विवेचना: भारत में खेली गई सर्वश्रेष्ठ टेस्ट पारी

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Image caption पाकिस्तानी बल्लेबाज़ जावेद मियांदाद भारत के ख़िलाफ़ बैटिंग करते हुए

जावेद मियाँदाद अपने दिल की बात अपने दिल में रखने के लिए कभी मशहूर नहीं रहे.

1987 में भारत पाकिस्तान सिरीज़ में जब पहले चार टेस्ट ड्रा हो गए और पांचवें और अंतिम टेस्ट में इमरान ख़ान अपने प्रिय अब्दुल क़ादिर को खिलाने पर अड़े हुए थे, मियाँदाद और इमरान के बीच तीखी नोकझोंक हुई.

मियाँदाद इमरान को ये समझा पाने में कामयाब हो गए कि उस पिच पर इक़बाल क़ासिम अब्दुल क़ादिर से बेहतर साबित होंगे. क्रिकेट पंडितों की आलोचना का नतीजा ये रहा कि बंगलौर के क्यूरेटर ने स्पोर्टिंग पिच बनाने का फ़ैसला किया.

'गावस्कर को देख लगा ऐसा ही खेलना है'

अगर गावस्कर वॉक-आउट कर जाते तो....

उस मैच में भारत के लिए विकेटकीपिंग कर रहे किरण मोरे को वो पिच अभी तक याद है, "होली का माहौल था और होली जैसी ही पिच थी जिसके दो अलग अलग रंग थे. पिच को बिल्कुल भी रोल नहीं किया गया था. पहली गेंद से ही गेंद टर्न हो रही थी और टिप्पा खाने पर मिट्टी निकल रही थी. इस पिच पर जितने भी फ़ास्ट बॉलर थे वो फ़ास्ट गेंद न कर इन कटर मार रहे थे."

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जब गावस्कर ने भारत को पाक पर जीत के करीब पहुंचा दिया

पाकिस्तान की पूरी टीम सिर्फ़ 116 रन बना सकी मनिंदर सिंह ने सिर्फ़ 27 रन दे कर 7 विकेट लिए. दिन का खेल समाप्त होने पर भारत ने 2 विकेट खो कर 68 रन बना लिए थे.

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अगले दिन दिलीप वैंगसरकर ने 50 रन बनाए और वो और रवि शास्त्री स्कोर को पाकिस्तान के पार ले गए. लेकिन तभी भारतीय टीम लड़खड़ाई और पूरी टीम 145 रनों पर सिमट गई.

मनिंदर का कमाल

उस टीम में भारत की ओर से खेलने वाले मनिंदर सिंह याद करते हैं, "मुझे नाराज़गी थी भारतीय बल्लेबाज़ों से. वैंगसरकर ने इस पिच पर इतने अच्छे पचास रन बनाए थे और मुझे लग रहा था कि अगर वो उस पिच पर इसी तरह खेलते रहे तो हमें एक ऐसी लीड मिल जाएगी कि हमें दोबारा खेलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."

"लेकिन उन्होंने अपना विकेट थ्रो कर दिया. वो मैच का एक टर्निंग प्वाइंट था. उस पिच पर अगर किसी बल्लेबाज़ को ये अंदाज़ा हो जाए कि बाउंस कितना है और गेंद कितनी टर्न हो रही है तो उसे मैच को निकाल कर ले जाना चाहिए था."

दूसरी पारी में पाकिस्तान ने थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया को वो स्कोर को 249 तक खींच कर ले गए. इमरान ख़ान ने जावेद मियाँदाद को रमीज़ राजा के साथ ओपनिंग करने भेजा और इक़बाल क़ासिम को पांचवें नंबर पर प्रमोट किया.

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उस मैच में पाकिस्तान के हीरो रहे इक़बाल क़ासिम याद करते हैं, "मनिंदर सिंह की पहली पारी की गेंदबाज़ी इतनी असाधारण थी कि सबको घबराहट थी कि दूसरी पारी में दाएं हाथ के बल्लेबाज़ों को उसका सामना करना बहुत मुश्किल होगा. हमारी कोशिश थी कि हम ज़्यादा से ज़्यादा बाएं हत्थे बल्लेबाज़ों को क्रीज़ पर रखें ताकि मनिंदर को खेलना आसान हो जाए."

