अफ़गानिस्तान में मतदान के दौरान हिंसा

मतदान
Image caption काबुल में महिलाओं ने बढ़चढ़ कर मतदान किया

अफ़ग़ानिस्तान में संसदीय चुनाव के दौरान अलग-अलग हमलों में कम से कम 14 लोग मारे गए हैं. मृतकों में एक पुलिसकर्मी भी शामिल है.

उल्लेखनीय है कि तालेबान ने पहले से ही मतदान के दौरान हमलों की धमकी दे रखी थी. मतदान समाप्त होने के बाद तालेबान ने कहा है कि उनके लोगों ने 150 से ज़्यादा मतदान केंद्रों पर हमले किए.

अधिकारियों का कहना है कि बग़लान प्रांत में हुए एक हमले में छह लोग मारे गए हैं, जबकि बलख के पास एक बम धमाके में तीन लोगों की मौत हुई है.

राजधानी काबुल और जलालाबाद से भी छिटपुट हिंसा हुई.

चुनाव अधिकारियों का कहना है कि तालेबान की धमकियों के बाद भी 90 प्रतिशत मतदान केंद्रों को वोटिंग के लिए खुला रखा गया था.

धीमी शुरुआत

चुनावों में संसद के निचले सदन की 249 सीटों के लिए कुल 2500 उम्मीदवार मुक़ाबले में थे.

मतदान के लिए सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे.

जहाँ तक मतदान की बात है तो देश के अधिकांश हिस्सों में इसकी शुरुआत बहुत धीमी रही. मतदान के बाद अधिकारियों ने स्वीकार किया कि ख़ास कर देश के दक्षिणी हिस्सों में मतदान का प्रतिशत कम रहा है.

उल्लेखनीय है कि पूरे अफ़ग़ानिस्तान में कोई एक करोड़ मतदाता वोट डालने की पात्रता रखते हैं.

तालेबान का असर

Image caption सफल चुनाव अमरीकी कमांडर जनरल डेविड पैट्रियस की राह को आसान कर सकेगा

काबुल से बीबीसी संवाददाता लिस डुसेट के अनुसार संसदीय चुनाव को अफ़ग़ानिस्तान में जनमत तालेबान के ख़िलाफ़ करने के लिए इस साल किए गए प्रयासों की अंतिम कड़ी माना जा रहा है.

इससे पहले इस साल अफ़ग़ानिस्तान मुद्दे पर लंदन में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ था. फिर अफ़ग़ानिस्तान में शांति सम्मेलन या जिरगा का आयोजन हुआ जिसमें तालेबान से वार्ताएं करने पर सहमति बनी. और अब संसदीय चुनाव.

कहने की ज़रूरत नहीं कि आज का मतदान तालेबान के बढ़े दबदबे की पृष्ठभूमि में हुआ. हिंसा और धमकियों के ज़रिए तालेबान ने अफ़ग़ानिस्तान के उन कई प्रांतों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जहाँ पहले उसका प्रभाव नगण्य था.

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी अगुआई वाले अंतरराष्ट्रीय बल के प्रमुख जनरल डेविड पैट्रियस भले ही दावा करें कि अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के सहयोग से उनके सैनिकों को हाल के महीनों में सफलताएँ मिली हैं, लेकिन आम अफ़ग़ानों को ऐसा महसूस नहीं हो रहा है.

आज का चुनाव भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हामिद करज़ई की सरकार के लिए भी एक बड़ी परीक्षा है.

अधिकांश अफ़ग़ानों की यही आकांक्षा है कि उनका देश बुरे दौर से निकल कर अंतत: शांति की राह पर वापस आए, लेकिन तालेबान शासन के ख़ात्म के बाद बीते नौ वर्षों पर नज़र डालने के बाद वे भविष्य को लेकर ज़्यादा आशान्वित नहीं हो पाते हैं.

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