जलवायु परिवर्तन का धान की पैदावार पर असर

धान की खेती
Image caption जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव से वैज्ञानिक आगाह करते रहे हैं

एक शोध के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया में पिछले 25 वर्षों में कुछ जगहों पर धान की पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आई है.

इस शोध में शामिल अमरीकी वैज्ञानिकों ने आने वाले समय में पैदावर में और अधिक कमी आने की आशंका व्यक्त की है.

दुनिया के प्रमुख चावल उत्पादन करने वाले छह प्रमुख देशों जैसे, भारत, चीन, थाइलैंड और वियतनाम के 227 फ़ार्म से जुटाए आँकडों पर यह शोध आधारित है.

पहले हुए अध्ययनों मे यह चिंता जताई गई थी कि जलवायु परिवर्तन के कारण पैदावार में गिरावट की वजह से दुनिया में खाद्य संकट पैदा हो सकता है.

वर्ष 2004 में अन्य शोधार्थियों ने पाया था कि रात के तापमान में प्रति एक डिग्री की बढ़ोत्तरी होने से फिलिपींस में धान की पैदावार में 10 फ़ीसदी की कमी आई है.

खाद्य संकट

वर्तमान शोध में जो आँकड़े मिले हैं वे तमिलनाडु से लेकर शंघाई स्थित धान के खेतों के अध्ययन पर आधारित हैं. इन खेतों में 'हरित क्रांति' में शामिल फसलों को उगाया जाता रहा है.

प्रमुख शोधकर्ता जारोड वेल्च ने बीबीसी को बताया, "हमने पाया कि जैसे ही दिन के न्यूनतम तापमान में बढ़ोत्तरी होती है या जैसे ही रात के तापमान में बढ़ोत्तरी होती है, धान के पैदावार में गिरावट आ जाती है."

इसके विपरीत दिन के समय ज्यादा तापमान होने से पैदावर में बढ़ोत्तरी देखी गई लेकिन गर्म रातों की वजह से पैदावार में जो कमी आती है उससे यह प्रभाव कम हो जाता है.

हालांकि वेल्च का कहना है कि दिन के तापमान में जैसे जैसे बढ़ोत्तरी होगी पैदावार में गिरावट आएगी.

संयुक्त राष्ट्र की ओर से जलवायु परिवर्तन के लिए गठित विभिन्न देशों के पैनल (आईपीसीसी) ने वर्ष 2007 में माना था कि तापामन में हल्की वृद्धि से कुछ इलाक़ों में पैदावार में बढ़ोतरी हो सकती है.

लेकिन यदि तापमान में तीन डिग्री से ज्यादा बढ़ोतरी होती है तो सभी इलाक़ों में और सभी फसलों पर इसका बुरा असर पड़ेगा.

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