लुंबिनी का विकास अधर में

लुंबिनी

नेपाल के दक्षिण-पश्चिमी मैदानी इलाक़े में स्थित लुंबिनी दुनिया भर में फैले 35 करोड़ बौद्ध धर्म के मानने वालों के लिए सबसे पवित्र स्थान है.

सदियों पहले लुंबिनी में एक बालक का जन्म हुआ था जो बाद में बुद्ध कहलाया.

अरसे से लुंबिनी को इस्लाम के सबसे पवित्र धर्म मक्का की तर्ज पर विकसित करने की योजनाएं बनती रही हैं.

लेकिन अब लुंबिनी में कई आधी बनी हुई इमारते हैं. यूनेस्को ने क़रीब एक दशक पहले लुंबिनी को 'वर्ल्ड हेरिटेज़ साइट'का दर्जा दिया था लेकिन अब तक इस जगह की काया पलट का वादा अधूरा ही है.

घोषणा

इस कालापलट के संबंध में ताज़ा घोषणा 'एशिया पैसिफ़िक एंड को-ऑपरेशन फ़ाउंडेशन'ने की थी. इस संस्था ने कहा था कि वे लुंबिनी में एयरपोर्ट, हाईवे और होटल बनाने के लिए तीन अरब अमरीकी डॉलर जुटाएंगे.

लेकिन नेपाल और चीन सरकार इस भव्य योजना के बारे में अनभिज्ञ हैं.

फ़ाउडेंशन ने कहा है कि वो लुंबिनी को मक्का शहर की तर्ज पर विकसित करने के लिए एक पांच वर्षीय योजना तैयार कर रही है.

हालांकि ये साफ़ नहीं है कि ये योजना कब तक सामने आएगी.

भव्य योजना

एक अन्य चीनी संस्था ने लुंबिनी में सौ मीटर ऊंची बुद्ध की प्रतिमा बनाने का प्रस्ताव दिया है. नेपाल सरकार ने इस प्रस्ताव को मान लिया है लेकिन अभी तक कोई काम शुरू नहीं हुआ है.

लुंबिनी के निवासियों के लिए ये स्थिति काफ़ी निराशाजनक है. उन्हें उम्मीद थी कि एक प्राचीन पवित्र स्थान के पुनरुत्थान से उनकी तकदीर बदलेगी.

एक स्थानीय निवासी अब्दुल अज़ीज़ ख़ान कहते हैं, "हमने कोई उल्लेखनीय विकास नहीं देखा है. कुछ पर्यटक आते हैं लेकिन वो सुविधाओं के अभाव में बहुत कम ख़र्चा करते हैं. इसलिए हमें कोई फ़ायदा नहीं होता."

बौद्ध धर्म के इस पवित्र स्थान के लिए 1978 में जापानी वास्तुकार केंज़ो तांगे ने एक मास्टर प्लान बनाया था. उस योजना के अनुसार लुंबिनी को बुद्ध मठों का एक गढ़ बनाया जाना था जहां श्रद्धालुओं के लिए यातायात की तमाम सुविधाएं होंगी.

इस योजना पर 60 फ़ीसदी काम ही हुआ है.

पवित्र उद्यान, जन्म स्थान के प्रमुख क्षेत्र और आस-पास के मठ क्षेत्र में काम अधूरा पड़ा है.

यूनेस्को के कंसेलटेंट काई वाइस कहते हैं, "मास्टर प्लान के तैयार किए जाने के बाद इसके लिए समर्थन की कमी रही है."

नेपाल के पुरात्तत्व विभाग के पूर्व महानिदेशक कोष प्रसाद आचार्य कहते हैं, "उस योजना के लिए संयुक्त राष्ट्र का समर्थन था इसलिए सोचा गया था कि इसके लिए पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा लेकिन दुखद है कि ऐसा नहीं हो पाया है."

पैसे की कमी

लुंबिनी विकास ट्रस्ट के राजेंद्र बहादुर थापा मगर कहते हैं कि विकास ना होने के पीछे पैसे की कमी है.

उन्होंने कहा कि अधूरा विकास कार्यों को पूरा करने के लिए 11 करोड़ डॉलर चाहिए लेकिन लुंबिनी विकास ट्रस्ट की बजट महज 15 लाख डॉलर है.

लुंबिनी के उत्तर में स्थित एक गांव के निवासी विकास ना होने के लिए स्थानीय प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

सुग्रीब यादव ने बीबीसी को बताया,"लुंबिनी प्रशासन स्थानीय लोगों के साथ कोई चर्चा नहीं करता. प्रशासन आस-पास के क्षेत्र में विकास करने की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है. लुंबिनी में भी पवित्र स्थल को विकसित करने की कोशिशें काफ़ी नहीं हैं."

कुछ लोगों के अनुसार लुंबिनी के नज़दीकी शहर भैरहावा में सीमेंट कारखानों का जमावड़ा से पर्यावरणीय ख़तरा भी पैदा हो गया है.

युनेस्को के काई वेइस कहते हैं, "पास ही सीमेंट और अन्य कारखाने हैं. इस बात का ख़तरा है कि वहां से होने वाले प्रदूषण से पवित्र स्थल की शांति भंग होगी."

और उधर में राजनीतिक अस्थिरता जारी है, जहां जंग से शांति की ओर का रास्ता काफ़ी मुश्किल साबित हो रहा है.

ऐसे समय में लुंबिनी के विकास पर से ध्यान हट सा गया है.

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