श्रीलंका में 'सद्दाम बनाम इराक़'

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption सद्दाम हुसैन ने श्रीलंका के एक गांव के विकास में मदद दी थी

पूर्वी श्रीलंका का एक गांव 'सद्दाम हुसैन' के नाम से जाना जाता है, लेकिन अब गांव का नाम बदलने की कोशिश की वजह से विवाद खड़ा हो गया है.

गांव के नाम बदलने की कोशिशों के विरोध में लोगों ने प्रदर्शन भी किया है.

सद्दाम हुसैन ने गांव के विकास के लिए कई साल तक सहायता की थी. लेकिन अब अगर गांववालों को ये मदद जारी रखनी है, तो गांव को अपना नाम बदलना पड़ेगा.

गांववालों में मतभेद है कि क्या नई मदद के लिए सद्दाम के योगदान को भुला दिया जाए जिसकी वजह से गांव को उनका नाम दिया गया था.

'परोपकारी सद्दाम'

दरअसल सत्तर और अस्सी के दशक में सद्दाम हुसैन की सरकार के कई देशों से अच्छे संबंध थे, जिनमें गुटनिरपेक्ष आंदोलन के कई सदस्य देश भी थे.

नवंबर 1978 में पूर्वी श्रीलंका में एक चक्रवात आया था, जिसमें कई गांवों को नुकसान हुआ था.

इसके बाद श्रीलंका के एक संसदीय दल ने इराक़ का दौरा किया और सद्दाम हुसैन से इन गांवों को दोबारा बसाने में मदद मांगी.

सद्दाम पीछे नहीं हटे और 1982 तक उन्होंने एक पूरा गांव बसा दिया, जिसमें 100 नए घर, एक मस्जिद, एक मदरसा और एक खेल का मैदान बना था.

उस गांव का नाम सद्दाम हुसैन के नाम पर रख दिया गया. इस गांव को बाद में भी इराक़ी सरकार से हर महीने मदद मिलती रही.

'सद्दाम बनाम इराक़'

हालांकि 1990 में प्रथम खाड़ी युद्ध से पहले इस मदद में बाधा आई. उसके बाद तमिल टाइगर्स ने भी इस गांव से मुस्लिम परिवारों को बाहर कर दिया.

उसके बाद कई परिवार सद्दाम हुसैन गांव में वापस आ गए. ये गांववाले सद्दाम हुसैन को एक मानवीय शासक और इस्लाम का सिपाही मानते हैं.

उन्होंने इराक़ से फिर से मदद की मांग भी की है जिसे मान भी लिया गया है. लेकिन एक शर्त है - नए घरों के बदले में उन्हें गांव का नाम बदलकर 'इराक़ गांव' कर देना होगा. गांववालों को चुनना है कि गांव का नाम सद्दाम हुसैन रखा जाए या फिर इराक़?

स्थानीय सरकार की अनुमति लेकर गांव का नाम बदलने का फ़ैसला कर लिया गया है. लेकिन मस्जिद समिति इस मामले पर बंटी हूई है.

गांव के कुछ लोग उसका नाम बदलना नहीं चाहते और इसके लिए उन्होंने प्रदर्शन भी किया है. सद्दाम हुसैन आज भी उनके लिए एक परोपकारी और हितकारी नेता हैं.

संबंधित समाचार