निर्वासित तिब्बतियों के नए प्रमुख

लोबसांग सांगे और दलाई लामा इमेज कॉपीरइट AP

निर्वासित जीवन जी रहे तिब्बतियों के नए राजनेता लोबसांग सांगे ने शपथ ग्रहण के बाद कहा है कि वे चीन के उपनिवेशवाद से संघर्ष जारी रखेंगे.

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में उन्हें नए राजनीतिक प्रमुख के रूप में शपथ दिलाई गई. वे अब तिब्बतियों की निर्वासित सरकार के नए प्रमुख बन गए हैं.

इस मौक़े पर तिब्बतियों के धार्मिक नेता दलाई लामा भी मौजूद थे. लोबसांग सांगे को दलाई लामा के कुछ अधिकार मिल गए हैं. लेकिन दलाई लामा निर्वासित तिब्बतियों के धार्मिक नेता बने रहेंगे.

इस साल अप्रैल में ही हार्वर्ड प्रशिक्षित शिक्षाविद लोबसांग सांगे को कालोन त्रिपा यानी निर्वासित सरकार के प्रमुख के रूप में चुन लिया गया था. सांगे के चयन पर कई लोगों आश्चर्यचकित भी हुए थे.

कुछ लोगों का ये भी डर है कि लोबसांग चीन के प्रति कट्टर रुख़ अपना सकते हैं. चीन धर्मशाला में तिब्बतियों की निर्वासित सरकार को मान्यता नहीं देता.

लोबसांग को न सिर्फ़ तिब्बतियों के अधिकार और चीन से आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाना है, बल्कि उन्हें निर्वासित सरकार का काम भी देखना है.

चुनौती

उनकी सबसे बड़ी चुनौती ये है कि कोई भी देश उनकी निर्वासित सरकार को मान्यता नहीं देता. उन्हें भी न तो अपने देश और न ही प्रशासन का अनुभव है.

अपने शुरुआती संबोधन में उन्होंने उन चिंताओं को ख़ारिज किया कि दलाई लामा की बढ़ती उम्र और उनके न रहने पर 1959 से चल रहा आंदोलन ख़त्म हो जाएगा.

लोबसांग ने कहा कि उनका चुनाव चीनी सरकार के कट्टरपंथियों के लिए स्पष्ट संदेश है कि तिब्बती नेतृत्व झुकने वाला नहीं है.

उन्होंने कहा कि उनलोगों का संघर्ष चीन के लोग या फिर एक देश के रूप में चीन के ख़िलाफ़ नहीं है.

लोबसांग ने कहा, "हमारा संघर्ष तिब्बत में चीनी शासन की कट्टरपंथी नीतियों से है. हमारा संघर्ष उन लोगों से है जो तिब्बतियों की स्वतंत्रता, न्याय के अधिकार और उनकी पहचान के ख़िलाफ़ हैं. तिब्बत में कोई समाजवाद नहीं है. वहाँ उपनिवेशवाद है. तिब्बत में चीन की सरकार अन्यायपूर्ण है."

शपथग्रहण समारोह धर्मशाला के सुगलाखांग मंदिर में संपन्न हुआ.

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