हेलमंद की कभी न भूलने वाली यात्रा

हेलमंद

महीनों की तैयारी के बाद आख़िरकार मैं, मेरे कैमरामैन और बीबीसी अफ़ग़ान सेवा रेडियो के एक सहयोगी ने लश्करगाह के लिए उड़ान भरी.

लश्करगाह दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंद प्रांत की राजधानी है. ये एक सपने के सच होने जैसा था. मैं पिछले साढ़े तीन साल से काबुल में काम कर रहा हूँ और मैं हमेशा से हेलमंद की यात्रा करना चाहता था.

विमान यात्रा के दौरान मेरे मन में मिली-जुली भावना थी. मैं थोड़ा नर्वस था और थोड़ा चिंतित भी. पहली बार मैं हेलमंद जा रहा था.

हेलमंद ऐसा प्रांत है, जो दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान विद्रोहियों का प्रमुख अड्डा है. हेलमंद में सबसे ज़्यादा अफ़ीम की पैदावार भी होती है.

मेरी चिंता इसलिए भी थी क्योंकि मैं अन्य पत्रकारों की तरह इस हिंसाग्रस्त प्रांत की यात्रा अमरीकी या ब्रितानी सैनिकों के साथ नहीं कर रहा था. मैं अपने दम पर इस इलाक़े की यात्रा कर रहा था.

लेकिन सभी तरह के ख़तरे के बावजूद स्वतंत्र रूप से यात्रा करना मेरे लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित हुआ. इनमें बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ थी- आम लोगों से बात करने का मौक़ा मिलना, जिनकी कहानियाँ कभी-कभार ही मीडिया में आती हैं.

मेरी हेलमंद यात्रा का मुख्य मकसद था मरजाह और नाद अली ज़िले में ऑपरेशन मुश्तरक के छह महीने बाद स्थिति का आकलन करना.

इस ऑपरेशन में हज़ारों अमरीकी, ब्रितानी और अफ़ग़ानी सैनिकों में हिस्सा लिया था और मकसद था इन दो ज़िलों से तालेबान विद्रोहियों का सफ़ाया करना.

लोकप्रियता

राजधानी काबुल से एक घंटे से ज़्यादा की उड़ान के बाद हम लश्करगाह के नवनिर्मित हवाई अड्डे पर उतरे. हमारा लोकल स्ट्रिंगर वहाँ मौजूद था.

किसी की ख़ास नज़र हम पर न पड़े, इसलिए मैं और मेरे सहयोगी ने सलवार-कमीज़ पहन ली और स्कार्फ़ भी ओढ़ ली. लेकिन जल्द ही मैंने ये समझ लिया कि इससे बहुत लाभ नहीं मिलने वाला.

जब मैं अपने सामान की प्रतीक्षा कर रहा था, उसी समय एक अफ़ग़ान युवक मेरी तरफ़ आया और मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया. मैं उस समय थोड़ा चौंका, जब उन्होंने मुझे मेरे नाम से बुलाया.

तब उन्होंने बताया कि उन्होंने मुझे टीवी पर देखा है. उन्होंने मुझे सहयता की पेशकश की. मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और पूछा कि क्या हेलमंद के लोग बीबीसी फ़ारसी टीवी देखते हैं, उनका जवाब था- हाँ.

उन्होंने बताया कि बीबीसी फ़ारसी टीवी केबल पर उपलब्ध है और कुछ लोग इसे सैटेलाइट पर भी इसे देखते हैं.

मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि हेलमंद के लोग बीबीसी फ़ारसी टीवी देखते होंगे. वैसे हेलमंद प्रांत में ज़्यादातर आबादी पख़्तून लोगों की है.

पख़्तून अफ़ग़ानिस्तान का सबसे बड़ा जातीय समूह है और ज़्यादातर तालेबान चरमपंथी इसी नस्ल से आते हैं.

बाद में मुझे पता चला कि वो पख़्तून भी बीबीसी फ़ारसी टीवी देखते हैं, जो फ़ारसी तो नहीं बोलते हैं लेकिन उसे समझते हैं.

शिकायत

मैं सरकारी होटल द बोस्ट होटल पहुँचा. यह लश्करगाह के दो प्रमुख होटलों में से एक है. ये होटल उस इलाक़े में है, जहाँ की सुरक्षा व्यवस्था काफ़ी तगड़ी है. इसी इलाक़े में गवर्नर का कार्यालय और आवास भी है.

