आज भी 'सचिन, सचिन' क्यों गूंजता है?

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''मैंने उसे टीवी पर खेलते हुए देखा और उसकी तकनीक का क़ायल हो गया. मैं ख़ुद को खेलते हुए नहीं देख सकता, लेकिन लगता है कि ये खिलाड़ी ठीक वैसे ही खेलता है, जैसे मैं खेला करता था.''

52 टेस्ट में 99.94 की औसत से 6996 रन ठोंकने वाले सर डॉन ब्रैडमेन अगर ये शब्द किसी के बारे में बोल सकते थे, तो वो सिर्फ़ 'क्रिकेट के भगवान' के बारे में.

सचिन रमेश तेंदुलकर को क्रिकेट को अलविदा कहे आज पूरे तीन बरस गुज़र चुके हैं, लेकिन मैदान अब भी सचिन, सचिन की आवाज़ से गूंजा करते हैं.

सचिन की तुलना बेकार है

टेस्ट टीम के नए-नवेले कप्तान और भारतीय बल्लेबाज़ी की रीढ़ बनकर उभरे विराट कोहली से उनकी तुलना की कितनी भी कोशिश की जाए, लेकिन सचिन कई मायनों में इस तरह की हर तुलना से दूर हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि सचिन सिर्फ़ पिच पर बैटिंग नहीं करते थे, बल्कि उनके तमाम शॉट विरोधी टीम के दिलों-दिमाग़ पर चोट करते थे.

उस दौर की सबसे मुश्किल टीम ऑस्ट्रेलिया थी, तो सचिन ने सबसे शानदार हाथ भी कंगारुओं के ख़िलाफ़ दिखाए.

कंगारुओं के ख़िलाफ़ ज़ोरदार बैटिंग

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टेस्ट और वनडे में सचिन ने जो कुल 100 शतक जमाए, उनमें से 20 ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ हैं. 11 टेस्ट में और 9 वनडे में. कुल जमा 6,707 रन.

ये वो दौर था, जब ऑस्ट्रेलिया के अलावा इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका के तेज़ गेंदबाज़ आग उगला करते थे.

टेस्ट में इन दोनों टीमों के ख़िलाफ़ सचिन के 14 शतक हैं. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ औसत 55 पार है, तो इंग्लैंड के विरुद्ध 51 से ज़्यादा.

घर से बेहतर विदेश में खेले

उन दिनों भारतीय टीम को 'घर का शेर' कहा जाता था, क्योंकि विदेश में हार की आदत सी बन गई थी. तब भी सचिन अकेले दम पर विरोधी टीमों की बॉलिंग लाइन-अप के सामने चुनौती पेश करते थे.

टेस्ट में, सचिन ने घर में खेलते हुए 94 मैचों में 52.67 की औसत से 7216 रन बटोरे, लेकिन जब वो बाहर खेले तो और बढ़िया खेले.

विदेशी सरज़मीं पर तेंदुलकर ने 106 मैचों में 54.74 की औसत से 8705 रन बनाए. घर में 22 टेस्ट शतक जड़े, तो विदेश में 29.

लेकिन कप्तानी ज़रा रास नहीं आई

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वनडे क्रिकेट में भी उनका बल्ला बाहर ज़्यादा धारदार नज़र आता था. एकदिवसीय मैचों में उन्होंने घरेलू मैदान पर 20 सेंचुरी जड़ी, तो देश से बाहर 29.

कहते हैं कि सचिन का जन्म ही बल्लेबाज़ी के लिए हुआ था. लगता है, यही सच है. क्योंकि भारतीय टीम की जिस कप्तानी तक पहुंचने के लिए खिलाड़ी क्या-कुछ ना कर गुज़रे, वो उन्हें मिली, लेकिन रास ना आई.

25 टेस्ट मैच उन्होंने कप्तानी की, तो औसत घटकर 51.35 पर आ गई. कप्तानी के बोझ बिना उन्होंने 175 मैच खेले, जिनमें 54.16 की औसत से 13,867 रन बनाए.

वनडे में भी यही हाल रहा. कप्तान बने तो 37.75 की औसत से 2454 रन बनाए और जब सिर्फ़ बल्लेबाज़ रहे, तो 46.16 की औसत से 15972 रन बटोरे.

सचिन जैसा संयम अब कहां

ये बात हुई बल्लेबाज़ी की. ज़रा सा ज़िक्र उनके मिजाज़ का. वो क्रिकेट का इतना सम्मान करते थे कि अंपायर के ग़लत फ़ैसले पर भी बिना प्रतिक्रिया दिए चले जाते थे.

आउट होने पर ना गुस्सा, ना झिड़कना. गेंदबाज़ कितना भी भड़काए, सचिन कभी नहीं बोले. और उनका बल्ला कभी चुप नहीं रहा.

यही वजह है कि दुनिया भर के खिलाड़ी और मैदान उनके सम्मान में आज भी झुकते हैं.

उनके जैसा कोई नहीं

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सचिन को कितने भी नाम दिए जाएं, लेकिन उनके जैसा कोई दूसरा नहीं आएगा. उनके बनाए कुछ रिकॉर्ड टूटेंगे, कुछ लंबे वक़्त तक बरक़रार रहेंगे. लेकिन जो रुतबा इस दुनिया ने दिया, वो किसी और के हिस्से नहीं जाएगा.

सर डॉन ब्रैडमैन को सचिन में अपना अक़्स दिखा और भारत को अपनी उम्मीद. मैदान के भीतर स्ट्रटे ड्राइव लगाना हो या मिडल क्लास परिवार से निकली संघर्ष की कहानी, दोनों मामलों में सचिन का उदाहरण दिया जाता है.

क्रिकेट से उनकी रिटायरमेंट से भारत और क्रिकेट, दोनों का ख़ासा नुक़सान हुआ. हां, फ़ायदा हुआ तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिरकी गेंदबाज़ कहे जाने वाले शेन वॉर्न का, जो अब चैन से सोते हैं!

सचिन 'रिकॉर्ड' तेंदुलकर

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  • 200 टेस्ट मैच में 15,921 रन. साथ ही 51 टेस्ट शतक, 68 अर्द्धशतक
  • 13,492 रिकॉर्ड टेस्ट रन, चौथे नंबर पर बल्लेबाज़ी करते हुए
  • 463 वनडे मैच में 18,426 रन. इनमें 49 शतक, 96 अर्द्धशतक
  • 2,278 रन वर्ल्ड कप टूर्नामेंट में, एक वर्ल्ड कप (2003) में 673 रन
  • वनडे क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 3,077 रन, श्रीलंका के ख़िलाफ़ 3133 रन
  • वनडे में 200 के जादुई नंबर तक पहुंचने वाला पहला बल्लेबाज़
  • 62 दफ़ा मैन ऑफ़ द मैच अवॉर्ड, जो एक कीर्तिमान है

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