अमरीका के बाद-कैसा होगा इराक़?

 शुक्रवार, 18 नवंबर, 2011 को 03:22 IST तक के समाचार
अमरीकी फौज

31 दिसंबर 2011 तक इराक़ में तैनात सभी अमरीरी सैनिक वापस लौट जाएंगे

जैसे-जैसे 31 दिसंबर की समय-सीमा नज़दीक आ रही है वैसे-वैसे ये सवाल खड़ा हो रहा है कि आख़िर अमरीका अपने पीछे किस तरह का इराक छोड़कर जा रहा है.

बीबीसी संवाददाता गैबरियाल गेटहाउस ने बग़दाद में इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश की.

बग़दाद से 50 किलोमीटर दक्षिण में बसा कैंप कलसू एक सैन्य बस स्टॉप है जो आजकल काफी व्यस्त रहता है.

यहां से होकर गुज़र रहे एक ठेकेदार जॉन का कहना है कि इराक़ में हालात सामान्य करने के लिए उनसे जो बन पड़ा और जो भी कहा गया उन्होंने किया है.

जॉन उन हज़ारों अमरीकी नागरिकों और सैनिकों में से एक हैं जो इराक़ छोड़ वापस अमरीका लौटेंगे.

इस मिलिट्री बेस से होते हुए रोज़ाना हज़ारों ट्रक और टैंक कुवैत की ओर बढ़ रहे हैं.

इराक़ में अभी भी 30 हज़ार के आस-पास अमरीकी सैनिक हैं जो दिसंबर के अंत तक वापस अपने देश लौट जाएंगे.

ऊंची कीमत

"अमरीका ने इराक पर हमला करते वक्त कहा था कि वो हमें सद्दाम हुसैन से मुक्त कर इराक को जन्नत बना देंगे, लेकिन वो जन्नत है कहां ? "

हुसैन मातर,इराक़ी नागरिक

इराक की लड़ाई में अमरीका को भी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है, एक खरब डॉलर खर्च करने के अलावा अमरीका को अपने साढ़े चार हज़ार सैनिकों से भी हाथ धोना पड़ा है.

अब जो सैनिक वापस वतन लौट रहे हैं...उनके ज़हन में बस एक ही सवाल है क्या ये वाकई सही रहा?

लेकिन कैंप के प्रबंधक जैसन किडर कहते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को अपनी उपलब्धियों पर गर्व है,

उनका कहना है, ''आज यहां के बाज़ार खुले हैं, नलों में पानी आ रहा है और घरों तक बिजली पहुंची है, ये सब कुछ मुमकिन हुआ है अमरीकी फौज और इराकी सरकार की मिलीजुली कोशिश से जिससे यहां के लोगों का जीवन फिर से सामान्य हो पाया है.''

लेकिन किडर की सोच से नज़दीक के कस्बे, इसकेंद्रियाह के लोग इत्तेफाक़ नहीं रखते

कर्बला में टैक्सी चालक हुसैन मातर को शिकायत है कि उनके यहां अब भी पानी, बिजली और पक्की सड़कें नज़र नहीं आती.

हुसैन पूछते हैं कि अमरीका ने इराक़ पर हमला करते वक्त कहा था कि वो हमें सद्दाम हुसैन से मुक्त कर इराक़ को जन्नत बना देंगे, लेकिन वो जन्नत कहां है?

वो कहते हैं, ''यहां के हालात और बिगड़ गए हैं''.

इराक़ ने इस लड़ाई में अमरीका से कई गुना ज़्यादा कीमत चुकाई है, इराक़ ने इस लड़ाई में वर्ष 2003 से अब तक एक लाख लोगों की जान गंवाई है.

पिछले महीने भी यहां गोली बारी और धमाकों में 258 लोगों की मौत हो गई थी जो कि यहां के लिए अब एक सामान्य बात हो गई है. एक आम इराक़ी आज भी हिंसा के साये में जी रहा है और देश का बुनियादी ढांचा अब भी अस्त-व्यस्त है.

