'ज़िंदा रहते पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव हो जाएँगे'

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Image caption सू ची को भरोसा है कि उनके जीवित रहते पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव हो जाएँगे

बर्मा में लोकतंत्र समर्थक नेता ऑन्ग सान सू ची ने उम्मीद जताई है कि उनके जीवनकाल के दौरान ही बर्मा में 'पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव' हो जाएँगे.

बीबीसी को दिए एक एक्सक्लूज़िव इंटरव्यू में सू ची का कहना था कि वह ख़ुद उन चुनाव में प्रत्याशी होंगी या नहीं ये नहीं कहा जा सकता.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई होनी चाहिए, जबकि अधिकारी क़ैदियों की 'राजनीतिक क़ैदी' नहीं मानते.

सू ची की ब्रितानी विदेश मंत्री विलियम हेग से भी मुलाक़ात होनी है जो इस समय बर्मा की यात्रा पर हैं. पिछले 55 वर्षों में पहली बार कोई ब्रितानी विदेश मंत्री बर्मा के दौरे पर गया है.

सू ची ने कहा कि उन्हें लगता है, "मेरे जीवनकाल में ही पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव हो जाएँगे मगर पता नहीं मैं कब तक ज़िंदा रहूँगी."

बर्मा के मौजूदा राष्ट्रपति थान सेइन के बारे में सू ची ने कहा, "मैं राष्ट्रपति का भरोसा करती हूँ मगर सरकार पर मुझे भरोसा नहीं है क्योंकि अभी तो मैं सरकार के सभी सदस्यों को जानती भी नहीं हूँ."

राष्ट्रपति के बारे में उन्होंने कहा, "सबसे अहम बात ये है कि राष्ट्रपति ईमानदार हैं... अगर उन्हें लगता है कि कोई चीज़ ठीक है तो वह चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं."

ये पूछे जाने पर कि क्या वो दिन अब नज़दीक़ है जब वह ख़ुद राष्ट्रपति पद के लिए मैदान में होंगी उन्होंने कहा, "मैं ये नहीं कह सकती कि ऐसा कुछ मैं करना चाहूँगी भी या करूँगी."

रिहाई का भरोसा

उधर बर्मा की यात्रा पर गए ब्रितानी विदेश मंत्री विलियम हेग ने कहा है कि बर्मा ने और राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का भरोसा दिलाया है.

बर्मा के विदेश मंत्री वुना मॉन्ग ल्वी ने ये भी कहा कि बर्मा में हो रहे बदलाव अब 'पलटे नहीं जा सकते.'

मगर बाद में जब उन्होंने क़ैदियों का ज़िक्र किया तो वहाँ वह उन्हें राजनीतिक क़ैदी कहने से बचते रहे.

बर्मा में 20 साल बाद हुए पहले चुनाव के बाद एक आंशिक प्रतिनिधित्व वाली नागरिक सरकार ने काम सँभाला है और तभी से दुनिया भर के नेताओं की बर्मा की यात्रा शुरू हुई है.

तब से अब तक नए प्रशासन ने लोकतंत्र समर्थक ऑन्ग सान सू ची को रिहा किया है और बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू की है.

क्लिंटन का दौरा

उन्होंने 2010 के चुनाव का बहिष्कार किया था क्योंकि चुनावी क़ानून के तहत वह उनमें हिस्सा ही नहीं ले सकती थीं. मगर पिछले महीने उन्होंने अपनी पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी को एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर पंजीकृत करवाया था.

इससे पहले दिसंबर में अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी बर्मा के दौरे पर गई थीं और उसे सुधारों की प्रक्रिया पर मुहर के तौर पर देखा गया था. वैसे पश्चिमी देशों के प्रेक्षकों का कहना है कि अब भी बर्मा में काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है.

हेग की राजधानी नेपिडो में राष्ट्रपति थान सेइन से भी मुलाक़ात होनी है. वह पूर्व जनरल हैं जिन्होंने चुनाव लड़ने के लिए पद छोड़ा था.

उसके बाद हेग रंगून जाकर ऑन्ग सान सू ची से भी मिलेंगे.

सू ची की पार्टी की अप्रैल में होने वाले उप चुनाव में प्रत्याशी उतारने की योजना है. इस तरह वह ख़ुद भी चुनकर संसद पहुँच सकती हैं.

उनकी पार्टी को 1990 में भारी बहुमत मिला था मगर उन्हें कभी सत्ता में आने ही नहीं दिया गया.

बर्मा में बदलाव

हेग ने नेपि़डो में बर्मा के विदेश मंत्री से मिलने के बाद कहा, "विदेश मंत्री ने राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई को लेकर प्रतिबद्धता दोहराई है. उन्होंने बताया कि हे ये सुधार अब पलटे नहीं जाएँगे और मैं इस तरह की सोच का स्वागत करता हूँ."

मगर बीबीसी की बर्मी सेवा को बाद में दिए एक इंटरव्यू में विदेश मंत्री वुना मॉन्ग ल्वी ने ये नहीं माना कि देश में राजनीतिक बंदी हैं भी.

उन्होंने कहा कि वे सभी अपराधी हैं और ये राष्ट्रपति को तय करना होगा कि बंदी रिहा कब होंगे.

एक अनुमान के अनुसार 2007 में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान 600 से 1000 के बीच पत्रकार और विद्रोही बौद्ध भिक्षु गिरफ़्तार हुए थे जो अब भी सलाख़ों के पीछे ही हैं.

बीबीसी को दिए इंटरव्यू में सू ची ने भी कहा कि सभी राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई होनी चाहिए भले ही सरकार उनकी मौजूदगी माने या न माने.

उन्होंने कहा कि देश अभी उस स्थिति में नहीं पहुँचा है जहाँ ये कहा जाए कि पश्चिमी देशों से निवेश बढ़ाया जाना चाहिए.

रंगून में मौजूद बीबीसी की रेचेल हार्वे का कहना है कि अब ये बात आम तौर पर मानी जा रही है कि बर्मा में बदलाव हो रहा है.

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