भारतीय राजनीति के मिथक
 
जाति का खेल
 
 
 
 
 
 
 
 
भारत में चुनाव महज़ जाति का खेल है

भारत में चुनाव महज़ जाति का खेल है

 

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की कलम से

यह सच है कि वोट पर जाति का असर पड़ता है. आप मतदाता हों या उम्मीदवार, मतदान पर आपके समुदाय का असर पड़ता है.

ये बात दुनिया के हर लोकतंत्र के बारे में कही जा सकती है. दूसरे लोकतंत्रों ती तरह हमारे देश में भी ज़ात बिरादरी का वोट पर असर पड़ता है.

कभी-कभार जाति के आधार पर ध्रुवीकरण इतना तीखा होता है मानो जाति के सिवाय और कुछ नहीं है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जाति वोट पर असर डालने वाले कारकों में से एक है, एकमात्र क़तई नहीं.

कभी-कभार किसी उम्मीदवार या पार्टी विशेष के पक्ष में जाति का ध्रुवीकरण होता है लेकिन आमतौर पर कोई भी एक जाति किसी एक दल या उम्मीदवार के पक्ष में 40-50 प्रतिशत से ऊपर वोट नहीं डालती. कभी-कभार ही किसी एक जाति का 60-70 प्रतिशत वोट एक पार्टी को मिलता है.

एक ख़ास कारण से चुनाव हमें जातियों का खेल लगने लगा है. पिछले 10-15 साल में उत्तर प्रदेश और बिहार की परिस्थितियों ने हम सब के मन में कहीं न कहीं पूरे देश की छवि बना ली है.

जाति ध्रुवीकरण अपवाद

जबकि हक़ीक़त यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार का जातीय ध्रुवीकरण भारतीय लोकतंत्र में एक अपवाद है उसका सामान्य नियम कतई नहीं.

ऐसा क्यों लगता है कि जाति सर्वव्याप्त है. इसलिए कि हम हर चीज़ को जातिवाद कहने को तैयार हैं. लोग जाति के नाम पर वोट डालें तब जातिवाद, भाषा के नाम पर डालें तब जातिवाद, धर्म के नाम पर डालें तब जातिवाद, उम्मीदवार की बिरादरी देखें तो जातिवाद, उम्मीदवार की ज़ात बिरादरी को नकारते हुए अपनी पसंद की पार्टी को वोट दें तब भी जातिवाद.

हक़ीक़त ये है कि एक औसत मतदाता को या तो अपनी जाति का कोई उम्मीदवार मिलता ही नहीं है या अपनी जाति के एक से ज़्यादा उम्मीदवार मिलते हैं. ज़ाहिर है कि उसे जाति के अलावा किसी और चीज़ के बारे में तो सोचना ही पड़ता है.

दरअसल, पिछले पचास साल में उम्मीदवार की जाति देखने का प्रचलन घटा है. उम्मीदवार के बजाय पार्टियों का जाति चरित्र देखने का चलन बढ़ा है.

यह सच है कि ज़्यादातर राज्यों में कुछ प्रमुख जातियों का किसी एक पार्टी की ओर झुकाव रहता है. लेकिन ये झुकाव को अपने आप में चुनाव के परिणाम समझने में मदद नहीं देता.

जब एक पार्टी चुनाव हारती है तो वह तमाम जा़त-बिरादरियों में 5-10 प्रतिशत वोट खोती है. जब जीतती है तो तमाम जा़त-बिरादरियों में 5-10 प्रतिशत वोट प्राप्त करती है.

इसलिए वोट का आधार होने के बावजूद जाति, वोट में गुणात्मक परिवर्तन और चुनाव परिणामों को समझने का निर्णायक कारक नहीं होती है.
 
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