भट्टाराई के सामने चुनौतियों का पहाड़

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कम्युनिस्ट विचारक, एक आर्किटेक्ट और कम बोलने वाले एक नेता. बाबूराम भट्टाराई नेपाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी के तीन उपाध्यक्षों में से एक हैं.

सोमवार को बतौर प्रधानमंत्री शपथ लेने से पहले भट्टाराई सिर्फ़ एक ही बार सरकार में रहे हैं जबकि पार्टी प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड के शासनकाल के दौरान वह वित्त मंत्री थे.

नेपाल के एक दूर-दराज़ के एक गाँव में 1954 में जन्मे भट्टाराई की पहचान पढ़े-लिखे नेता के रूप में है. उन्होंने अपने समय में देश भर में हाई स्कूल और कॉलेज स्तर पर परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पाया था.

भट्टाराई ने नई दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से 1986 में पीएचडी की थी और उससे पहले चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली थी.

वैसे भारत में उनकी इस पढ़ाई-लिखाई की छाया उनके राजनीतिक जीवन पर भी पड़ी. काफ़ी समय तक उन पर 'भारत समर्थक' होने का आरोप लगता रहा जिससे उन्हें निबटना पड़ा.

ये आरोप उन पर पार्टी के भीतर भी और पार्टी प्रमुख प्रचंड की ओर से भी लगा.

संघर्ष

भारत में बतौर छात्र उन्होंने नेपाली छात्रों को एकजुट करने की कोशिश की और एक तरह से वहीं से उनका राजनीतिक जीवन शुरू हुआ.

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Image caption नेपाल में माओवादियों के संघर्ष के दौरान भट्टाराई ही पार्टी का प्रमुख चेहरा थे

इस जीवन के दौरान जब 1996 में उनकी पार्टी ने 'जनयुद्ध' छेड़ा तो उन्हें लगभग एक दशक तक भूमिगत भी होना पड़ा.

सशस्त्र संघर्ष के दौरान भट्टाराई ही माओवादियों का चेहरा थे. पार्टी जब तक भूमिगत थी तब तक प्रचंड की तस्वीरें बाहर नहीं आती थीं और भट्टाराई ही माओवादियों का जाना-माना चेहरा थे.

नेपाल में जब राजतंत्र हटा उससे पहले और बाद में पार्टी की ओर से भट्टाराई ही हमेशा एक प्रमुख वार्ताकार रहे.

अप्रैल 2008 में संविधान सभा के लिए हुए चुनाव में भट्टाराई ने सर्वाधिक मत बटोरे और सबसे बड़े अंतर के साथ चुने गए.

उसके बाद जब प्रचंड के नेतृत्त्व में सरकार बनी तो भट्टाराई को वित्त मंत्रालय सौंपा गया और उनके नेतृत्व क्षमता की कई जगह सराहना भी हुई.

इसके बाद एक-एक कर सरकारें गिरती गईं और भट्टाराई के लोकप्रियता का ग्राफ़ उठता गया. स्थानीय मीडिया के कई सर्वेक्षणों में उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे पसंदीदा उम्मीदवार बताया गया.

लोगों की ये उम्मीद तो पूरी हो गई मगर उसने भट्टाराई के सामने चुनौतियों की एक नई राह खोल दी है.

चुनौतियाँ

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Image caption भट्टाराई के प्रचंड के साथ संबंध खट्टे-मीठे रहे हैं

इस संविधान सभा का कार्यकाल 31 अगस्त को समाप्त हो रहा है और उससे पहले ही उनकी सरकार को इसके विस्तार के लिए बाक़ी राजनीतिक दलों से मिलकर आम सहमति बनानी होगी.

माना जा रहा है कि इस बार का विस्तार आख़िरी विस्तार होगा और सभा को या तो अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी होगी या विफलता का ठप्पा लगवाना होगा.

माओवादियों के बाद संसद की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है नेपाली कांग्रेस और तीसरे नंबर पर है नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-एमाले. इन दोनों ने विपक्ष में बैठने का फ़ैसला किया है.

अब जब तक ये दोनों पार्टियाँ सहमति नहीं देतीं सभा के विस्तार के लिए ज़रूरी दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं हो सकता.

उन्होंने छोटी मधेसी पार्टियों के सहारे बहुमत तो हासिल कर लिया है मगर वह समर्थन भी कमज़ोर ही है.

जब तक उन्हें व्यापक समर्थन हासिल नहीं होता वह प्राथमिकताएँ पूरी नहीं कर सकेंगे. इन प्राथमिकताओं में माओवादी लड़ाकुओं को समाज में वापस शामिल करने से लेकर नया संविधान लिखा जाना तक शामिल है.

अभी 19 हज़ार से ज़्यादा माओवादी लड़ाकू देश भर में कई छावनियों में रह रहे हैं.

वैसे विश्लेषकों के अनुसार भट्टाराई को सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद उनकी पार्टी के अंदर से ही मिल सकती है. उपरोक्त दोनों मुद्दों पर उन्हें प्रभावशाली कट्टरपंथियों की ओर से चुनौती मिलने की संभावना है.

इनके साथ ही पार्टी प्रमुख प्रचंड के साथ भी उनके रिश्ते बेहद सौहार्दपूर्ण नहीं रह गए हैं. ये रिश्ते कुछ खट्टे कुछ मीठे से हो गए हैं. सिर्फ़ नौ महीने पहले भट्टाराई अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ गए थे क्योंकि तब प्रचंड ने 'जनविद्रोह' का समर्थन किया था.

वैसे कुछ ही महीने बाद प्रचंड भट्टाराई के साथ आ गए और उन्होंने 'शांति और संविधान' के सिद्धांत का समर्थन किया.

एक महीने पहले भट्टाराई ने कट्टरपंथियों की मदद से प्रचंड के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी और पार्टी में ज़िम्मेदारियाँ बाँटने की वकालत की थी. इसी का नतीजा था कि प्रचंड को न चाहते हुए भी भट्टाराई के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का समर्थन करना पड़ा.

अब अगर वह चुनौतियों को पार नहीं कर सके तो बतौर छात्र उनका चो प्रभावशाली रिकॉर्ड था वो बतौर राजनेता धूमिल हो सकता है.

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