धोनी 'महान' लेकिन विवादों पर चुप्पी क्यों?

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'जब एमएस धोनी के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में पहला शब्द जो आता है वो है कैप्टन.'

महेंद्र सिंह धोनी की जगह वनडे और ट्वेंटी-20 की कप्तानी संभालने वाले विराट कोहली ने बीसीसीआई टीवी के साथ बातचीत में ये बातें कहीं.

करीब नौ साल तक भारतीय टीम की कमान संभालने वाले धोनी ने इंग्लैंड के खिलाफ वनडे सिरीज़ की टीम चुने जाने के पहले अचानक टीम की कमान छोड़ दी.

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चयनकर्ताओं ने उनकी जगह विराट कोहली को कप्तानी की जिम्मेदारी दी है. वो करीब दो साल से टेस्ट टीम की कप्तानी कर रहे हैं और भारत को 22 में से 14 टेस्ट मैचों में जीत दिला चुके हैं.

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'धोनी दबाव में फ़ैसले नहीं लेते'

उनकी कप्तानी में भारत ने सिर्फ दो टेस्ट मैच गंवाए हैं.

अरसे से विराट कोहली को 'फटाफट टीम' की कमान सौंपने की भी बात की जा रही थी.

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लेकिन, विराट तो धोनी के करिश्मे पर सम्मोहित हैं. वो कहते हैं, "मेरे लिए वो हमेशा मेरे कप्तान रहेंगे. उन्होंने मुझे कई बार टीम से ड्रॉप होने से बचाया"

विराट कोहली के इस अंदाज़ की भारत के महान कप्तानों में शुमार होने वाले सौरव गांगुली ने दिल खोलकर तारीफ की.

उन्होंने विराट की तारीफ करते हुए ट्विटर पर लिखा, "सभी क्रिकेटरों के लिए एक सबक कि एक अचीवर को कैसे सम्मान दिया जाता है."

क्रिकेट को 'जेंटलमैंस' यानी भद्रजनों का खेल कहा जाता है. धोनी के उत्तराधिकारी और उनके पूर्व कप्तान का अंदाज़ जाहिर करता है कि भारतीय खिलाड़ी मैदान के बाहर भी 'भद्रलोक' में ही बसते हैं.

कप्तान के तौर पर धोनी के रिकॉर्ड बेमिसाल रहे हैं लेकिन उनके कप्तान रहते कई विवादों की भी चर्चा होती रही.

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सीनियर खिलाड़ियों और धोनी के बीच खिंची एक अनदेखी सी सर्द लकीर मीडिया की खबरों में जब तब दिखती रही.

भारतीय टीम के साल 2008 के ऑस्ट्रेलिया दौरे की वनडे टीम से जब सौरव गांगुली की छुट्टी हुई तब मीडिया में काफी कुछ छपा.

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इंग्लैंड में हुए वर्ल्ड ट्वेंटी-20 मुक़ाबले के दौरान धोनी और वीरेंद्र सहवाग के बीच अनबन की ख़बरें आईं और एकजुटता जाहिर करने के लिए धोनी पूरी टीम को मीडिया कॉन्फ्रेंस में ले आए.

वीवीएस लक्ष्मण ने जब क्रिकेट से संन्यास का ऐलान किया तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि वो 'चाहकर भी धोनी से बात नहीं कर सके'.

लेकिन, संन्यास के ऐलान के बाद इनमें से किसी ने भी धोनी की कप्तानी के इन पहलुओं का जिक्र नहीं किया. सिर्फ उनकी 'महानता' की बात की.

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सहवाग ने एक साक्षात्कार में कहा, "एक खिलाड़ी और एक कप्तान के तौर पर उनकी खूबियों से हर कोई वाकिफ है लेकिन वो उससे भी बेहतर इंसान हैं जिनका बड़ा सा दिल है."

वहीं लक्ष्मण ने एक आलेख में धोनी की कप्तानी के बारे में लिखा, "एमएस जिस तरह से वरिष्ठ सदस्यों के साथ घुल-मिल गए मैं उससे बड़ा प्रभावित था."

ये अपनी तरह का पहला उदाहरण नहीं है. भारत के खिलाड़ी और पूर्व खिलाड़ी अमूमन किसी कहानी के 'विवादित' पहलू पर बात नहीं करते हैं.

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सचिन तेंदुलकर ने अपनी आत्मकथा में फिक्सिंग दौर की बात नहीं की. धोनी के जीवन पर बनी फिल्म में भी विवादों का जिक्र तक नहीं हुआ. इस पर सवाल भी उठे.

