शिया समुदाय पर हमले क्यों?

काबुल हमला
Image caption काबुल में सांप्रदायिक हिंसा की बहुत कम घटनाएं देखी गई हैं.

काबुल में भीड़ से भरी दरगाहों पर हुए हमलों ने एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान की शिया समुदाय पर सबका ध्यान केंद्रित कर दिया है.

पाकिस्तान में शिया समुदाय की स्थिति के विपरीत, अफ़ग़ानिस्तान के शिया समुदाय पर सुन्नी चरमपंथी गुटों का क़हर नहीं बरपा है.

अब तक शिया और सुन्नी समुदाय के बीच छोटा-मोटा ही मनमुटाव देखा गया है. 2006 में ज़रूर सुन्नी बहुल इलाक़े हेरात में हुई एक झड़प में पांच लोग मारे गए थे.

लेकिन पिछले कुछ दशकों में अफ़ग़ानिस्तान में सारे त्यौहार बड़े स्तर पर और बिना किसी डर के मनाए जाते रहे हैं.

मुहर्रम के दसवें दिन अफ़ग़ानिस्तान में सरकारी छुट्टी होती है. हर आशुरा पर काबुल के शिया बहुल इलाक़ों में इस्लाम के पैग़म्बर मोहम्मद के पोते के शहीद होने का मातम मनाने के लिए गलियों में काले झंडे लगाए जाते हैं.

धार्मिक भावनाओं को दर्शाते ऐसे संकेत 2001 से पहले कम ही दिखाई पड़ते थे. तालिबान शासन के पतन के बाद शिया समुदाय ने इसका विस्तार दूसरे समुदाय में भी किया.

अजब बात तो ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी भाईचारे को प्रोत्साहन देने के लिए कोई संगठन भी नहीं है.

नस्ली तनाव

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Image caption कुछ विश्लेषकों को लगता है कि ताज़ा हमलों के पीछे तालिबान का ही हाथ है.

अफ़ग़ानिस्तान में जातीय हिंसा के बहुत कम उदाहरण देखने को मिले हैं और कभी-कभी लोग पूछते हैं कि ऐसा कैसे संभव है कि अफ़ग़ानिस्तान के हालात पाकिस्तान से इतने अलग हैं क्योंकि पाकिस्तान में तो देश के हर हिस्से में जातीय हिंसा होती रहती है.

इसका जवाब अफ़ग़ानिस्तान के आधुनिक इतिहास में मिलता है.

पिछले 40 सालों में अफ़ग़ानिस्तान में कोई मुकम्मल जनगणना नहीं हुई है. लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि तकरीबन 20 प्रतिशत आबादी शिया समुदाय की है, और बाकी सुन्नी है.

ज़्यादातर शिया समुदाय के लोग ताजिक और हज़ारा जैसी अल्पसंख्यक नस्ल के हैं.हज़ारा नस्ल के लोगों को तालिबान ने बहुत प्रताड़ित किया था.

वैसे अफ़ग़ानिस्तान में जातीय हिंसा न होने का कारण ये भी हो सकता है कि यहां के इतिहास में धार्मिक चरमपंथी गुट नहीं रहे हैं.

शिया और सुन्नी, दोनों समुदायों ने 1970 के दशक में हाथ से हाथ मिला कर सोवियत संघ का सामना किया औऱ 1980 के दशक में काबुल की तत्कालीन साम्यवादी सरकार के ख़िलाफ़ भी दोनों समुदायों ने मोर्चा खोला.

दोनों ही समुदाय इस्लाम और अपने देश के लिए एकजुट हो कर लड़े. लेकिन जब सोवियत संघ के ख़िलाफ़ जंग शुरू हुई, तब सुन्नी लड़ाके पाकिस्तान गए और शिया लड़ाके ईरान गए, जहां उन्हें उग्र प्रशिक्षण मिला.

जातीय धब्बा बेशक इस देश पर न लगा हो, लेकिन यहां नस्ली तनाव ज़रूर देखने को मिला है.

1989 में साम्यवादी सरकार के पतन के बाद पश्तून, उज़बेक और ताजिक नस्ल के लोगों के बीच चार साल लंबा गृह-युद्ध चला जिसमें हज़ारों लोग मारे गए थे.

बंटवारे के बीज

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Image caption सांप्रदायिक धब्बा बेशक इस देश पर न लगा हो, लेकिन यहां नस्लीय तनाव ज़रूर देखने को मिला है.

पाकिस्तान और ईरान जैसे पड़ोसी देशों ने नस्ली गुटों का समर्थन कर अपने ही देशों में भेदभाव और हिंसा को बढ़ावा दिया.

लेकिन हामिद करज़ई के शासन में सभी नस्ली और धार्मिक गुटों को आज़ादी दी गई.

अफ़ग़ानिस्तान में कई निजी टीवी चैनलों का नियंत्रण धार्मिक शख़्सियतों के हाथ में है और यहां कम से कम पांच ऐसे चैनल हैं जो केवल शिया समुदाय के लिए हैं.

तो फिर अब शिया समुदाय पर हमले कौन कर रहा है?

विश्लेषकों का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ती अस्थिरता में पुराने शासन के कुछ स्थानीय लोगों की भी भागीदारी है.

शिया और सुन्नी समुदाय के बीच की घनिष्ठ एकजुटता को देखते हुए पाकिस्तान और ईरान के पास अपना प्रभुत्व दिखाने का कोई मौका नहीं बचा है.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है क्योंकि उस पर लगातार चरमपंथियों को अपनी सरज़मीन पर पनाह देने का आरोप लगता आ रहा है.

अफ़गान तालिबान को शय देने का इल्ज़ाम भी मुख्य रूप से पाकिस्तान पर लगता आ रहा है.

हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों का खंडन करता है लेकिन यहां विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान में कुछ लोग चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में शिया और सुन्नी समुदाय के बीच तनाव बढ़े.

शिया समुदाय को पहले भी तालिबान की प्रताड़ना झेलनी पड़ी है.

लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि चूंकि तालिबान लोया जिर्गा सम्मेलन पर हमला करने में नाकाम रहा और उसे वैश्विक बॉन सम्मेलन से पहले भी सुर्खियों में जगह नहीं मिली, इसलिए वो हामिद करज़ई का प्रभुत्व कमज़ोर करने के मकसद से ये हमले कर रहा है.

हमलों के पीछे कारण कुछ भी हो, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में ये बात अब घर करने लगी है कि लोगों की एकजुटता को अब ख़तरा है. लोग बस उम्मीद करते हैं कि कहीं अब उन्हें नया युद्ध न देखना पड़ा जाए.