यक है.

तालेबान को कैसा प्रस्ताव दिया जाए और उस पर अमल किस तरह किया जाए, यह तीन दिन की बैठक का फ़ोकस होगा.

Image caption करज़ई ने हथियार छोड़ने वाले तालेबान से समझौता करने का प्रस्ताव रखा है

लेकिन तालेबान ने बैठक शुरु होने से पहले ही एक बयान जारी करके कहा है कि यह जिरगा अफ़ग़ान लोगों की आँखों में धूल झोंकने की कोशिश है.

दूसरी ओर विपक्षी दल भी तालेबान के साथ शांति समझौते के विचार से सहमत नहीं दिखते.

विपक्षी नेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि तालेबान के साथ राजनयिक बातचीत का अभी वक्त नहीं आया है क्योंकि इस समय तालेबान स्वयं को मज़बूत समझ रहा है और उसे बाहरी ताकतों का भी समर्थन मिल रहा है.

उनका कहना है, "मेरा मानना है कि छापामारों से संपर्क जारी रखा जाना चाहिए पर बातचीत किस आधार पर होगी ये अफ़ग़ान लोगों को पता होना चाहिए. क्या वो संविधान को मानेंगे? क्या हिंसा त्यागेंगे? क्या वो आतंकी संगठनों से अपने रिश्ते तोड़ेंगे? ये सब शर्ते होनी चाहिए जिस पर वो शांति की राह में लौटें, समाज का हिस्सा बनें. पर अगर आप एक संगठन के रुप में तालेबान से बात करना चाहते हैं तो वो इनमें से किसी भी शर्त पर बात करने को तैयार नहीं हैं."

ऐसे में हामिद करज़ई के लिए चुनौती है कि वे तीन दिनों की इस बैठक में कोई सहमति किस तरह क़ायम करते हैं.

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