नेपाल का एक अनोखा गांव

नेपाल का बर्दिया गांव (फ़ाईल फ़ोटो)
Image caption इस गांव ने अपने लिए एक खा़स जगह बना ली है.

नेपाल में जंगलों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव वनों के सामूहिक प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक उन्नति के अपने अनोखे प्रयोग के चलते दुनिया के नक़्शे पर आ गया है.

यह गाँव शिव सामुदायिक वन क्षेत्र का हिसा है, जिसे बीबीसी की ओर से न्यूज़ वीक पत्रिका और शेल कंपनी के सहयोग से संचालित वार्षिक प्रतियोगिता विश्व चुनौती 2011 के बारह अंतिम प्रतिभागियों में चुना गया है.

प्रतियोगिता के लिए 11 नवंबर तक ऑनलाइन मतदान होगा और इसके नतीजे तीन दिसंबर को घोषित होंगे. जीतने वाले को 20 हज़ार और दो रनर्स को दस दस हज़ार डॉलर का अनुदान मिलेगा.

रात के क़रीब दस बजे हैं.

शिवा सामुदायिक वन क्षेत्र के डल्ला गाँव के सभागार में मेहमानों के लिए विशेष रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. थारू जनजाति के लाठी और झुरमा नाच की प्रस्तुति पर मेहमान लोग भी ताली बजाते हुए शामिल हो जाते हैं.

सुरक्षा और मनोरंजन

गाँव पंचायत के एक प्रमुख कर्ता-धर्ता परशुराम चौधरी का कहना है कि अतीत में उनके पुरखों ने हिंसक जंगली जानवरों के आक्रमण से बचने के लिए लाठी नाच का आविष्कार किया था.

Image caption गांव की पंचायत के मुखिया मंगल चौधरी

परशुराम चौधरी ने बताया, ''हमारे पुरखे लोग जिस समय गाय भैंस चराने के लिए जंगल में जाते थे, तो कोई भी वन्य जंतु या कोई दुश्मन आक्रमण करने के लिए आते थे. उसके प्रतिकार के लिए वे लोग लाठी नचाते थे. जब बोर हो जाते थे उस समय मनोरंजन के लिए भी आपस में दोस्तों से लाठी नचाकर भरपूर मनोरंजन लेते थे.”

थारु जनजाति के लोगों का यह डल्ला गाँव नेपाल के बर्दिया राष्ट्रीय निकुंज के खाता कोरिडोर में बसा है. यह इलाक़ा भारत के बहराइच ज़िले के कतरनियाघाट संरक्षित वन से जुड़ा है.

जहाँ कतरनिया घाट का इलाक़ा इन दिनों आदमख़ोर बाघों और चीतों के हमलों से परेशान है, वहीं डल्ला के थारु समुदाय ने अपने परंपरागत ज्ञान और सामूहिक प्रयास से हिंसक जानवरों से जान माल की सुरक्षा का टिकाऊ और लाभदायक तरीक़ा खोज लिया है.

बर्दिया के इस जंगल में मुख्य रूप से बाघ, चीतल, गैंडा और हाथियों का वास है. विशेषकर हाथी और गैंडा फ़सलें उजाड़ देते थे. लोगों को अपनी फ़सल बचाने के लिए मचान बनाकर रखवाली करनी पड़ती थी.

जंगली जानवर कई बार खेती किसानी में लगे लोगों को जान से भी मार देते थे. यह एक ऐसी विकट समस्या थी, जिसके समाधान के लिए कई बार स्थानीय लोग जंगली जानवरों को मार देते थे.

जंगली जानवरों के शिकारी और तस्कर भी मानव और वन्य जंतुओं के बीच इस संघर्षपूर्ण स्थिति का फ़ायदा उठाते थे. मरे हुए गैंडे और बाघ के अंग यहाँ से आसानी से चीन पहुँच जाते हैं, जहाँ इनके ऊँचे दाम मिलते है.

Image caption इस होम स्टे में बहुत सारे पर्यटक रहने लगे हैं.

सदियों से जंगलों में रहने वाले थारु किसानों को यह जानकारी थी ही कि गैंडा और हाथी जैसे शाकाहारी जानवरों को मेंथा और कैमामाइल या बाबुने के फूल की गंध से नफ़रत है और वह उससे दूर रहते हैं.