"हम गेंदबाज़ी करके वापस आए ही थे. डेढ़ दो बजे का समय था. जावेद और इमरान दोनों ने मुझसे कहा कि पैड बांधो. मैंने सोचा कि वो ऐसा क्यों कह रह रहे हैं क्योंकि नाइट वॉचमैन की तरह जाने का भी मौका नहीं था क्यों अभी उजाला था और एक दो घंटों का खेल बाक़ी था. जब मैं क्रीज़ पर पहुंचा तो सलीम मलिक ने मुझसे कहा कि गेंद बहुत ब्रेक हो रहा है. अगर वो आपके बल्ले में आए तो उसे मारें ताकि कुछ रन बन जाएं. मैंने वैसा ही किया. हर गेंद पर मैंने चांस लिया जिसकी वजह से वक्त भी गुज़रा और मैंने 26 रन बनाए."

इक़बाल क़ासिम का जादू

इसके अलावा पाकिस्तान के स्कोर को 249 तक ले जाने में सबसे बड़ी भूमिका थी सलीम यूसुफ़ की जिन्होंने 41 नाबाद रन बनाए और तौसीफ़ के साथ मिल कर नवें विकेट के लिए 51 रन जोड़े.

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Image caption पाकिस्तानी स्पिनर इक़बाल क़ासिम

अंतत: मनिंदर ने सलीम जाफ़र को आउट कर पाकिस्तान की पारी का अंत किया, लेकिन वो अपनी बालिंग से खुश नहीं थे. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैंने दूसरी पारी में इतनी अच्छी गेंदबाज़ी नहीं की. एक तो इतना दबाव आ गया था और दूसरे हर कोई आ कर सलाह दे रहा था जिससे मेरी अपनी सोच कहीं खो गई थी. सलाह देने वालों में पूर्व क्रिकेटर भी थे. शायद उसी की वजह से पाकिस्तान के 50 रन फ़ालतू बन गए."

भारत को जीतने के लिए 221 रनों का लक्ष्य मिला लेकिन वसीम अकरम ने लगातार दो गेंदों पर श्रीकांत और मोहिंदर अमरनाथ को आउट कर पाकिस्तान को आगे कर दिया. जब तीसरे दिन का खेल समाप्त हुआ तो भारत के 4 विकेट पर 99 रन थे.

जम गए गावस्कर

अच्छी बात ये थी कि गावस्कर अभी भी 52 रनों पर जमे हुए थे. उस मैच को कवर करने वाले अयाज़ मेमन याद करते हैं, "मैं रेस्ट डे के दिन इक़बाल क़ासिम से मिलने वेस्ट एंड होटल गया था. इक़बाल और तौसीफ़ दोनों एक ही रूम शेयर कर रहे थे. जब मैं वहां पहुंचा तो वो दोनों ख़ामोशी में बैठे हुए थे. न वो आपस में कोई बात कर रहे थे और न मुझसे."

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"मैंने उनसे पूछा कि इतनी ख़ामोशी की वजह क्या है ? उन्होंने कहा बाबा आदम अभी तक बैटिंग कर रहे हैं. हमारा कप्तान हमसे ख़फ़ा है कि अगर हम इस बाबा आदम यानि गावस्कर का विकेट नहीं लेते तो ये मैच हमारे हाथ से जाता रहेगा. ये शख़्स 38 की उम्र में इतना अच्छा खेल रहा है कि समझ में नहीं आ रहा है कि इसे कैसे आउट करें."

उस मैच में रेस्ट डे होली के दिन पड़ा था. बीबीसी और लंदन के टाइम्स अख़बार के लिए मैच कवर करने वाले क़मर अहमद को वो दिन भी तक याद है.

होली का धमाल

क़मर बताते हैं, "जब मैं अपने कमरे से निकला तो पाकिस्तान के एक फ़ोटोग्राफ़र फ़ारूख उस्मान ने कहा कि क़मर भाई आप होटल के स्वीमिंग पूल की तरफ़ न जाएं. मैंने पूछा क्यों? वो बोले आज होली है. वहाँ जावेद मियांदाद, किरण मोरे और अभिनेत्री अमृता सिंह सभी को उठा कर स्वीमिंग पूल में फेंक रहे हैं."

"उन्होंने कलकत्ता के एक पत्रकार किशोर भिमानी को फेंक दिया है और इस चक्कर में उनके पैर की एक उंगली टूट गई है. लेकिन इस बीच उन लोगों ने मुझे देख लिया. वो मेरी तरफ़ भागे हुए आए तो मैंने कहा मेरी जेब में बीबीसी के ज़रूरी कागज़ हैं और वो कार्ड है जिससे रिपोर्टिंग की जाती है. उस ज़माने में टैलेक्स भेजने के लिए एक कार्ड दिया जाता था."

