सैन्य शासन के नजदीकी दलों को बढ़त

बर्मा में चुनाव
Image caption दो दशकों के बाद बर्मा में आम चुनाव के दौरान मतदान करवाए गए हैं

बर्मा के शुरुआती नतीजों में सैन्य शासन के नजदीक राजनीतिक दलों को बढ़त हासिल हुई है.

हालांकि पश्चिमी देशों ने बर्मा के आम चुनाव को ठुकरा दिया है. उनका कहना है कि ये न तो स्वतंत्र हैं और न निष्पक्ष.

पिछले दो दशक में पहली बार हुए आम चुनावों में मतों की गिनती चल रही है.

स्वतंत्र उम्मीदवारों का आरोप है कि उन्हें चुनाव लड़ने और प्रचार करने में बाधा पहुंचाई गई.

सेना पर आरोप है कि उसने मौजूदा सैनिक सरकार की विजय सुनिश्चित करने में मदद की.

हालांकि इन सब आलोचनाओं के बावजूद विश्लेषकों का कहना है कि इन चुनावों से बर्मा में विकास के रास्ते खुलेंगे.

उल्लेखनीय है कि बीस साल के लंबे इंतजार के बाद बर्मा में जैसे ही मतदान की प्रक्रिया रुकी पूरे देश से एक तरह की ही खबरें आईं कि चुनाव में जम कर धांधली हुई है और बहुत कम मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है.

आम चुनाव में दो करोड़ 90 लाख से भी ज्यादा वैध मतदाता थे लेकिन अनिश्चय और डर के माहौल में ज्यादातर लोग अपने घरों में ही दुबके रहे और वोट डालने मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंचे.

देश की नौकरशाही और सशस्त्र सेना के सदस्यों को वोट डालने का निर्देश दिया गया था और उम्मीद ये जताई जा रही है कि उन्होंने मौजूदा सैनिक शासन समर्थित यूएसडीपी पार्टी के पक्ष में ही मतदान किया होगा.

लेकिन बर्मा की सेना में शामिल एक सैनिक ने बताया कि उसने वोट डालने से इनकार कर दिया.

कहा जा रहा है कि कुल मिलाकर दस पलटनों ने वोट डालने से इनकार कर दिया था.

लेकिन वोट के बहिष्कार के इन छोटे-मोटे उदाहरणों के बावजूद संभावना ये जताई जा रही है कि चुनाव का नतीजा यूएसडीपी के पक्ष में ही आएगा क्योंकि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप हैं.

हेराफेरी

मतदान से पहले वोटों में हेरफेर की भी कई खबरें आईं हैं.

बर्मा के चुनाव कानून के मुताबिक सुरक्षाबल के जवान, सिविल सर्वेंट और देश से बाहर रहनेवाले बर्मी नागरिक अग्रिम मतदान कर सकते हैं.

लेकिन आरोप हैं कि ऐसे अग्रिम मतों का इस्तेमाल सैनिक शासन समर्थित पार्टी के पक्ष में किया गया. विपक्षी पार्टियों का कहना है कि इससे उन्हें काफी मतों का नुक़सान हुआ.

बहरहाल बर्मा में मतदान की प्रक्रिया संपन्न हो गई है और अगले कुछ घंटों में इसके नतीजे भी सामने आ जाएंगे.

चुनावी भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों के बीच संभावना ये जताई जा रही है कि चुनावी नतीजे मौजूदा सैनिक शासन के पक्ष में आएंगे, लेकिन साथ ही ये भी तय हो जाएगा कि 20 साल से लोकतंत्र बहाली का इंतज़ार कर रही बर्मा की जनता ने वाकई कुछ हासिल भी किया है या नहीं.

वो भी तब जब देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है और उसकी नेता आंग सान सू ची लंबे समय से नजरबंद हैं और उनके चुनाव में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई है.

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