अफ़ग़ानिस्तान में 'बच्चाबाज़ी' जारी

Image caption 'बच्चेबाज़ी' की समस्या को लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं

उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के एक गाँव में आधी रात के बाद एक शादी की पार्टी चल रही है जिसमें न तो दूल्हा है, न ही दुल्हन. सिर्फ़ मर्द हैं, कोई महिला नहीं है.

इन लोगों से कई के पास बंदूकें हैं, कई लोग हेरोइन के नशे में हैं, इन सबकी नज़रें टिकी हैं 15 साल के एक बच्चे पर जो चमकदार पोशाक पहनकर नाच रहा है, उसका चेहरा लाल रूमाल से ढँका हुआ है. उसने अपनी ब्लाउज में दो गेंदें डाल रखी हैं और उसके पैरों में घुंघरू बँधे हैं.

यह अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी पुरानी परंपरा है जिसे 'बच्चेबाज़ी' कहा जाता है. दर्दनाक कहानी रात की पार्टी के बाद शुरू होती है जब नाचने वाले बच्चे को यौन उत्पीड़न के दौर से गुज़रना पड़ता है.

'बच्चेबाज़ी'को अफ़ग़ानिस्तान के अमीरों का शौक़ माना जाता है और कई लोग कई-कई बच्चे अपने साथ रखते हैं जो एक तरह से स्टेटस सिंबल के तौर पर देखा जाता है.

आम तौर पर ये बच्चे अनाथ या ग़रीब परिवारों के होते हैं जिनकी परवाह करने वाला कोई नहीं होता. इन बच्चों की उम्र कई बार 10-12 साल तक होती है.

मैं महीनों से ऐसे एक बच्चे की तलाश में था जिससे बात हो सके, पूरी तलाश ख़त्म हुई जब 15 वर्षीय उमेद (असली नाम नहीं) बात करने को तैयार हुआ.

उमेद के पिता की मौत बारूदी सुरंग के विस्फोट में मारे गए, उसकी माँ भीख माँगकर किसी तरह गुज़ारा करती है, उमेद नाचकर अपने परिवार का पेट भरने की कोशिश करता है.

उमेद बताता है, "मैंने दस वर्ष की उम्र से पार्टी में नाचना शुरू किया जब मेरे पिता की मौत हो गई, हम भूखे थे, मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था, हमें अक्सर ख़ाली पेट सोना पड़ता था, जब मैं पार्टियों में नाचता हूँ तो मुझे दो-चार डॉलर और खाने को पुलाव मिल जाता है."

मैंने उससे पूछा कि पार्टी ख़त्म होने के बाद जब उसे लोग होटलों में ले जाते हैं तो वहाँ क्या होता है, इसका जवाब देने के बदले उसने सिर झुका लिया और काफ़ी देर तक चुप रहा, फिर उसने बताया कि उसके एक रात के दो डॉलर मिलते हैं और कई बार उसे सामूहिक बलात्कार का शिकार होना पड़ता है.

जब मैंने उससे पूछा कि पुलिस से शिकायत क्यों नहीं करते, तो उमेद का जवाब था, "ये बहुत पहुँच वाले लोग हैं पुलिस उन्हें कुछ नहीं कहेगी."

उमेद की माँ मुश्किल से 30-32 साल की होगी लेकिन उसका चेहरा देखकर लगता है जैसे उसकी उम्र पचास साल हो, वह बताती है कि उसके घर में सिर्फ़ आधा किलो चावल और दो प्याज़ हैं लेकिन खाना पकाने के लिए तेल नहीं है.

उमेद की माँ जानती है कि उसका बेटा पार्टियों में नाचता है लेकिन उसे इस बात की चिंता अधिक सता रही है कि कल खाना क्या और कैसे बनेगा.

मानने से इनकार

कई बार अधिकारियों ने इस सामाजिक कुरीति पर रोक लगाने की कोशिश की है लेकिन 'बच्चेबाज़ी' बदस्तूर जारी है.

जोज़वान पुलिस के उप प्रमुख मोहम्मद इब्राहीम मानने को तैयार नहीं हुए कि 'बच्चेबाज़ी' अब भी जारी है. उन्होंने कहा, "पिछले चार पाँच साल में बच्चेबाज़ी की कोई शिकायत सामने नहीं आई, हमारा मानना है कि अब यह समस्या नहीं है."

उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के सांसद अब्दुल कबीर उचकुन कहते हैं कि 'बच्चेबाज़ी' न सिर्फ़ जारी है बल्कि बढ़ रही है.

वे कहते हैं, "मैंने कई बार अलग अलग प्रांतों के लोगों से लिखकर अनुरोध किया है कि वे इस कुप्रथा को बंद करें लेकिन कोई क़दम नहीं उठाया जाता है."

अफ़ग़ानिस्तान को इस्लाम का गढ़ समझा जाता है और आम धारणा यही है कि मौलवियों की बात सुनी जाती होगी लेकिन मैंने जितने मौलवियों से बात की सबने 'बच्चेबाज़ी' को इस्लाम के ख़िलाफ़ और शोषण का तरीक़ा बताया.

रोकने की कोशिश

अफ़ग़ानिस्तान में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन का कहना है कि 'बच्चेबाज़ी'में लगे बच्चों की कुल संख्या बता पाना बहुत मुश्किल है लेकिन उनकी तादाद हजा़रों में हो सकती है.

ऐसा सोचना सही नहीं है कि 'बच्चेबाज़ी' सिर्फ़ दूर दराज़ के ग्रामीण इलाक़ों में होती है, मुझे काबुल में सरकार के मुख्यालय से आधा किलोमीटर की दूरी पर मोहम्मद ज़बी (असली नाम नहीं) मिले जो शान से बताते हैं कि उनके पास नाचने वाले तीन बच्चे हैं.

मोहम्मद ज़बी कहते हैं कि उनके 'बच्चे' सिर्फ़ नाचते हैं और वे उनके साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाते , "सबके अपने अपने शौक़ होते हैं, कोई मुर्गा लड़ाता है, कोई बुज़कशी खेलता है, मुझे बच्चेबाज़ी का शौक़ है, इसमें कोई बुराई नहीं है."

जब मैं पार्टी से निकल रहा था तो रात के दो बजे थे और एक बच्चा तब भी नाच-नाच कर लोगों को अफ़ीम पेश कर रहा था, मोहम्मद ज़बी कोई बहुत प्रभावशाली व्यक्ति नहीं हैं लेकिन उन्हें 'बच्चेबाज़ी' का 'शौक़' पूरा करने से रोकने वाला कोई नहीं है.

जो इस कुप्रथा को रोक सकते हैं उनके पास दूसरी चिंताओं की कोई कमी नहीं है.

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