श्रीलंका में बारूदी सुरंगों से पेट पालती एक जिंदगी

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Image caption उत्तरी श्रीलंका में रहने वाली सूबा बारूदी सुरंगे हटाने का काम करती हैं.

श्रीलंका के परंदन में जन्मी सूबा की कहानी दुनिया की ज्यादातर महिलाओं की कहानी से अलग है.

32 वर्षीय सूबा उत्तरी श्रीलंका में बारूदी सुरंगे हटाने का काम करती हैं. ऐसा काम जिसके बारे में शायद ही कोई महिला सोचेगी.

तमिल विद्रोहियों और श्रीलंका की सेना के बीच तीन दशक तक चले संघर्ष के दौरान बिछाई गई इन बारूदी सुरंगों को हटाने का काम हाथ में लेना उनकी मजबूरी थी. गृह युद्ध के अंतिम बरसों में सूबा के पति ने भी उन्हें छोड़ दिया था.

सूबा याद करती हुए कहती हैं, “मैं 21 बरस की थी जब मेरी शादी हुई. अब मेरे तीन बच्चे हैं. गृह युद्ध के चलते हमें बेघर होना पड़ा. फिर मैं रिफ्यूजी कैंप में आ गई. इस संघर्ष के दौरान मेरे भाई की मौत हो गई और मेरे पति को तमिल टाइगर समझ कर पकड़ लिया. वो रिश्वत पर छूटे लेकिन मेरे पास नहीं लौटे और दूसरी शादी कर ली. पूरे छह महीने तक मैं रिफ्यूजी कैंप में अकेले ही रही.”

कैसे मिला काम

सूबा जब कैंप छोड़कर परंदन लौटीं तो ना सर पर छत थी ना रोटी का ठिकाना. चंद पैसों के लिए ईंट बनाने जैसा काम भी किया और फिर बारूदी सुरंगें हटाने वाली एजेंसी ने सूबा को काम दिया.

सूबा बताती हैं, “वो लोग 10वीं पास लोग चाहते थे लेकिन मैं सिर्फ़ आठवीं कक्षा तक पढ़ी हूं. उन्हें 29 साल से कम उम्र के लोगों की तलाश थी और मैं उससे ज़्यादा हूं, लेकिन मुझे किसी भी क़ीमत पर ये नौकरी चाहिए थी ताकि अपने परिवार का पेट भर सकूं. मैने कहा मैं बहुत मेहनत से काम करूंगी और बिना छुट्टी लिए.”

सवाल उठना लाजमी है कि पुरूषों के वर्चस्व वाले इस मुश्किल काम में महिलाओं के लिए काम की परिस्थितियां क्या है. क्या सूबा को भी एक औरत होने के चलते किसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा.

सूबा इस बात से इंकार करते हुए कहती हैं, "व्यवहार तो सभी के साथ एक जैसा ही किया जाता है. हमें सुबह पांच बजे काम पर आना होता है. ज़मीन से झाड़ियां और पौधे हटाते हैं. सुरंगें पीले रंग के पटरों से चिन्हित होती हैं जहां हम मेटल डिटेक्टर से बारूदी सुरंगों का पता लगाते हैं. अगर ये ध्यान से ना किया जाए तो हमारी मौत हो सकती है.”

असुरक्षित भविष्य

सूबा फ़िलहाल ये ख़तरनाक काम कर रही हैं लेकिन उन्हें एहसास भी है कि ये हमेशा नहीं रहेगा.

वो पूरी तरह से समझती हैं कि अगर अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने एजेंसी को पैसे देना बंद कर दिया तो उनकी रोज़ी रोटी ठप्प हो जाएगी.

आगे आने वाले असुरक्षित दिनों का डर सूबा के मन में है लेकिन उनकी ज़िंदगी इस बात का सुबूत है कि जिंदगी अपना रास्ता ख़ुद बना लेती है फिर भले ही वो बारूदी सुरंगों से होकर क्यों ना गुज़रता हो.

महिलाएं हर काम कर सकती हैं या करने का माद्दा रखती हैं इस ख़्याल पर आज भी भवें तन जाना औऱ अविश्वास भरी मुस्कुराहटें तैर जाना कोई हैरत भरी बात नहीं है. लेकिन फिर कहीं ना कहीं से कोई महिला इस ख्याल को हक़ीक़त में बदल कर दिखाती है.

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