इसलिए प्रयोग के तौर पर किसानों ने मिंट या मेंथा और कैमामाइल या बाबुने के फूल की खेती शुरू कर दी. गाँव की बाहरी सीमा के खेतों में ये दोनों नई फ़सलें उगाने से गैंडा और जंगली हाथी गाँव से दूर रहने लगे.

साथ ही साथ गाँव वालों ने गैंडे के पालन पोषण में मदद के लिए एक बड़ा तालाब बनाया, जो पर्यटकों को आकर्षित करता है.

धीरे धीरे यह प्रयोग शिव सामुदायिक वन क्षेत्र के ढोढरी, सूर्यपटुवा और सानोश्री गाँवों में फैल गया. इससे यहाँ होने वाला मानव और वन्य जीव संघर्ष थम गया.

पंचायत के मुखिया मंगल चौधरी कहते है, ''यह सब काम हम लोग संरक्षण के लिए कर रहे हैं. हम लोग दुर्लभ पशु गैंडा का संरक्षण कर रहे हैं. यहाँ की जड़ी बूटी, जैव विविधता और यहाँ के टाइगर, इन सबका संरक्षण करते हैं.”

उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए परशुराम चौधरी कहते हैं कि इस प्रयोग से जानवरों के साथ इंसानी टकराव समाप्त हुआ और आर्थिक लाभ भी हो रहा है.

परशुराम चौधरी के शब्दों में, ''मानव और वन्य जंतु के बीच में जो द्वंद्व है, आपस में जो मनमुटाव हो जाता है, वे लोग हमारी फ़सलों की बाली खा लेते हैं तो हम लोग द्वंद्व को कम करने के लिए मेंथा और कैमामाइल फूल लगा देते हैं.”

परंपरागत गेंहू की खेती के मुक़ाबले मिंट और कैमामाइल की खेती से आमदनी कई गुना बढ़ गई है.

मेंथा और कैमामिल फूलों के तेल का निर्यात ऊँचे दाम पर यूरोप एवं अन्य देशों को होता है.

बात दूर तक गई तो वन और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस प्रयोग को हर्बल रेमेडी या जड़ी बूटी का इलाज नाम दे दिया.

पर्यावरण संरक्षण की ओर एक और क़दम उठाते हुए यहाँ के किसानों ने खेतों की मेड़ों पर ढैंचा लगाना शुरू किया, जिससे फ़सलों के लिए रासायनिक खादों की ज़रुरत नहीं रही.

Image caption सुमित्रा और सुमित भी इस स्टे होम में रहकर काफ़ी ख़ुश हुई.

प्लास्टिक और अन्य कचरे को इकट्ठा कर ठिकाने लगाने की भी व्यवस्था है.

जलावनी लकड़ी की ज़रुरत कम करने के लिए घरों में गोबर गैस प्लांट लगाए गए हैं. गाँव पंचायत ने बिजली के वितरण की व्यवस्था अपने हाथ में ले रखी है.

आमदनी बढ़ी तो सामुदायिक प्रयास से पक्की इमारत बनाकर स्कूल खोला गया.

होम स्टे

नेपाल सरकार ने इस साल पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम स्टे या पेइंग गेस्ट की योजना लागू की, तो इस गाँव ने फ़ौरन उसे अपना लिया.

क़रीब के दर्जन घरों में लोगों ने एक या दो कमरे अतिरिक्त बना लिए हैं. पर्यटक इनमे मात्र सौ रूपए रोज़ देकर रह सकते हैं.

थारू परिवार पर्यटकों को अपना परम्परागत खाना और नाश्ता देते हैं. शाम को मनोरंजन के लिए थारू नृत्य का कार्यक्रम होता है.

अब तक क़रीब एक हज़ार लोग इन घरों में मेहमान के तौर पर रुक चुके हैं.

सुमित्रा और सुमित गिरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग के लिए आयोजित शिविर में इसी होम स्टे में ठहरी थीं.

सुमित्रा का कहना है, ''हमें यहाँ रुकना बहुत अच्छा लगा. यहाँ की संकृति, यहाँ की परंपरा, यहाँ के लोग और मेहमानों के स्वागत का तौर तरीक़ा अच्छा लगा.”

वहीं सुमित गिरी का कहना है कि गाँव में परिवार के साथ रहने से थारू समुदाय की संस्कृति, पहनावा और खानपान क़रीब से देखने को मिला.

नेपाल में हिमालय की तराई में बसा यह शिव सामुदायिक वन क्षेत्र थारू समुदाय की सूझबूझ से प्रकृति और संकृति का संगम बन गया है.

संबंधित समाचार