डायना को ऐसे नहीं मिली बीसीसीआई में जगह

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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से नामित चार सदस्यों वाली समिति में डायना एडुलजी का जैसे ही नाम आया, उनके बारे में सब तरफ़ ख़बरे छपने लगीं और उनका फ़ोन लगातार घनघनाने लगा.

डायना को फ़ोन कर रहे पत्रकारों का कहना है कि पहले तो उन्होंने मीडिया और बधाई संदेश देने वालों से बात की, लेकिन लगातार आ रहे फ़ोन से परेशान होकर उन्होनें अपना फ़ोन ही साइलेंट कर दिया है और वो उसपर बात नहीं कर रही हैं.

लेकिन चार सदस्यों वाली समिति में डायना का आना इसलिए भी सुर्ख़ियाँ बटोर रहा है क्योंकि इन सदस्यों में वो एकमात्र क्रिेकेट खिलाड़ी हैं. लेकिन यहां उनके होने के कई कारण हैं और क्रिकेट जगत से जुड़े लोगों, क्रिकेट पत्रकारों और खिलाड़ियों के अनुसार ये पाँच बातें डायना को ख़ास बनाती हैं.

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सख़्त अनुशासन

डायना एक सख्तमिजाज़ और काफ़ी अनुशासनप्रिय महिला हैं. रेलवे में स्पोर्ट्स ऑफ़िसर रहने के दौरान उन्होनें रेलवे की महिला और पुरुष दोनों ही टीमों के लिए काम किया.

क्रिकेट कोच विद्याधर पराडकर बताते हैं, "रेलवे में क्रिकेट खिलाड़ियों को नौकरी दिलवाने का श्रेय उन्हीं को जाता है और वो काफ़ी कड़ी ट्रेनिंग में विश्वास रखती हैं. उनके सामने खेलने वाले बच्चे उनका आदर भी करते हैं और उनसे डरते भी हैं."

वो याद करते हुए बताते हैं कि रेलवे से खेल कर आए कुछ खिलाड़ियों के अनुसार डायना के कार्यकाल में अगर आप बिना इजाज़त किसी मैच से छुट्टी लेते हैं तो भले ही आपकी शादी हो, मैच में तो आना पड़ेगा और शायद इसी अनुशासन का कमाल रहा कि भारत की राष्ट्रीय टीम में सालों साल रेलवे के खिलाड़ियों का दबदबा रहा.

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डेडिकेशन

पहले ही मैच के दौरान लगी चोट में डायना एडुलजी के आगे के चारों दांत टूट गए थे.

पारसी ब्लॉगर सिमिन पटेल बताती हैं कि उस समय किसी महिला के लिए ऐसी चोट उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन को तबाह कर सकने वाली होती लेकिन आँटी को इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता था, वो न खेलने से घबराई और न ही पीछे हटी, वो चोट से उबरी और वापिस खेलने लगी.

भारत के लिए 1976 से 1993 तक 20 टेस्ट और 34 एकदिवसीय अंतराष्ट्रीय मैच खेलने वाली डायना के नाम भारत की ओर से महिला टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक 63 विकेट लेने का रिकॉर्ड है.

इसके अलावा महिला क्रिकेट के दोनो फ़ॉर्मेट में कुल 100 विकेट चटकाने वाली वो पहली भारतीय महिला भी हैं.

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महिला क्रिकेट में योगदान

डायना हमेशा से ही भारत में महिला क्रिकेट को लेकर चले आ रहे ढुलमुल रवैए के खिलाफ़ आवाज़ उठाती रही हैं.

महिला क्रिकेटरों को कम मैच फ़ीस, पुरुष खिलाड़ियों के मुकाबले कमतर होटलों में ठहराए जाने और कम सुविधाएं दिए जाने जैसी शिकायतों को उन्होनें हमेशा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया.

महिला क्रिेकेट को उनका योगदान ये भी कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में भारत की सफ़लतम महिला गेंदबाज़ झूलन गोस्वामी को रेलवे में अपने कार्यकाल के दौरान डायना ने भी सिखाया है.

प्रशासन का अनुभव

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भारत की पहली महिला टेस्ट टीम का हिस्सा रही और एकदिवसीय क्रिकेट टीम की पहली कप्तान रही डायना का नाम इस लिस्ट में देखकर खेल पत्रकारों और खेल से जुड़े लोगों को हैरानी नहीं होती.

विद्याधर पराडकर (कोच) और अंकुर त्यागी (खेल पत्रकार) के अनुसार उन्हें रेलवे में खेल प्रबंधन का अच्छा खासा अनुभव रहा है और फिर वो मुंबई क्रिकेट असोसिएशन की ओर से क्रिकेट इंप्रूवमेंट कमेटी का भी हिस्सा रही हैं.

अंकुर के अनुसार, " भारत में महिला क्रिकेट को आगे ले जाने में उनका बड़ा हाथ है और वो ऐसा इसलिए कर पाई क्योंकि खेल के अलावा वो खेल के प्रबंधन और प्रशासन से भी जुड़ी."

महिला क्रिकेट को मज़बूत बनाने का दृढ़ संकल्प डायना ने तब लिया था जब वो बतौर कप्तान 1986 में इंग्लैंड के दौरे पर टेस्ट खेलने गई थीं और उन्हें क्रिकेटरों के लिए मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स मैदान के लॉर्ड्स क्लब में घुसने नहीं दिया गया था.

अंकुर बताते हैं कि उस समय क्लब के नियमों के अनुसार महिलाओं को अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी जिसे अब सुधार कर महिला क्रिकेटरों के लिए खोल दिया गया है.

पारसी क्रिकेट

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वो भारत की दूसरी पारसी महिला क्रिकेटर थी और उनकी बहन बहरुज़ और डायना के बाद पारसी समुदाय से कोई महिला क्रिकेट खिलाड़ी नहीं निकली.

पारसियाना मैग़ज़ीन के संपादक जहांगीर पटेल के अनुसार वो कमाल की क्रिकेटर थी और पारसी ट्रेडिशन के विपरीत काफ़ी चुस्त और दमखम वाली थीं, शायद इसलिए वो ऐसा कर पाईं

एडुलजी परिवार में पहले क्रिकेट खेलने की परंपरा रही थी और पारसी जिमखाना आकर इस खेल को देखने वाली डायना ने इस खेल में बड़ा नाम किया.

जहां पुरूष क्रिकेटरों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले आखिरी पारसी फ़ारूख़ इंजीनियर थे तो वहीं महिला क्रिकेट में ये काम डायना ने किया है और पुरुष-महिला को एकतरफ़ कर दें तो वो क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली आख़िरी पारसी थीं.

डायना एडुलजी इस समय बेहद व्यस्त हैं क्योंकि न सिर्फ़ उन्हें लोढ़ा कमिटी की सिफ़ारिशों को लागू करवाने का काम करना है, उन्हें महिला विश्व कप के क्वालिफ़ाई मैचों में खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर भी ध्यान देना है.

और प्रेस को दिए अपने बयान में वो बस इतना कहती हैं कि वो क्रिकेट को साफ़ और सभी (महिला-पुरुष) के लिए समान मौकों वाला खेल बनाने की ओर अपना ध्यान लगाना चाहती हैं.

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