Image caption युद्ध ने यहाँ के लोगों की ज़िंदगी बदल दी है

थोड़े आराम के बाद मैं और मेरे सहयोगी नज़दीक के एक पार्क में गए ताकि आसपास का नज़ारा लें. पार्क बहुत छोटा था और यहाँ से हेलमंद नदी बहते दिख रही है.

पार्क में बड़ी संख्या में नौजवान मौजूद थे लेकिन महिलाएँ कहीं नहीं दिख रही थी. कुछ लोग हशीश पी रहे थे, तो कुछ ताश खेल रहे थे. कुछ लोग अनार का मज़ा ले रहे थे.

जैसे ही हम कार से उतरकर पार्क की ओर बढ़े, वहाँ मौजूद लोग हमें घूरने लगे. हमने सोचा कि बेहतर यही है कि कुछ समय बाद हम पार्क से चले जाएँ.

दूसरे दिन हमने मुख़्तार शरणार्थी शिविर का दौरा करने की योजना बनाई. ये शिविर राजधानी लश्करगाह के उपनगरीय इलाक़े में है.

ये शिविर एक छोटे क़स्बे की तरह है. यहाँ क़रीब पाँच हज़ार परिवार रहते हैं, जो युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं के कारण विस्थापित हो गए हैं.

ऑपरेशन मुश्तरक के कारण विस्थापित हुए कुछ परिवार भी यहाँ रहते हैं. मैं ऐसे दो परिवारों से भी मिला.

उन्होंने मरजाह में अफ़ग़ान और विदेशी सैनिकों के बुरे व्यवहार की शिकायत की.

अपने परिवार के एकमात्र रोज़गार वाले युवक मिर्ज़ा मोहम्मद ने बताया कि कैसे उनके घर के पास से तालेबान विद्रोहियों ने गोलीबारी की, लेकिन अफ़ग़ान और विदेशी सैनिकों ने उन पर आरोप लगाया कि वे तालेबान को सहयोग कर रहे हैं और ख़ुद भी तालेबान लड़ाके हैं.

उन्होंने बताया कि सरकारी सैनिकों ने आकर उनसे कहा कि वे अपना घर छोड़ दें, इसलिए उन्हें मरजाह छोड़ना पड़ा.

मिर्ज़ा मोहम्मद अब इस शिविर में बने एक अस्थायी घर में रहते हैं. साफ़ पानी और अपने बच्चों के लिए शिक्षा की बात तो भूल जाइए, उन्हें जीने के लिए बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें नहीं मिल रही.

पुलिसिया तर्क

हम कैंप से बाहर निकले. कैंप के ठीक बाहर एक पुलिस चौकी थी. मेरा कैमरामैन पुलिस चौकी की छत से शिविर का 'लॉन्ग शॉट' लेना चाहता था.

पुलिस कमांडर ने मुझसे पूछा कि क्या हमलोग कैंप में जा रहे हैं, मैंने जब ये बताया कि हम पहले ही वहाँ चले गए थे, तो उन्होंने अपनी भौहें तरेणी और कहा कि हमें पहले उन्हें बताना चाहिए था ताकि वे हमारे साथ पुलिसवालों को भेज सकें.

जब मैंने उनसे इसकी वजह पूछी, तो उनका कहना था कि इस शिविर में कुछ तालेबान सक्रिय हैं.

लेकिन हमारे पास लोकल गाइड था और हम नहीं चाहते थे कि हमारे साथ पुलिस जाए. क्योंकि उस स्थिति में हमें वो सब चीज़े नहीं मिल सकती थी, जो हम चाहते थे.

तीसरे दिन हम हेलमंद प्रांत के गवर्नर से मिले और उनका इंटरव्यू किया. इंटरव्यू का विषय था- ऑपरेशन मुश्तरक के बाद हेलमंद की स्थिति.

गवर्नर ग़ुलाब मंगल ने ज़ोर देकर कहा कि ऑपरेशन मुश्तरक के बाद सुरक्षा व्यवस्था में काफ़ी सुधार हुआ है.

उन्होंने कहा कि मरज़ाह हेलमंद में तालेबान का प्रमुख केंद्र था.

यहीं से तालेबान पूरे अफ़ग़ानिस्तान में आत्मघाती हमले कराते थे. गवर्नर ने यह भी दावा किया कि मरज़ाह में अस्थायी फ़ैक्टरियाँ बनाई गई थी, जहाँ बम बनाए जाते थे और सड़कों पर बिछाए जाते थे.

गवर्नर कार्यालय

हम हेलमंद के गवर्नर से उसी दिन मिले, जिस दिन वे पूरे प्रांत के क़बायली प्रतिनिधियों और निवासियों से मिल रहे थे. गवर्नर का काफ़ी व्यस्त कार्यक्रम रहता है.