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"जावेद ने कहा, कमर हम आप के साथ कुछ नहीं करेंगे. आप सिर्फ़ अपने बाल में गुलाल लगवा लीजिए. मैं इसके लिए राज़ी हो गया. इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आप यहीं खड़े हो कर तमाशा देखें. ये लोग इमरान ख़ान के आगे खड़े हो गए. दो लोगों ने उसे पीछे से कवर कर लिया. उन्होंने इमरान को पकड़ कर एक गाल पर काली ग्रीस और दूसरे गाल पर लाल ग्रीस मल दी. इमरान पूरी रात और अगली सुबह वो ग्रीस छुड़ाता रहा, लेकिन उसका चेहरा साफ़ नहीं हुआ. अगले दिन जब वो मैदान पर उतरा तो उसके दोनों गालों पर गहरा रंग लगा हुआ था."

काम आई बेदी की सलाह

उसी दिन शाम को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने दोनों टीमों के खिलाड़ियों के लिए उसी होटल में एक स्वागत समारोह रखा हुआ था. वहीं इकबाल क़ासिम की मुलाकात भारत के महान स्पिनर बिशन सिंह बेदी से हुई.

इक़बाल बताते हैं, "मैं और तौसीफ़ पार्टी में पहले पहुंच गए थे. तब तक वहाँ कोई नहीं आया था. बिशन बेदी कोने में बैठे हुए थे. हम उनके पास पहुंच कर बातें करने लगे. बातों बातों में मैंने उन्हें मुबारकबाद दी कि आप का शागिर्द मनिंदर सिंह बहुत अच्छा गेंदबाज़ है. बेदी बोले, यार पहली इनिंग में तो ठीक गेंदबाज़ी की उसने लेकिन दूसरी पारी में उसने इतने रन करवा दिए. ये कोई बॉलिंग हैं."

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Image caption भारत के सबसे कामयाब स्पिनरों में एक बिशन सिंह बेदी

"इतना बॉल ब्रेक हो रहा है. ये ऊपर से और ज़ोर लगा रहा है. बैट्समैन बीट हो रहा है, विकेटकीपर बीट हो रहा है. गेंद बल्ले पर लग ही नहीं रही है. इस पिच पर ऐसी गेंदें नहीं करनी चाहिए. मैं तो ख़ुश नहीं हूँ उसकी बॉलिंग से. मैं वहीं समझ गया कि इस विकेट पर ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं है. मैं गेंद को टर्न नहीं कराउंगा. पिच से गेंद अपने आप टर्न हो जाए तो कोई बात नहीं. वो मनिंदर के बारे में बात कर रहे थे लेकिन सबक हम दोनों ने सीखा."

कासिम और तौसीफ़ ने बेदी की बात पर पूरा अमल किया. लेकिन उनका सामना सुनील गावस्कर से था जो अपने अंतिम टेस्ट में अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ पारी खेल रहे थे. 123 के स्कोर पर अज़हरुद्दीन ने इक़बाल क़ासिम को रिटर्न कैच दे दिया.

सबसे बेहतरीन पारी

रवि शास्त्री और गावस्कर स्कोर को 155 तक ले गए. तभी शास्त्री का भी वही हश्र हुआ जो अज़हर का हुआ था. गावस्कर ने न सिर्फ़ एक छोर संभाला हुआ था बल्कि इक़बाल क़ासिम और तौसीफ़ की भयानक टर्न लेती गेंदों पर स्ट्रोक पर स्ट्रोक लगा रहे थे. लगभग हर गेंद पर पाकिस्तानी गेंदबाज़ अपील कर रहे थे.

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यहाँ तक कि पाकिस्तानी विकेटकीपर सलीम यूसुफ़ अपील करते हुए दौड़कर बॉलर के पास वाले अंपायर के पास पहुंच रहे थे. लेकिन गावस्कर पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था. किरन मोरे याद करते हैं, "मैंने ऐसी इनिंग कभी नहीं देखी, ऐसी पिच पर और ऐसी क्वालिटी गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़. ऐसी पिच पर बल्लेबाज़ी करना जहाँ बल्ले पर गेंद लग ही नहीं रहा था बहुत बड़ी बात थी. उनकी सबसे ख़ास बात थी गेंद को छोड़ना. उन्होंने कुल 264 गेंदे खेली. आप दोनों टीमों का स्कोर कार्ड उठा कर देख लीजिए. किसी ने भी 120 से अधिक गेंदे नहीं खेली उस पिच पर."

