मक्का उत्पाद में अंधाधुन्ध वृद्धि पर संदेह

मक्का
Image caption भारत में मक्का खाद्य के तौर पर कम ही इस्तेमाल होती है

भारत में जैव विविधता के संरक्षण और मोटे अनाज के उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए लड़ने वाली एक संस्था मिल्लेट नेटवर्क ऑफ़ इंडिया ने चेतावनी दी है कि देश में मक्का के उत्पादन को अंधाधुंध प्रोत्साहन देने से खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर समस्याएँ पैदा हो जाएँगी.

संस्था का कहना है की मक्का एक ऐसी फ़सल है जो मानवीय खाद्य के लिए कम और औद्योगिक कामों में ज़्यादा इस्तेमाल होती है और इसे प्रोत्साहन देने से एक ऐसे देश में खाद्य फ़सलों की पैदावार कम हो जाएगी जहाँ अब भी भूख एक बड़ी समस्या है.

इस संस्था के राष्ट्रीय संयोजक पी वी सतीश ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है कि आंध्र प्रदेश सरकार ने मक्का की फ़सल के लिए प्रति एकड़ 5000 रुपए की सहायता की घोषणा की है जब की राज्य में मक्का का उत्पादन पहले ही चार गुना हो चुका है और किसानों की और से ऐसी कोई मांग भी नहीं थी.

उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में गत दस वर्षों में मक्का की बुवाई का इलाका दोगुना होकर साढ़े आठ लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है और उस का उत्पादन चार गुना बढ़ चुका है.

"जब कोई फ़सल इतनी सफल है तो फिर उसे और प्रोत्साहन देने का क्या अर्थ है. सरकार चावल और गन्ने की खेती को ऐसी सहायता क्यों नहीं देती.”

सतीश ने संदेह व्यक्त किया कि यह नीति कृषि क्षेत्र में विश्व स्तर पर खेले जाने वाले खेल का हिस्सा है ताकि अंतरराष्ट्रीय मण्डी में मक्का की दरों को कम क्या जा सके.

उन्होंने कहा कि बीज बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी मोंसंटो भी इस में शामिल है क्योंकि वो बी टी कपास के बाद जेनेटिक फेर बदल द्वारा तैयार किए गए मक्का के बीज देश में लाने की कोशिश कर रही है.

उन्होंने कहा कि गुजरात, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे कई राज्य पहले ही मोंसंटो के इस जाल में फँस गए हैं और वहां की सरकारें इस कंपनी के मक्का के हाईब्रिड बीजों को बढ़ावा दे रही हैं.

इस्तेमाल और ही हैं

पी वी सतीश ने मक्का की खेती को प्रोत्साहन देने में कई खराबिया गिनाते हुए कहा कि सब से बड़ा ख़तरा यह है की किसान खाद्य फसलों को छोड़ कर मक्का की खेती में लग जाएंगे जबकि केवल 35 % मक्का ही मानव खाद्य के लिए और 65 % उद्योगों में इस्तेमाल होती है जिन में कृषि पर आधारित ईंधन, मुर्गियों के लिए चारा और शराब की तैयारी का उद्योग भी शामिल हैं.

Image caption मक्का का इस्तेमाल ईंधन बनाने में भी किया जाता है

उन्होंने कहा की दूसरे इंधनों की क़िल्लत से निबटने के लिए भी मक्का के ज़्यादा उत्पाद की कोशिश की जा रही है जोकि खाद्य सुरक्षा के लिए ख़तरनाक होगा.

सतीश ने मांग की कि मक्का की बजाय सरकार बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाजों के उत्पादन को प्रोत्साहन दे क्योंकि इस से ग़रीबों को सस्ता और पौष्टिक आहार भी मिल सकेगा और यह पर्यावरण की दृष्टि से भी अच्छा होगा.

लेकिन इस संस्था की यह बात शायेद उन बड़े किसानों को पसंद नहीं आएगी जो अंतरराष्ट्रीय मण्डी में भारतीय मक्का की बढ़ती हुई मांग और दर से फ़ायदा उठाना चाहते हैं. अंतरराष्ट्रीय मण्डी में मक्का की कमी हो गई है क्योंकि विश्व में सब से ज़्यादा मक्का पैदा करने वाले देश अमरिका में इसकी फ़सल को नुकसान पहुँचा है.

वैसे आंध्र प्रदेश ही की तरह पूरे भारत में मक्का के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है. पूरे देश में 76 लाख हेक्टेयर से भी ज़्यादा इलाक़े पर इस वर्ष दो करोड़ टन से भी ज़्यादा मक्का का उत्पादन हुआ है.

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