"चूकिं अमरीका इराक और अफग़ानिस्तान में व्यस्त है, तो इरान कुछ भी कर सकता है, ऐसा लगता है मानो इराक एक ऐसी लड़ाई का मैदान बन गया है जहां हर कोई अपनी गोटी फिट करना चाहता है"

इराक़ी नागरिक

पुरानी आदतें,जल्दी नहीं जाती

सही हो या ग़लत लेकिन ज़्यादातर इराक़ी इन हालात के लिए अमरीका को दोषी मानते हैं.

हुसैन मातर कहते हैं कि इराक़ के हालातों की वजह से कई दूसरे देशों को फ़ायदा हुआ है जैसे कुवैत, सऊदी अरब और ईरान.

चूंकी अमरीका इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में व्यस्त है, तो ईरान कुछ भी कर सकता है, ऐसा लगता है मानो इराक़ एक ऐसी लड़ाई का मैदान बन गया है जहां हर कोई अपनी गोटी फिट करना चाहता है.

तो आखिरकार इराक़ियों के लिए अमरीका ने पीछे क्या छोड़ा है?

'यहां लोकतंत्र और बोलने की आज़ादी है'

25 फरवरी 2011 को जब सभी अरब देशों में विरोध के स्वर तेज़ हुए थे तब इराक़ के लोग भी बग़दाद के तह़रीर चौक पर इकट्ठा हुए

ये वे लोग थे जिन्होंने एक साल पहले यहां कि मिलीजुली सरकार के पक्ष में वोट डाला था लेकिन अब बेहतर जन-सुविधाओं और भ्रष्ट्राचार से मुक्ति की मांग कर रहे थे.

सद्दाम हुसैन

सद्दाम हुसैन की मौत के बाद लोगों को इराक़ में आमूलचूल बदलाव की उम्मीद थी.

स्वतंत्र पत्रकार डेनियल स्मिथ के अनुसार ये वो तस्वीरें थीं जो सद्दाम हुसैन के दौर में मुमकिन नहीं थी, लेकिन जैसा कि हमेशा से होता आया है पुरानी आदतें आसानी से नहीं जाती, ठीक वैसे ही स्थानीय मीडिया के हटते ही सेना ने वहां जमा हुए लोगों को खदेड़ दिया.

सुरक्षा गार्डों ने अगले 40 मिनटों तक प्रदर्शनकारियों को खदेड़ते हुए उन्हें पीटा, उसके बाद चार पत्रकारों को पकड़कर उन्हें धमकाया गया कि वे तह़रीर चौक की तरफ ना जाएं.

बाद के महीनों में वहां के सरकारी टीवी में एक किस्म का अभियान चलता रहा जिसमें ये बताया कि तह़रीर चौक पर प्रदर्शन कर रहे लोग सद्दाम समर्थक थे.

मोक़तदा की जीत

2003 में अमरीका के हमले के बाद इराक़ में ताकत का स्थानंतरण हुआ है, जो विशिष्ठ सुन्नी वर्ग के हाथों से निकलकर बहुसंख्यक शियाओं के हाथ में चली गई है.

ये वो लोग हैं जिन्हें सद्दाम के जाने का सबसे ज़्यादा फायदा हुआ है.

जबकि शियाओं के पड़ोस के सदर शहर में लोग अमरीका की मौजूदगी के विरोध में हैं.

यहां हर शुक्रवार हज़ारों लोग इमाम के उपदेश सुनने लिए जमा होते हैं, जहां अमरीका विरोधी नारे लगाए जाते हैं.

ज्य़ादातर ईरान में रहने वाले मोक़तदा अल सद्र नामक मौलवी के समर्थक हैं, जिनका इराक़ की संसद पर बड़ा इख़्तियार है.

अल सद्र के सिपाहियों ने एक बार अमरीका के सैनिकों के साथ लड़ाई भी लड़ी है और अमरीकी सैनिकों की वापसी को कहीं ना कहीं मोक़तदा की जीत के तौर पर देखा जाएगा.

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