राष्ट्रीय दलों का परिचय
 
 
 
सीपीएम
 
 
 
 
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी

 

भारत में फिलहाल पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) सबसे ज़्यादा असरदार है.

सीपीएम का गठन 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के विभाजन से हुआ.

अविभाजित सीपीआई ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तेलंगाना, त्रिपुरा और केरल में सशस्त्र विद्रोह का रास्ता अपनाया था, लेकिन जल्दी ही इसने ये रास्ता छोड़ कर संसदीय ढाँचे में काम करने का फ़ैसला किया.

माना जाता है कि नेहरू काल में कांग्रेस ने वामपंथियों पर दबाव डालने के लिए सोवियत संघ के साथ अच्छे रिश्तों का इस्तेमाल किया था.

बावजूद इसके कांग्रेस और वामपंथियों के रिश्ते 1959 में तब बिगड़े जब केरल में ईएमएस नंबूदिरीपाद सरकार को बर्ख़ास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. नंबूदिरीपाद पूरे भारत में इकलौते ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे.

साथ ही वे उस समय दुनिया के पहले ऐसे कम्युनिस्ट नेता थे जो जनता से चुन कर सत्ता तक पहुँचे थे.

गठन

चीन के साथ 1962 की लड़ाई के समय सीपीआई के भीतर कई गुट उभरे. पार्टी के कुछ नेताओं पर चीन का समर्थन करने के आरोप लगे.

कानू सान्याल सशस्त्र विद्रोह को सही मानते थे

इसी वर्ष पार्टी के महासचिव अजय घोष का निधन हो गया. उसके बाद एसए डांगे को पार्टी का चेयरमैन बनाया गया और ईएमएस नंबूदिरीपाद महासचिव बनाए गए.

ये संतुलन बनाने की कोशिश थी क्योंकि ईएमएस पार्टी में उदारवादी धड़े का नेतृत्व करते थे और डांगे कट्टरपंथी नीतियों में विश्वास करते थे.

हालाँकि ये प्रयोग 1964 में विफल हो गया. इस वर्ष बॉम्बे (अब मुंबई) में डांगे समूह का अलग सम्मेलन हुआ और साथ-साथ कलकत्ता में पी सुंदरैया की अगुआई में अलग सम्मेलन हुआ.

कलकत्ता सम्मेलन में जो लोग शामिल हुए उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नाम से नया दल बनाया.

ऊतार-चढ़ाव

विभाजन के बाद 1967 में हुए लोकसभा चुनाव में सीपीएम को 19 सीट मिली और सीपीआई को 23 सीटों पर सफ़लता हासिल हुई. केरल और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में सीपीएम सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी.

इसी वर्ष पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में किसानों का उग्र आंदोलन शुरू हुआ जिसे सीपीएम के कट्टरपंथी नेता चारु मजूमदार और कानू सान्याल का समर्थन मिला. हालाँकि सीपीएम सरकार ने इस हिंसक आंदोलन को दबा दिया.
इसके बाद नक्सलबाड़ी समर्थक नेताओं ने ‘ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी’ (एआईसीसीआर ) का गठन किया और वे सीपीएम से अलग हो गए. आंध्र प्रदेश में भी तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह समर्थक नेताओं का अलग धड़ा बना.
 

इसके बाद नक्सलबाड़ी समर्थक नेताओं ने ‘ऑल इंडिया कॉर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी’ (एआईसीसीआर ) का गठन किया और वे सीपीएम से अलग हो गए. आंध्र प्रदेश में भी तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह समर्थक नेताओं का अलग धड़ा बना.

1971 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम को 25 सीटें मिलीं जिनमें से 20 पश्चिम बंगाल से आई. इसी साल विधानसभा चुनाव में भी राज्य में सीपीएम को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं. फिर 1977 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बहुमत हासिल किया और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने.

इसके बाद से लेकर अब तक पश्चिम बंगाल में सीपीएम की अगुवाई में वाम मोर्चे की सरकार है. केरल में भी अभी वाम मोर्चा ही सत्ता में है.

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद सीपीआई और सीपीएम ने यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था.

हालाँकि अमरीका के साथ परमाणु क़रार के विरोध में दोनों दलों ने पिछले साल यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

हालाँकि इस बार के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के चुनाव पूर्व समझौते से सीपीआई-सीपीएम को कड़ी टक्कर मिलने की उम्मीद है.
 
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