'लंदन-न्यूयॉर्क से ज़्यादा सुरक्षित काबुल'

काबुल में बच्चे

अफ़ग़ानिस्तान में नैटो के नागरिक मामलों के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने संकेत दिया है कि बच्चों के लिए लंदन, ग्लासगो, न्यूयॉर्क की जगह काबुल ज़्यादा सुरक्षित जगह है.

नैटो के प्रतिनिधि मार्क सेडवेल ने बीबीसी को बताया कि ऐसे बम जो फटे न हों, उनकी मौजूदगी के बावजूद काबुल बच्चों के लिए कई पश्चिमी देशों के मुकाबले में इसलिए ज़्यादा सुरक्षित है क्योंकि अफ़ग़ान समाज पारिवारिक मूल्यों पर ज़ोर देता है.

बीबीसी टीवी पर बच्चों के एक कार्यक्रम के दौरान बोलते हुए उन्होंने ये विचार व्यक्त किए हैं.

सेडवेल का कहना था, "काबुल और अन्य बड़े शहरों में कभी-कभी ही बम फटते हैं. शायद वहाँ बच्चे लंदन, न्यूयॉर्क या ग्लासगो या कई अन्य शहरों से ज़्यादा सुरक्षित हैं...वो ऐसा समाज है जो परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है. इसलिए (काबुल) कुछ हद तक कई गांवों का शहर है."

'पिछले छह महीने में 70 बच्चे मरे'

दूसरी ओर ग़ैरसरकारी संस्था 'सेव द चिल्ड्रन' के जस्टिन फ़ोरसाईथ ने इस टिप्पणी को ख़ारिज करते हुए कहा है कि ऐसे बयान ग़लत हैं.

उनका कहना था कि किसी भी बच्चे के लिए दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान सबसे बुरी जगह है. उनका कहना था कि अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष के कारण इस साल के पहले छह महीनों में ही 70 से अधिक बच्चे मारे गए.

लेकिन फ़ोरसाईथ ने ज़ोर देकर कहा कि 'बात केवल बमों की नहीं है क्योंकि वहाँ पैदा होने वाले हर चार बच्चों में से एक पाँच साल की उम्र से पहले मर जाता है, फिर ये चाहे बमों से हो या बिमारियों से जो आसानी से रोकी जा सकती हैं या फिर कुपोषण हो.'

सेडवेल का कहना था, "काबुल और अन्य बड़े शहरों में कभी-कभी ही बम फटते हैं. शायद वहाँ बच्चे लंदन, न्यूयॉर्क या ग्लासगो या कई अन्य शहरों से ज़्यादा सुरक्षित हैं...वो ऐसा समाज है जो परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है. इसलिए (काबुल) कुछ हद तक कई गांवों का शहर है."

'हिंसा से डर लगता है'

बीबीसी के बच्चों के चैनल सीबीबीसी के प्रिज़ेटर सोनाली शाह ने कुछ बच्चों से बात की जिन्होंने हिंसा के डर की बात की है.

काबुल निवासी सोलह वर्षीय सोहराद का कहना था, "शहर में धमाकों के कारण...जब हम स्कूल पहुँचते हैं तो बहुत डर लगता है. हम स्कूल में धमाके होने से डरते हैं."

ग्यारह वर्षीय मानीजा ने काबुल में पलने-बढ़ने की मुश्किलों का ज़िक्र किया. उनका कहना था, "जब धमाके होते हैं तो मैं बहुत दुखी हो जाती हूँ क्योंकि लोग मर रहे होते हैं. लेकिन अगले दिन जब वे सामान्य जीवन बिता रहे होते हैं और ख़ुशियाँ मनाते हैं तो मैं भी ख़ुश हो जाती हूँ."

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