'पद्मश्री अवॉर्ड तो मिला, अब एक नौकरी भी मिल जाए'

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Image caption भारतीय ब्लाइंड टीम के पूर्व कप्तान शेखर

क्या पद्मश्री अवॉर्ड के लिए चुना गया कोई व्यक्ति एक अदद नौकरी का भी तलबगार हो सकता है. शेखर नाइक के साथ कुछ ऐसा ही मामला है.

शेखर नाइक भारतीय नेत्रहीन क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान हैं. विडंबना है कि वो भारतीय क्रिकेट के कैप्टन विराट कोहली के साथ पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किए जाएंगे लेकिन वो फिलहाल बस एक नौकरी चाहते हैं.

शेखर इसे एक सम्मान का मौका तो मानते हैं पर कहते हैं कि अगर एक नौकरी मिल जाती तो वो ब्लाइंड क्रिकेट की लिए और भी बहुत कुछ कर सकता हैं.

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बचपन से ही आंखों की रोशनी से वंचित शेखर नाइक असल जिंदगी के भी नायक हैं. कर्नाटक के एक छोटे से जिले शिमोगा में पैदा हुए शेखर बचपन से ही नेत्रहीन हैं. ये उनके परिवार की आनुवांशिक बीमारी थी.

ग्यारह साल की उम्र में पहली कक्षा में दाख़िला लेने के समय से ही उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था. अपने स्कूल के लिए शेखर ने स्टेट लेवल टूर्नामेंट खेला.

ये सब बहुत मुश्किल रहा शेखर नाइक के लिए. अपने अनुभव के बारे में शेखर कहते हैं, "दोस्त लोग मेरे अंधेपन का मजाक बनाते थे पर मुश्किल घड़ियों में मां साथ रहीं और हमेशा हौसला बंधाती रहीं."

साल 2000 में शेखर ने एक टूर्नामेंट में सिर्फ़ 46 गेंदों में 136 रन बनाकर सभी को चौंका दिया और उन्हें कर्नाटक टीम में प्रवेश मिल गया.

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इसके बाद तो सारे रास्ते मानो खुलते चले गए. 2012 के टी-20 विश्व कप में शेखर भारत की ब्लाइंड टीम के कप्तान रहे. बतौर कप्तान उन्होंने भारत के लिए दो विश्वकप जीते हैं.

शेखर नाइक कहते हैं, "भारत पाकिस्तान का ब्लाइंड क्रिकेट मैच आम मैचों की तरह ही सनसनी पैदा करता है."

क्रिकेट ने शेखर नाइक की जिंदगी बदल कर रख दी. उनका कहना है, "दृष्टिबाधित क्रिकेट के कारण ही मुझे पद्मश्री अवॉर्ड यह सम्मान मिला है और इसी ने मुझे मौका दिया. इसी की वजह से मैं क्रिकेट में अपने देश का प्रतिनिधित्व कर सका."

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Image caption शेखर नाईक

नेत्रहीन क्रिकेट को बढ़ावा देने को लेकर बीसीसीआई से उम्मीदों पर उन्होंने कहा, "भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को ब्लाइंड क्रिकेट मान्यता देनी चाहिए. हमने दो विश्व कप जीते हैं और लड़के अच्छा खेल रहे हैं."

उन्होंने ब्लाइंड क्रिकेटरों के लिए अन्य क्रिकेटरों जैसी सुविधाओं की भी मांग की है. शेखर फिलहाल एक गैरसरकारी संगठन के लिए काम करते हैं और उन्हें इसके लिए 20 हजार रुपये महीने मिलते हैं.

उन्हें एक नौकरी की तलाश है जिससे उनकी जिंदगी थोड़ी आसान हो जाए. वह कहते हैं, ''लोगों का ध्यान इस तरफ़ नहीं जाता. चाहे वो महिला क्रिकेट हो नेत्रहीन क्रिकेट टीम या विकलांग क्रिकेटरों की टीम.''

क्रिकेट के भविष्य को लेकर वह कहते हैं कि ''भारत में ब्लाइंड क्रिकेटर्स को खोजना और उनको आगे लाना मेरा लक्ष्य है.''

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