आख़िर क्यों है तालिबान इतना मज़बूत ?

नेटो ने पिछले दस साल में अफ़ग़ानिस्तान की सेना को उन्नत बनाने और देश के ढांचागत विकास के लिए सैकड़ों अरब डॉलर निवेश किया है.

लेकिन अगर नेटो गठबंधन की एक सार्वजनिक हो चुकी गोपनीय रिपोर्ट की मानें तो इन सारी क़वायद पर साल 2014 में विदेशी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौटने के बाद पानी फिर जाएगा.

ताज़ा रिपोर्ट में पता चला है कि नेटो अफ़ग़ानिस्तान में अपने अभियान के बारे में जितना सार्वजनिक रूप से दिखाता है उससे ज़्यादा चिंतित है.

नेटो ने सार्वजनिक की गई इस रिपोर्ट की अहमियत को कम करके दिखाने के उद्देश्य से इसे “गिरफ़्तार किए गए तालिबानी लड़ाकों की सोच” बताई है, लेकिन रिपोर्ट ने पिछले दस साल से अफ़ग़ानिस्तान में चल रही जंग में हुई ग़लतियों को उजागर किया है.

कड़वी सच्चाई ये है कि नेटो और अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा बलों के साथ विश्वास में कमी के चलते तालिबान से हाथ मिलाने वाले अफ़ग़ानिस्तानी नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

देश के कई सुदूर इलाक़ों में जहाँ सरकार केवल काग़ज़ों में दिखती है, वहाँ लोग अक़सर तालिबान के साथ दिखाई देते हैं.

एक वरिष्ठ क़बायली नेता ने कहा, “अमरीकी कूची ख़ानाबदोशों की तरह होते है जो कुछ समय के लिए अपने तंबुओं के साथ आते हैं और आप उन्हें जान पाएँ इससे पहले ही लौट जाते हैं.”

तालिबानी अदालतें

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Image caption स्थानीय लोगों का कहना है कि तालिबानी अदालत तेज़ कार्रवाई करते थे

चरमपंथियों की ताक़त देखते हुए कई इलाक़ों में लोगों के पास तालिबान को क़बूल करने के अलावा कोई प्रभावी विकल्प भी नहीं बचता.

लेकिन सरकार में बड़े स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और प्रभावशाली अपराधियों के बिना सज़ा पाए निकल जाने के मामलों के कारण भी लोगों का झुकाव तालिबान की ओर बढ़ा है.

मिसाल के तौर पर उत्तर की ओर स्थित कुंदूज़ इलाक़े में सेना के कई कमांडरों पर फ़िरौती, डकैती और बलात्कार जैसे संगीन अरोप लगते आए हैं, लेकिन उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की गई.

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी विभागों समेत न्यायालयों में भी भ्रष्टाचार व्याप्त है, जिस वजह से लोग न्याय के लिए तालिबानी अदालतों की तरफ़ रूख करते हैं.

काबुल के एक निवासी, 30 वर्षीय जमशेद ने करज़ई शासन के अदालत और तालिबान के रेगिस्तानी अदालतों की तुलना की.

जमशेद ने विस्मय से कहा, “तालिबानी अदालतें काफ़ी तेज़ और कड़क थीं. चोरों को छोटी सी सुनवाई के बाद मौत की सज़ा सुना दी जाती थी, लेकिन करज़ई के राज में चोर को चोर साबित करने में सदियाँ लग जाएँगी. उसके बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उसे सज़ा मिलेगी या नहीं.”

देश की ख़राब साक्षरता दर और तालिबान की मानसिकता पर केंद्रित लड़ाइयां चरमपंथियों के लिए अफ़ग़ान लोगों का दिल जीतने में मददग़ार साबित हुई हैं.

तालिबानी गाने, वीडियो और मोबाइल के रिंगटोन अफ़ग़ानिस्तानी लोगों की भावनाओं को प्रभावित करते है.

घुसपैठ रोकने के लिए तालिबानी नेता मुल्ला उमर ने अपनी ही तरह की एक लड़ाई छेड़ी है. तालिबानी शासन के आंशिक प्रभाव कई इलाक़ों में देखे जा सकते है.

मुझे ऐसे कई मामलों के बारे में पता है जिसमें तालिबानी अधिकारियों को लोगों की शिकायतों के बाद हटा दिया गया. कई लोग इस तरह के शासन को असली सरकार के कामकाज के ढंग से ज़्यादा प्रभावी मानते हैं.

गंभीर खतरा

वरिष्ठ अधिकारियों कि अनुसार कुछ सरकारी लोग सोचते हैं कि तालिबान वापस आएगा.

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Image caption पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान एक दूसरे पर घुसपैठ कराने के आरोप लगाते रहे है

एक अधिकारी ने कहा, ''अधिकारी तालिबानियों से अपनी सहानुभूति ज़ाहिर करते हैं जिसके बाद तालिबानी, सरकार के अधिकारियों से अपना समर्थन साबित करने को कहते हैं. कभी लड़ाकों को तो कभी आत्मघाती दस्तों को एक जगह से दूसरे जगह सुरक्षित भेजने में मदद करने को कहा जाता है.''

अफ़ग़ानिस्तान में चुनी गई सरकार से लोगों के मुँह फेरने के पीछे एक कारण ये भी है कि विदेशी सैनिकों के कई इलाक़ों से जाने के बाद सरकार उन इलाक़ों में क़ानून व्यवस्था स्थापित करने में विफल रही है.

अफ़ग़ानिस्तानी सुरक्षा बलों के जवान निरक्षरता, नशा और तालिबानी घुसपैठ से जूझ रहे है जिससे लोगों में सुरक्षा व्यवस्था के प्रति विश्वास नहीं कायम हो पाया है.

पाकिस्तान की भूमिका

नेटो की गोपनीय रिपोर्ट सार्वजनिक होने से अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई की स्थिति और संकटपूर्ण हो गई है.

करज़ई अफ़ग़ानिस्तान के नाराज़ चल रहे पड़ोसी पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिशों में लगे है.

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां तालिबान की मदद कर रही है हालांकि पाकिस्तान आरोपों को ख़ारिज कर चुका है.

करज़ई ने अपने क़रीबियों को कई बार कहा है कि तालिबान के साथ उनकी मित्रता तभी संभव है जब पाकिस्तान इसका समर्थन करे.

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