पामुक श्रीलंका मेले में नहीं जाएंगे

orhan pamuk
Image caption ओरहान पामुक ने गॉल साहित्य समागम में न जाने का फ़ैसला किया

साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता ओरहान पामुक और बुकर विजेता किरण देसाई श्रीलंका में हो रहे साहित्य समागम में भाग नहीं लेंगे.

दोनों इस समय जयपुर के साहित्य मेले में हिस्सा ले रहे हैं.

श्रीलंका के गॉल में ये फेस्टीवल आयोजित होने वाला है. इसके आयोजकों का कहना है कि भारत के कड़े वीज़ा नियमों को कारण ये लेखक श्रीलंका नहीं आ पा रहे है. भारत की वीज़ा शर्तो के अनुसार देश से बाहर जाकर तुरन्त वापस आना संभव नहीं है.

पर शायद इन लेखकों के न जाने के पीछे श्रीलंका में स्वतंत्रता की आज़ादी पर लग रहे अंकुश भी कारण हो सकता है.

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स और श्रीलंका के निर्वासित पत्रकारों के संगठन ‘जर्नलिस्ट्स फ़ॉर डेमोक्रेसी इन श्रीलंका,’ (जेडीएस) ने एक अंतरराष्ट्रीय अपील में कहा था कि वो श्रीलंका में बोलने की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं. इस बीच उनकों ये बात खल रही है कि “ एक ऐसी भूमि में जहाँ कार्टूनिस्ट्स, पत्रकार, लेखक और विरोधी स्वरों का मौजूदा श्रीलंका सरकार अकसर दमन करती है वहाँ इस तरह से साहित्य का त्यौहार मनाया जा रहा है. ”

जिन जानी मानी हस्तियों ने इस अपील पर हस्ताक्षर किए थे उनमें नोम चौम्सकी, अरुंधति रॉय और केन लोच शामिल है.

इनका कहना है कि गॉल जाने के पहले लेखक और साहित्यकार श्रीलंका के रिकॉर्ड और यहाँ की गंभीर स्थिति का आकलन करें.

पर ऐसे कोई संकेत नहीं है कि पामुक या उनकी भारतीय प्रेयसी किरण देसाई के गॉल न जाने के पीछे ये कारण है.

गॉल फेस्टीवल के आयोजकों का कहना है कि वो भारत सरकार के साथ वीज़ा के मसले को सुलझा नहीं पाए है, जिसकी वजह से दो महीने के पहले ओरहान पामुक भारत फिर से नहीं आ पाएंगे.

अभिव्यक्ति की आज़ादी

गॉल के आयोजकों ने इन लेखकों के ईमेल पर भेजे जवाब का ज़िक्र किया है.

माना जा रहा है कि पामुक ने लिखा है, “ मुझे बहुत दुख है कि मुझे ये निर्णय लेना पड़ा. मैं श्रीलंका की ख़ूबसूरती देखने के लिए आतुर था. ”

वहीं किरण देसाई का लिखना था, “मुझसे दुखी और कोई नहीं होगा. मुझे श्रीलंका बहुत अच्छा लगता है और मुझे पिछली बार गॉल में बहुत मज़ा आया था.”

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि श्रीलंका में पिछले एक दशक में श्रीलंका में 17 पत्रकार और मीडिया कर्मी मारे गए थे. कई को धमकाया गया, कुछ को जेल में डाला गया और कुछ को देश छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा.

पर गॉल साहित्य समागम के संस्थापक जेफ़्री डॉब्स का कहना है कि ये आयोजन अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए ज़रुरी है.

उन्होंने कहा, “देश में ये एक ऐसा अनूठा आयोजन है जहाँ आप खुली बहस कर सकते हैं. हम चाहते हैं कि ये जारी रहे और हम हमेशा लेखकों और पत्रकारों का यहाँ स्वागत करते रहेंगे. वे यहाँ आकर अपनी बात खुलकर कह सकते हैं.”

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