एक सप्ताह में तीन दिन आम लोगों से मिलने के अलावा उन्हें विदेशी सैनिकों से मिलना पड़ता है ताकि ऑपरेशन में समन्वय स्थापित किया जा सके.

गवर्नर ग़ुलाब मंगल वहाँ आए लोगों की शिकायतें सुनते हैं और कम से कम वादा तो करते ही हैं कि वे उनकी समस्याएँ दूर करने की हरसंभव कोशिश करेंगे.

लेकिन गवर्नर से मिलने आने वाले लोग जो मुद्दे उठाते हैं, वे समस्याओं से भरी होती हैं और उनका हल आसान नहीं होता.

गवर्नर कार्यालय परिसर में मैं कई ऐसे लोगों से मिला, जो लंबी और ख़तरनाक यात्रा करके वहाँ पहुँचे थे. वे हेलमंद के विभिन्न इलाक़ों- मरज़ाह, नाद अली, नावा, ग्रेश्क, मूसाक़ला और अन्य समस्याग्रस्त ज़िलों से आए थे.

वे सभी मुझे अपनी चौंकानेवाली और आश्चर्यजनक कहानियाँ सुनाना चाहते थे. अपने अफ़ग़ानिस्तान प्रवास के दौरान मैंने कभी ऐसी कहानियाँ नहीं सुनी थी.

भीड़ में मौजूद उजली पगड़ी पहने दाढ़ी वाले एक व्यक्ति ग्रेश्क से आए थे और अफ़ग़ान पुलिस से काफ़ी नाराज़ थे.

उन्होंने मुझे बताया कि पुलिस ने उनके 15 वर्षीय बेटे के साथ बलात्कार किया और वे यहाँ इसकी शिकायत गवर्नर से करने आए हैं.

उनका ग़ुस्सा और हताशा चेहरे पर दिख रही थी. उन्होंने मुझे बताया कि अगर गवर्नर ने कोई क़दम नहीं उठाया तो वे और उनके बेटे तालेबान विद्रोही बन जाएँगे. उन्होंने बताया कि वे दोनों आत्मघाती हमला भी करने को तैयार हैं.

मैं मूसा क़ला ज़िले के एक अन्य व्यक्ति से मिला, जिनके पास भी चौंकानेवाली कहानी थी. वो सरकार के साथ सहयोग करने के लिए तालेबान के जेल में क़ैदी था.

उन्होंने बताया कि उनके ज़िले का ज़्यादातर हिस्सा तालेबान के नियंत्रण में है. सरकार का नियंत्रण सिर्फ़ ज़िले के केंद्र में है. उन्होंने यह भी बताया कि कैसे तालेबान एक सरकार की तरह वहाँ काम करते हैं.

उन्होंने बताया कि तालेबान लोगों पर मुक़दमा चलाते हैं, उन्हें दोषी ठहराते हैं, उन्हें सज़ा देते हैं और लोगों को जान से भी मारते हैं.

नाउम्मीदी

मैं एक बुर्जु़ग व्यक्ति से भी मिला, जो 70 साल के आसपास थे. वे अपने बेटे की रिहाई कराने की कोशिश में जूझ रहे थे. उनके बेटे को अफ़ग़ान और विदेशी सैनिकों ने इसलिए गिरफ़्तार किया था क्योंकि उन्हें लगता था कि उनका बेटा तालेबान की मदद कर रहा है.

Image caption हेलमंद में लोगों को शरणार्थी शिविर में रहना पड़ रहा है

हताश-परेशान उन्होंने मुझे बताया कि उनका बेटा निर्दोष है. अपने बेटे की रिहाई के लिए वे दर-दर भटक रहे हैं और गवर्नर का कार्यालय उनकी आख़िरी उम्मीद है.

उन्होंने मुझे बताया कि भ्रष्टाचार के लिए वे बहुत आशावान नहीं हैं. उन्होंने बताया कि वे जहाँ भी गए, उनसे पैसा मांगा गया. लेकिन वे बहुत ग़रीब हैं और अपने बेटे की रिहाई के लिए पैसा नहीं दे सकते.

अगले दिन मैं विमान में बैठकर काबुल लौट रहा था. मैं उन हज़ारों लोगों को हेलमंद में छोड़कर आ रहा था, जो अमन-चैन के साथ रहने के अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं.

इन लोगों को तालेबान और गठबंधन सेना के बीच चल रहे युद्ध की क़ीमत चुकानी पड़ रही है.

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