नेपाल में पुरानी वीआईपी गाड़ियां बनीं सिरदर्द

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Image caption नेपाल के पूर्व नरेश और मंत्रियों की लग्ज़री गाड़ियां फ़िलहाल सरकारी गैराजों में रखी हैं. (तस्वीर: भासवोर ओझा)

नेपाल में अधिकारियों का कहना है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वे अपदस्थ नरेश और पूर्व मंत्रियों की लग्ज़री गाड़ियों का क्या करें.

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लगभग 24 सरकारी गाड़ियां वापस की गई थीं. फ़िलहाल इन्हें सरकारी गैराजों में रखा गया है.

ये गाड़ियां पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र और कई पूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों की हैं.

नेपाल में वर्ष 2008 में राजशाही ख़त्म कर दी गई थी.

'भेदभावपूर्ण फ़ैसले'

अधिकारियों का कहना है कि संबंधित अधिकारी इन गाड़ियों को सरकार को वापस करने के लिए योजना बनाने में विफल रहे.

अधिकारियों ने ये भी कहा कि इन गाड़ियों का क्या होना चाहिए, इस बारे में कोई क़ानून नहीं बनाया गया इसलिए गाड़ियों को गैराज में ही रखना होगा.

गृह सचिव सुशील जंग बहादुर राणा ने बीबीसी नेपाली सेवा को बताया, "लगभग दो दर्जन मंहगी गाड़ियां या तो गृह मंत्रालय या फिर प्रधानमंत्री कार्यालय में पार्क हैं."

इनमें मंहगी एसयूवी, लैंड क्रूज़र, प्राडो, और पजेरो गाड़ियां शामिल हैं. लेकिन सबसे शानदार गाड़ी एक मर्सिडीज़ बेंज़ है जिसका इस्तेमाल पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र करते थे.

सुप्रीम कोर्ट ने नौ दिसंबर, 2011, के अपने आदेश में कहा था कि पूर्व प्रशासनों के वरिष्ठ अधिकारियों को गाड़ी, पेट्रोल, किराया और अन्य सुविधाएं देने के विभिन्न मंत्रिमंडलों के फ़ैसले 'भेदभावपूर्ण और क़ानून के ख़िलाफ़' थे.

अदालत ने सरकार को पूर्व राज्याध्यक्षों और पूर्व मंत्रियों से ऐसी सारी सुविधाएं वापस लेने का आदेश दिया.

अधिकारियों का कहना है कि इस आदेश से ज्ञानेंद्र सहित कई पूर्व गणमान्य व्यक्ति प्रभावित हुए हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री झालानाथ खानल, माधव कुमार नेपाल, पुष्प कमल दाहल (माओवादी नेता प्रचंड) और लोकेंद्र बहादुर चंद ने अपनी-अपनी गाड़ियां वापस कर दी हैं.

'रखरखाव ज़रूरी'

Image caption नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई की मस्टांग गाड़ी नेपाल में ही एसेंबल की गई है.

गृह सचिव राणा का कहना था कि इतनी मंहगी गाड़ियों की 'ठीक से देखभाल और रखरखाव न होने की वजह से उन्हें होने वाले नुक़सान के बारे में सरकार संवेदनशील' है.

राणा ने कहा, "इसीलिए हम फ़िलहाल ऐसा क़ानून लाने पर काम कर रहें हैं जिससे अतिविशिष्ट, वीवीआईपी, व्यक्तियों को दी जाने वाली सुविधाएं सुनिश्चित हो सकेंगीं. अगर इन गाड़ियों का ठीक से रखरखाव नहीं किया गया तो ये ख़राब हो जाएंगीं. इसके लिए जैसे ही क़ानून बन जाएगा, हम ये गाड़ियां इन वीवीआईपीज़ को दे देंगे."

अगस्त 2011 में प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने मंहगी गाड़ी में यात्रा करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. उन्होंने नेपाल में ही एसेंबल की गई मस्टांग गाड़ी से सफ़र करना चुना.

इस गाड़ी का चुनाव एक ऐसे माओवादी प्रधानमंत्री के लिए उपयुक्त माना गया जिनका कहना था कि उनकी प्राथमिकता ग़रीबी ख़त्म करना है.

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