बर्मा चुनाव में विदेशी मीडिया पर रोक

बर्मा
Image caption बर्मा में वर्षों से सैन्य शासन है

बर्मा में दो दशक बाद होने वाले आम चुनाव के दौरान विदेशी मीडिया और पर्यवेक्षकों को बर्मा में रहने की इजाज़त नहीं होगी.

चुनाव आयोग का कहना है कि बर्मा में मौजूद राजनयिक चुनाव अभियान देख सकेंगे और पर्यवेक्षकों की कोई जरूरत नहीं होगी. साथ ही आयोग का कहना है कि बर्मा में मौजूद पत्रकार चुनाव की ख़बर देने के लिए पर्याप्त हैं.

आलोचकों का कहना है कि वर्ष 1990 के बाद सात नवंबर को हो रहे चुनाव महज एक ढोंग है और इसका उद्देश्य सैन्य शासन को और मजबूत बनाना है.

चुनाव आयोग के चेयरमैन थेन सो ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हमें विदेशी पर्यवेक्षकों की ज़रूरत नहीं है. हमें चुनाव करवाने का पर्याप्त अनुभव है. "

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के प्रतिनिधि बर्मा में मौजूद हैं जिन्हें समय पर प्रेस बयान दे दिया जाएगा और इसलिए विदेशों से संवाददाताओं के वहाँ जाने की कोई ज़रूरत नहीं है.

बर्मा में ज्यादातर विदेशी पत्रकारों पर प्रतिबंध है और स्थानीय मीडिया पर कड़ा नियंत्रण है.

चुनाव बहिष्कार की अपील

इस बीच वर्षों से नज़रबंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची ने चुनाव का बहिष्कार करने की अपील की है.

सन 1990 में हुए पिछले चुनावों में आंग सान सू ची की पार्टी भारी बहुमत से जीत गई थी लेकिन बर्मा के सैन्य प्रशासकों ने चुनाव नतीजे मानने से इनकार कर दिया.

बर्मा के अधिकारियों का कहना कि चुनाव लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम होगा. जबकि देश के बाहर रहने वाले लोगों का कहना है कि जिस कानून के तहत चुनाव करवाए जाएँगे वह सही नहीं है और इससे सैन्य शासन और मजबूत होंगे.

संसद की एक चौथाई सीटें पहले से ही सेना के लिए आरक्षित कर दी गईं हैं.

जो पार्टियाँ सत्ता से नहीं जुड़ी हुई है उनका कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें परेशान किया जा रहा है.

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