14 तालिबान नेताओं के नाम काली सूची से हटाए गए

तालिबान

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अफ़ग़ानिस्तान के 14 पूर्व तालिबान नेताओं का नाम अंतरराष्ट्रीय काली सूची से हटा दिया है.

ये क़दम अफ़ग़ानिस्तान सरकार के अनुरोध पर उठाया गया है.

इन 14 नेताओं में चार वो नेता भी शामिल हैं जिन्हें पिछले सितंबर में अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने शांति परिषद का सदस्य बनाया था. ये परिषद तालिबान के शांति वार्ता करने के उद्देश्य से गठित किया गया था.

सुरक्षा परिषद ने कहा है कि इन नामों को काली सूची से हटाने से एक बड़ा संदेश मिलता है कि तालिबान को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने की प्रक्रिया का संयुक्त राष्ट्र समर्थन करता है.

हालांकि समझा जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान ने सूची से हटाने के लिए कुछ और नाम भेजे थे जिन्हें सुरक्षा परिषद की मंज़ूरी नहीं मिली है.

उल्लेखनीय है कि अफ़ग़ानिस्तान सरकार पिछले कुछ समय से तालिबान को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के प्रयासों में लगी है. उधर अमरीका ने भी कहा है कि वह तालिबान से शांति वार्ता कर रहा है.

संयुक्त राष्ट्र ने इन प्रयासों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हुए पिछले दिनों तालिबान और अल-क़ायदा को अलग-अलग सूची में रखते हुए उन पर अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लागू करने की घोषणा की थी. पहले संयुक्त राष्ट्र दोनों को एक ही तरह के चरमपंथी गुटों की तरह से देखता था.

संदेश देने का प्रयास

इन तालिबान नेताओं के नाम सूची से हटाने का फ़ैसला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की विशेष प्रतिबंध समिति ने किया है.

अफ़ग़ान अधिकारियों का कहना था कि वे 20 नेताओं का नाम सूची से हटाने का अनुरोध कर रहे हैं.

लेकिन सुरक्षा परिषद के कुछ सदस्य तालिबान नेताओं के नाम सूची से हटाने को लेकर सचेत रहना चाहते हैं. इनमें रूस भी एक है.

इन 14 नेताओं में से चार शांति परिषद के सदस्य हैं. ये चार सदस्य अरसलान रहमानी दौलत, तालिबान सरकार के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री, हबीबुल्लाह फ़ौजी, सऊदी अरब में तालिबान सरकार के राजनयिक, सईदुर रहमान हक़्क़ानी, तालिबान सरकार में खान और खनिज मामलों और लोकनिर्माण विभाग के मंत्री और फ़ाक़िर मोहम्मद हैं.

सुरक्षा परिषद के इस महीने के अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र में जर्मनी के राजदूत पीटर विटिंग ने सुरक्षा परिषद के निर्णय के बारे में कहा, "इस निर्णय के ज़रिए एक बड़ा संदेश दिया गया है कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अफ़ग़ानिस्तान सरकार की इस पहल का समर्थन करता है कि तालिबान के साथ राजनीतिक वार्ता की जाए जिससे शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके."

चार हफ़्ते पहले ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने तालिबान और अल-क़ायदा को अलग-अलग चरमपंथी गुटों की तरह देखने का फ़ैसला किया था. इसके बाद दोनों गुटों पर लगे प्रतिबंध भी अलग-अलग हो जाएँगे.

शुक्रवार को 14 नाम हटाए जाने के फ़ैसले से पहले सुरक्षा परिषद की काली सूची में 137 नाम थे.

इस सूची में नाम होने का अर्थ होता है यात्राओं पर प्रतिबंध और संपत्ति ज़ब्त करने का आदेश.

उल्लेखनीय है कि अफ़ग़ानिस्तान में वर्ष 2001 से पहले तालिबान का शासन था.

लेकिन न्यूयॉर्क में 9/11 के हमले के बाद अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर इस आधार पर हमला कर दिया था कि तालिबान सरकार ने ओसामा बिन लादेन को पनाह दे रखी है.

क़रीब दस साल लंबे युद्ध के बाद अब अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई तालिबान को फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करना चाहते हैं लेकिन अब तक तालिबान इस प्रस्ताव के जवाब में कहते रहे हैं कि इससे पहले सभी विदेशी फ़ौजों को अफ़गानिस्तान छोड़कर जाना होगा.

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