गोल्ड जीतने वाले आजमगढ के कलेक्टर

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Image caption एशियन पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप में आज़मगढ़ के ज़िलाधिकारी सुहास एलवाई ने स्वर्ण पदक जीतकर सबको हैरान कर दिया.

उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जैसे संवेदनशील ज़िले की क़ानून व्यवस्था सँभालते हुए बैडमिंटन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना असंभव सी बात भले ही लगती हो, लेकिन सुहास एलवाई ने ऐसा कर दिखाया है.

चीन के बीजिंग में पिछले साल नवंबर में हुई एशियन पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप में आज़मगढ़ के ज़िलाधिकारी सुहास एलवाई ने स्वर्ण पदक जीतकर सबको हैरान कर दिया. उनकी सफलता की सूचना न सिर्फ़ मुख्यमंत्री ने ट्विटर के ज़रिए दी बल्कि बीजिंग से वापस आते ही राज्य का अहम पुरस्कार यश भारती भी दिया.

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बीबीसी से ख़ास बातचीत में सुहास एलवाई ने बताया कि प्रशासनिक ज़िम्मेदारी उनका दायित्व है और खेल उनका शौक़. वो कहते हैं, "व्यक्ति कितना भी व्यस्त हो, अपनी सबसे प्रिय चीज़ के लिए समय निकाल ही लेता है. ठीक इसी तरह मैं भी बैडमिंटन के लिए समय निकालता हूं."

फ़ाइनल मैच में सुहास एलवाई ने इंडोनेशिया के हैरी सुशांतो को कड़े मुक़ाबले में हराते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया. इस टूर्नामेंट में देश से गए 26 सदस्यीय दल में सुहास एलवाई ही एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जो पेशेवर खिलाड़ी नहीं थे. बीजिंग में ज़बर्दस्त प्रदर्शन करते हुए सुहास एक के बाद एक छह मैच जीतकर फ़ाइनल में पहुंचे थे.

कर्नाटक के शिमोगा के रहने वाले और 2007 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी सुहास एलवाई ने इससे पहले भी बैडमिंटन में कई प्रतियोगिताएं जीती हैं. एशियन पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप के लिए उन्होंने डेढ़ महीने पहले आवेदन किया था लेकिन उन्हें वाइल्ड कार्ड के ज़रिए प्रतियोगिता में प्रवेश मिला.

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उन्होंने एक और दिलचस्प बात बताई, "स्कूल और कॉलेज के दिनों में क्रिकेट खेलता था. क्रिकेट में अच्छी बैटिंग करता था और कई मैच भी खेले लेकिन राज्य स्तरीय प्रतियोगिताएं नहीं खेली. बैडमिंटन के प्रति रुझान आईएएस में चयनित होने के बाद प्रशिक्षण के दौरान हुआ और फिर नियमित तौर पर अभ्यास करने लगा."

बचपन से ही एक पैर ठीक न होने के बावजूद खेलों के प्रति रुझान बढ़ाने का श्रेय सुहास एलवाई अपने पिता को देते हैं. उनके पिता ने पढ़ाई और खेल दोनों के प्रति उनका उत्साह बढ़ाया.

सुहास बताते हैं कि ज़िलाधिकारी के तौर पर अपनी व्यस्तताएं ज़रूर हैं लेकिन बैडमिंटन के अभ्यास के लिए एक-डेढ़ घंटे का समय वो अक्सर निकाल ही लेते हैं. सुबह समय मिला तो ठीक, नहीं तो रात को ही सही.

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सुहास मज़ाक़िया लहजे में कहते हैं कि खेल के प्रति जुनून को देखते हुए कई बार उनकी पत्नी भी झल्ला जाती हैं लेकिन पत्नी ऋतु इससे इनकार करती हैं. ऋतु ख़ुद भी पीसीएस अधिकारी हैं और फ़िटनेस को लेकर काफ़ी संजीदा रहती हैं.

ज़िलाधिकारी जैसे पद पर रहते हुए किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट को जीतने का शायद ये पहला उदाहरण है. सुहास एलवाई आज़मगढ़ के सुखदेव पहलवान स्पोर्ट्स स्टेडियम में नियमित रूप से अभ्यास करने जाते हैं.

वो कहते हैं, "ज़िलाधिकारी रहते हुए ये उपलब्धि हासिल करने वाला मैं पहला व्यक्ति हूं, ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन मैं चाहता हूं कि ऐसा और लोग भी करें." उनके मुताबिक़ अब कुछ और अधिकारी भी खेलों के प्रति अपनी रुचि को आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगे हैं.

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