श्रीलंका में वेबसाइटों पर नया प्रतिबंध

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Image caption श्रीलंका में वेबसाइटों पर पहले भी प्रतिबंध लगते रहे हैं. तस्वीर गेटी

श्रीलंका के मामलों पर रिपोर्ट लिख रही कई न्यूज़ वेबसाइटों पर सरकार ने रोक लगा दी है.

श्रीलंका की सरकार ने चेतावनी दी है कि देश के मामले में लिख रही सभी वेबसाइट सरकार के साथ पंजीकरण कराएँ, अन्यथा उनके खिलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.

अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाने वाले दलों ने इसे श्रीलंका में वेबसाइटों पर सेंसर चलाने की कड़ी में ही एक नया क़दम बताया है. पिछले कुछ दिनों में श्रीलंका में छह वेबसाइटों को ब्लॉक कर दिया गया है.

इनमें से एक मुख्य विरोधी दल यूनाइटेड नेशलन पार्टी की नई वेबसाइट है. जबकि एक दूसरी वेबसाइट के दफ़्तर में पिछले दिनों आग लग गई थी.

मीडिया मंत्रालय के सचिव ने बताया कि इन वेबसाइटों को इसलिए बंद किया गया है क्योंकि ये राष्ट्रपति और सरकारी अधिकारियों का चरित्र हनन कर रहे थे.

सचिव ने लंकाद्वीप अख़बार को बताया कि देश के बारे में कोई भी ख़बर देने वाली किसी भी वेबसाइट को सरकार के साथ पंजीकरण कराना होगा, चाहे उसका संचालन विदेश से ही क्यों न हो रहा हो.

'बेतुका फ़ैसला'

विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता मंगला समरवीरा ने बताया कि यह एक 'बेतुका' फ़ैसला है और सरकार व्यर्थ ही डर रही है.

वैसे तो इन बंद वेबसाइटों को देश में सीधा खोला नहीं जा सकता है, लेकिन आधुनिक और हाई-टेक कंप्यूटरों की मदद से 'प्रौक्सी' यानी किसी दूसरे प्रतिनिधी वेबसाइटों के ज़रिए इन्हें खोला जा सकता है.

लेकिन इस तरह के क़दम से यह पता चलता है कि सरकार के धैर्य की क्या सीमा है.

तमिल टाइगर की समर्थक वेबसाइट 'तमिलनेट' 2007 से बंद है, जबकि कई दूसरी वेबसाइट भी समय-समय पर बंद होते रही हैं. सरकार के एक समर्थक ने बीबीसी को बताया कि हालांकि श्रीलंका में लड़ाई ख़त्म हो गई है लेकिन देश के बाहर रह रहे तमिल अलगाववादियों के जनसंपर्क आंदोलन से 'प्रचार की लड़ाई' अभी भी चालू है.

पेरिस स्थित अभियान दल 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' का कहना है कि वेब पत्रकार और मीडिया अब भी हिंसा का शिकार हैं और दोषियों को दण्ड से मुक्ति मिली हुई है.

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