इसका कारण क्या है, इस सवाल पर 'आज तक' चैनल के खेल संपादक विक्रांत गुप्ता कहते हैं, "भारतीय क्रिकेट की ताकत यही है. पाकिस्तान में जो खिलाड़ी आज भी टीम में खेल रहे होंगे, वो एक दूसरे ख़िलाफ कभी भी कुछ भी बोल देंगे लेकिन भारतीय टीम में एक अलिखित कोड सा है कि ड्रेसिंग रूम की बात बाहर आती नहीं है."

वो कहते हैं कि साल 1960 से लेकर 90 के दशक के मध्य तक ऐसी बातें बाहर आ जाती थीं लेकिन बीते 15-20 साल से जब से भारतीय क्रिकेट का सुनहरा दौर शुरु हुआ है, खिलाड़ी बातें बाहर नहीं लाते.

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विक्रांत गुप्ता, विराट कोहली का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उन्होंने दिखाया है कि वो बड़े दिल के मालिक हैं.

वो कहते हैं, "दो साल से विराट टेस्ट टीम के कप्तान हैं. कामयाब बल्लेबाज हैं. टीम जीत रही थी लेकिन एक भी जगह उन्होंने कहा नहीं कि मैं वनडे की कप्तानी का इंतज़ार कर रहा हूं. बाकी देशों में शायद ऐसा न होता."

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क्या खिलाड़ियों के विवादित पहलुओं पर बात करने पर बोर्ड की तरफ से कोई पाबंदी होती है, इस सवाल पर वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, " दूसरे देशों के खिलाड़ी जैसे बेबाक होकर बोलते हैं. यहां के खिलाड़ी वैसा नहीं बोलते. खिलाड़ी जब तक खेल रहा होता है, बोर्ड की पाबंदी तभी तक होती है. मुझे लगता है खिलाड़ी डरते हैं कि बोल दिया तो विवाद हो जाएगा. उनका क्रिकेट के बाहर भी करियर है. उसके लिए ठीक नहीं रहेगा. "

खिलाड़ियों की अबूझ चुप्पी की वजह से अब तक ये जानकारी नहीं हो सकी है कि साल 1996 में नवजोत सिंह सिद्धू अचानक इंग्लैंड का दौरा बीच में छोड़कर क्यों लौट आए थे?

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क्या महेंद्र सिंह धोनी और वीरेंद्र सहवाग के बीच वाकई कोई विवाद था?

धोनी की ही तरह साल 2012 में सचिन तेंदुलकर ने वनडे टीम के चयन के ठीक पहले संन्यास का ऐलान कर दिया था.

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बाद में पूर्व सेलेक्टर संदीप पाटिल ने जानकारी दी कि अगर सचिन संन्यास न लेते तो हो सकता है उन्हें ड्रॉप कर दिया जाता.

लेकिन, उनके किसी साथी खिलाड़ी ने इस मुद्दे पर मुंह नहीं खोला.

विक्रांत गुप्ता कहते हैं, "पैसा भारतीय क्रिकेट में इतना है कि लोग कोशिश करते हैं कि ज्यादा विवादों में न पड़ें लेकिन ऐसा नहीं है कि दिल की बात नहीं रख पाएं. वीरेंद्र सहवाग ने जब संन्यास लिया तो तमाम नाम लिए लेकिन धोनी का नाम नहीं लिया लेकिन उन्होंने ये भी नहीं कहा कि धोनी ने मुझे टीम से बाहर निकाला."

वो कहते हैं कि भारतीय खिलाड़ियों के बीच आलोचना का एक नियम तय सा है. 'बिलो द बेल्ट' यानी कमर के नीचे वार नहीं होगा.

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उधर, प्रदीप मैगज़ीन की राय है कि खिलाड़ियों के बीच अनबन कोई चौंकाने वाली बात नहीं है.

वो कहते हैं, "मैंने कुछ खिलाड़ियों से बात की है. उनका कहना है कि जब वो खेल रहे थे तो उन्हें लगता था कि ये मुद्दे ज्यादा बड़े थे लेकिन बाद में उन्हें लगा कि ये इतने बड़े मुद्दे नहीं थे. इसे क्या तूल दिया जाए."

हालांकि प्रदीप मैगज़ीन मानते हैं कि खिलाड़ियों को दूसरे पहलू पर भी बात करनी चाहिए जिससे ये बातें भी दर्ज़ हो सकें.

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उधर, विक्रांत गुप्ता की राय है कि खिलाड़ियों में दिक्कतों पर भी बात होती होगी लेकिन शायद वो इसे मीडिया के सामने नहीं लाना चाहते हैं.

ये बात दीगर है कि खिलाड़ियों का हर वक्त पीछा करने वाले कैमरे जब उनके गुस्से, थप्पड़, आंसुओं और अलगाव को कैद कर लेते हैं तब भी वो सवालों के बाउंसर को 'डक' करना बेहतर समझते हैं.

आखिर वो भद्रजनों के खेल का हिस्सा हैं.

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