कहीं ख़ुशी, कहीं मायूसी

चेपांग समुदाय के लोग
Image caption नेपाल में एक तरफ़ त्योहार का जश्न है तो दूसरी तरफ़ मायूसी

नेपाल में हज़ारों लोग दशेन नाम के त्योहार के जश्न में डूबे हैं.

देश भर के शहरों और गांवों में लोग अपने घरों को सजा-संवार रहे हैं और जो लोग काम के सिलसिले में अपने घर छोड़ कर दूसरी जगहों पर पहुंचे थे वो वापिस अपनों के बीच लौट रहे हैं.

सरकारी दफ़्तर, स्कूल और व्यापारिक संस्थानों में छुट्टी है ताकि चार दिनों तक चलने वाले पर्व को मनाए जा सके. सुबह और शाम को दुर्गा माता के मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लग रहा है.

परंपरा के अनुसार दुर्गा मां को रक्त की भेंट चढ़ाने के लिए हज़ारों बकरियों और मुर्गों की बलि दी जा रही है.

ये जश्न अधूरा है..

लेकिन इस सब के बीच दलित और चेपांग समुदाय के लोग कह रहे हैं कि उनके पास पेट भरने तक के लिए अन्न नहीं है.

नेपाल के मध्य-पश्चिम डांग ज़िले में मानसारी एक भूमिहीन दलित महिला है जिसके सात संतानें है. वो कई अन्य दलितों के साथ डांग में नदी के किनारे हर दिन जी तोड़ मेहनत करती हैं.

ये लोग पत्थर तोड़कर अपना गुज़ारा चलाते हैं.

मानसारी ने बीबीसी को बताया, “दशेन का पर्व आ गया है लेकिन हमारे पास तो जीने भर के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं हैं. हम त्योहार कैसे मना सकते हैं? ”

दिलसारी नाम की दूसरी दलित महिला कहती है, “ ये दशेन क्या है, हमें नहीं मालूम. हमारे लिए तो ये एक दशा ( बदनसीबी ) है. ”

मध्य नेपाल के चितवन में चेपांग समुदाय के लोग भी नाख़ुश हैं.

हाल ही में इस समुदाय के बहुत से लोग स्थानीय लोथार बाज़ार केले बेचने के लिए पहुंचे.

'कपड़े चाहिए पर पैसे नहीं हैं...'

एक फटी हुई कमीज़ पहने चंद्रालाल चेपांग ने बताया, “मैं अपने और अपने बच्चों के लिए नए कपड़े ख़रीदना चाहता हूं लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं. मेरी आय तो भोजन के लिए भी कम पड़ती है.”

उनके लिए तो दशेन सिर्फ़ मुसीबत है.

चंद्रालाल चेपांग कहते हैं, “मैं पहाड़ी पर स्थित अपने गांव से बारह घंटे तक पैदल चलकर यहां पहुंचा हूं. इसके बावजूद मुझे अपने परिवार के गुज़ारे के लिए कमाई नहीं हुई है.”

लेकिन शहरों में लोग मंहगी और चमचमाती दुकानों में जमकर ख़रीदारी कर रहे हैं.

उधर डांग से लेकर चितवन तक पूरे ग्रामीण नेपाल में हालात अलग हैं और हो सकता है कि वो कईयों को देखने में अच्छे ना लगें.