पर जीत नहीं मिली

मैंने कराची फ़ोन कर इक़बाल क़ासिम से संपर्क कर पूछा कि गावस्कर की उस इनिंग को आप किस तरह रेट करते हैं ? क़ासिम का जवाब था, "क्या बात है. आपको वो इनिंग क्रिकेट सीखने वाले लड़कों को दिखानी चाहिए. लोग उसको देखें कि कैसे स्पिन गेंदबाज़ी को खेलना चाहिए. बॉल इतनी ब्रेक हो रही थी. वो दीवार की तरह खड़े हुए थे. उनको गेंद करना मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात की थी. मेरे हाथ से गेंद निकलता था, वहाँ से वो अंदाज़ लगाते थे कि गेंद सीधी रहेगी या टर्न होगी और वो भी कितनी. बहुत ही असाधारण बैटिंग की है गावस्कर ने उस दिन."

जब ये लगने लगा कि गावस्कर अकेले ही भारत को पाकिस्तान के पार ले जाएंगे, उन्हें इक़बाल क़ासिम की एक ऐसी गेंद मिली जिसे खेल पाना शायद किसी के लिए संभव नहीं था.

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इक़बाल क़ासिम बताते हैं, "जहाँ मेरा ध्यान भंग होता था, वो चौका मार देते थे. जब कभी गेंद पीछे पड़ जाती थी तो वो कट खेल जाते थे या ड्राइव कर देते थे. वो हाफ़ कॉक खेलते थे और लंबा स्ट्रेच नहीं करते थे. तेज़ स्पिन होती गेंद को वो निकल जाने देते थे. हम हा हू करते रहते थे, लेकिन उनकी सेहत पर असर नहीं पड़ता था. जिस गेंद पर वो आउट हुए थे वो बहुत कम ब्रेक हुई थी और बल्ले को चूमती हुई स्लिप में चली गई थी. अगर वो थोड़ी ज़्यादा ब्रेक हुई होती तो गावस्कर ने उसे खेला ही नहीं होता."

गावस्कर के आउट होते ही ये साफ़ हो गया कि पाकिस्तान जीत की तरफ़ बढ़ रहा है. रोजर बिन्नी ने छक्का लगा कर उम्मीद की एक किरण जगाई लेकिन वो क्षणिक था. पाकिस्तान ने ये मैच 16 रनों से जीत कर सिरीज़ 1-0 से जीत ली.

मुश्किल विकेट पर कमाल की पारी

मैच के बाद इमरान ख़ान ने कहा कि ये गावस्कर के जीवन की सर्वश्रेष्ठ पारी थी. जावेद मिंयादाद ने भी अपनी आत्मकथा 'कटिंग एज' में लिखा, "मैंने स्पिन लेते पिच पर इतनी बेहतरीन पारी अपने जीवन में नहीं देखी."

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मशहूर पत्रकार सुंदर राजन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 17 मार्च 1987 के अंक में लिखा, 'क्या बेहतरीन खेल! क्या ग़ज़ब की तकनीक! इस दिन गावस्कर भारत की तरफ़ से वन मैन आर्मी थे. आप यकीन नहीं करेंगे. वो दोनों छोर से खेल रहे थे."

सबसे बड़ी तारीफ़ मुदस्सर नज़र की तरफ़ से आई थी. उन्होंने लिखा, "एक ऐसी पिच पर जहाँ टेस्ट मैच करवाया ही नहीं जाना चाहिए था और जहाँ गेंद इतना उछाल और मीलों टर्न ले रही थी, गावस्कर ने बार बार इक़बाल क़ासिम को टर्न के ख़िलाफ़ मिड विकेट और मिड ऑन पर मारा. ऐसी पिच, जिस पर किसी और के लिए खड़ा होना भर दुश्वार था, गावस्कर इस तरह बैंटिंग कर रहे थे, जैसे वो किसी सीमेंट पिच पर खेल रहे हों. हम सबके लिए बैटिंग का ये एक ऐसा पाठ था जिसे हम तो क्या, बल्लेबाज़ों की आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं भूल पाएंगी."

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