बड़ी मुश्किल से डाकिया डाक लाया

अफ़ग़ानिस्तान में चिट्ठी पहुँचाना मुश्किल काम
Image caption अफ़ग़ानिस्तान में डाकिए को एक चिट्ठी पहुँचाने में घंटों का समय लग जाता है

वैसे तो अब ई-मेल के ज़माने में डाकिया शहरों में कम ही दिखाई देता है मगर फिर भी याद करिए कि कैसे चिट्ठी हाथ में लिए वो मकानों के नंबर और गलियों के नाम से घर ढूँढ़कर चिट्ठियाँ पहुँचाता था.

पर सोचिए ऐसे शहर में डाकिए का काम कितना मुश्किल होगा जहाँ कम ही घरों के नाम या नंबर ही हों और कम ही सड़कों और गलियों के कोई नाम हों.

ऐसा हाल किसी छोटे शहर में नहीं बल्कि एक देश की राजधानी में है और वो देश है अफ़ग़ानिस्तान. काबुल में डाकिए के लिए शहर की गलियों में घूमते हुए चिट्ठी सही पते पर पहुँचाना काफ़ी मुश्किल काम है.

इस शहर की आबादी लगभग चालीस लाख की है और हर साल सैकड़ों घर और गलियाँ बनते जा रहे हैं.

वहाँ पर गलियों के नाम या घरों के नंबर बहुत ही कम हैं. साथ ही केंद्रीय पोस्ट ऑफ़िस अभी पिन कोड भी पूरी तरह लागू नहीं कर पाया है.

तो फिर इस शहर में चिट्ठी सही पते तक पहुँचती कैसे है? काबुल के एक पोस्ट ऑफ़िस में 30 निजी और आधिकारिक ऐसे पत्र दिखे जिन पर कोई सही पता नहीं लिखा था बल्कि अंदाज़े से कुछ दिशा बताई गई थी.

अमरीका से आई एक चिट्ठी में सिर्फ़ इतना लिखा था- 'हामिद जान, दारुल अमन पैलेस के पीछे'.

पता कसाई का

एक अन्य पत्र में डाकिए को 'उमर जान मस्जिद के पीछे' का पता बताया गया था तो तीसरे में महज़ ये लिखा था कि चिट्ठी पाने वाला 'अलाउद्दीन स्कूल के पास' रहता है.

अफ़ग़ान पोस्ट के साथ दो वर्षों से काम कर रहे अहमद ओमिद कहते हैं, "चिट्ठी पाने वालों का पता हमेशा ही अंदाज़े से लिखा होता है. लोग इस हिसाब से पते लिखते हैं जैसे पहुँचाने वाला चिट्ठी पाने वाला का कोई दोस्त हो. कई बार तो एक चिट्ठी पहुँचाने में घंटों लग जाते हैं."

साइकिल पर जाकर चिट्ठियाँ पहुँचाने वाले अहमद को एक पता ढूँढ़ने के लिए अपनी ख़ुद की जानकारी और स्थानीय लोगों की मदद का सहारा लेना पड़ता है.

मैं ऐसे ही एक अभियान पर अहमद के साथ निकला जहाँ अहमद को अमरीका से हामिद जान के नाम आई चिट्ठी पहुँचानी थी.

हम काबुल के दक्षिण में दारुल अमन की ओर बढ़े. ये महल पूर्व अफ़ग़ान शासक अमानुल्लाह ख़ान के शासन के दौरान लगभग 90 साल पहले बनवाया गया था. 1970 के गृह युद्ध के दौरान ये काफ़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था.

रास्ते में हमने लगभग हर व्यक्ति से पूछा और उनमें पुलिसवालों से लेकर छात्र तक शामिल थे कि कोई तो हामिद जान के बारे में बता दे. कोई कह रहा था कि सीधे जाओ तो कोई अपने जानने वाले हामिद जान का पता दे देगा मगर फिर पता चलता कि वो हमारा वाला हामिद जान नहीं है.

अफ़ग़ानिस्तान में लोग अपने पेशे से जाने जाते हैं और पता चला कि हम जिस हामिद को ढूँढ़ रहे थे वो एक कसाई था.

कोशिश जारी

Image caption अफ़ग़ानिस्तान में लोगों का पता पूछने के लिए उनके पेशे का सहारा लेना पड़ता है

यानी 32 डिग्री सेल्सियस तापमान में दो घंटे साइकिल चलाने के बाद और लगभग एक दर्जन लोगों से पूछने के बाद हम हामिद जान के घर पहुँचे. हमारा अभियान क़ामयाब हुआ.

अफ़ग़ानिस्तान वैसे तो यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य 1928 में ही बन गया था मगर तब से अब तक वो इसका कोई फ़ायदा नहीं उठा पाया है.

काबुल पोस्ट ऑफ़िस के प्रमुख मोहम्मद यास्मिन रहमती कहते हैं कि उनके काम का ज़्यादातर हिस्सा आधिकारिक चिट्ठियाँ पहुँचाने का है.

उनके अनुसार, "इंटरनेट के इस्तेमाल से और आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ लोग अब ईमेल करने लगे हैं."

वैसे अफ़ग़ान पोस्ट ने यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के साथ मिलकर ठीक ढंग से पोस्ट कोड और पते लगाने का काम शुरू तो किया है मगर इसमें अभी समय लगेगा.

संबंधित समाचार