नज़रिया: 'धमकी देना बीसीसीआई को शोभा नहीं देता'

  • 28 अप्रैल 2017
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Image caption अनुराग ठाकुर

भारत में क्रिकेट प्रशासन, इंसाफ़ परस्ती और पारदर्शिता की जगह लालच के लिए जाना जाता है.

बीते कई सालों में किसी न किसी तरह से बोर्ड पर धन कुबेरों का कब्ज़ा रहा. ज़रूरी था कि बीसीसीआई आर्थिक अनियमितताओं से जुड़े विवादों से निपटने के लिए एक संतुलित प्रक्रिया अपनाए, लेकिन उसकी जगह उसने क्रिकेट को सामंती अंदाज़ में चलाया.

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भारतीय क्रिकेट पर प्रभुत्व और शक्ति परीक्षण के इस खेल में सबसे ज्यादा नुकसान क्रिकेट की छवि को पहुंचा है. देश की सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करके एक समानांतर बॉडी बनाकर खेल की छवि सुधारने की कोशिश करनी पड़ी.

कोर्ट ने भारत में क्रिकेट के प्रशासन के लिए एक समिति का गठन किया जो लोढ़ा कमेटी के सुझावों को लागू करते हुए क्रिकेट को बचाने की पूरी कोशिश कर रही है.

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Image caption सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति गठित की है.

इन प्रशासकों ने अब तक खेल को किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचाए रखा है. लेकिन अब चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर बोर्ड और आईसीसी के बीच तनाव पैदा हो गया है.

ये विवाद प्रशासक परिषद और बीसीसीआई के बीच नहीं बल्कि बीसीसीआई और आईसीसी (क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय बॉडी) के बीच खड़ा हो रहा है. इसके चलते चैंपियंस ट्रॉफी रद्द हो सकती है.

चैंपियंस ट्रॉफी पर विवाद के कारण

इसके लिए क्रिकेट की दुनिया के तीन सबसे बड़े देश भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड ज़िम्मेदार हैं. इन देशों ने सालों पहले इस समस्या के बीज बोना शुरू किए थे. पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन एक फार्मूला लेकर आए थे. इसके तहत आईसीसी के लाभ का बड़ा हिस्सा इन तीनों देशों के हिस्से में आना था.

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इस स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण फार्मूले की मदद से सबसे बड़ा हिस्सा भारत, दूसरा ऑस्ट्रेलिया और तीसरा हिस्सा इंग्लैंड को मिलना था. वहीं, अन्य टेस्ट खेलने वाले देशों को बचा-खुचा हिस्सा मिलना था. दक्षिण अफ्रीका जैसे देश को भी इस नई प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया और टेस्ट खेलने वाले देशों की दूसरी श्रेणी में रखा गया.

भारत का तर्क था कि आईसीसी अपना 70 से 80 फ़ीसदी मुनाफा भारतीय विज्ञापन दाताओं से कमाता है ऐसे में भारत को लाभ में से सबसे बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए.

इसके साथ ही कहा गया कि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के भी क्रिकेट प्रेमी बड़ी संख्या में मैच देखते हैं और इससे आईसीसी को फायदा मिलता है. ऐसे में इन देशों को भी लाभ में बड़ी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.

आईसीसीई में तीखी बहस के बाद इस नए फार्मूले को मान्यता मिल गई. इस मॉडल को लाभ के बंटवारे के साथ ही मैचों के बंटवारे पर लगाया गया.

लेकिन आईसीसी के भीतर और बाहर पर्यवेक्षकों को ये रास नहीं आया. इन्हें लग रहा था कि आईसीसी के इस फॉर्मूले से क्रिकेट खेलने वाले विकासशील देशों के साथ अन्याय हुआ और इस अनुचित धन बंटवारे वाले मॉडल से उनकी अनदेखी हुई.

खेल के रूप में क्रिकेट सिर्फ आठ देशों तक सीमित है. इनमें से भी सभी देश प्रतियोगिता के लिए तैयार नहीं हैं. क्रिकेट खेलने वाले नए और छोटे देशों को विकसित किया जाना चाहिए.

आईसीसी को अहसास हुआ कि पुराने मॉडल में बदलाव किए जाने की ज़रूरत है.

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नए मॉडल के तहत बीसीसीआई को 293 मिलियन डॉलर, इंग्लैंड को 143 मिलियन डॉलर, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, वेस्ट इंडीज, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को 132 मिलियन डॉलर और ज़िम्बाब्वे को 94 मिलियन डॉलर साथ ही एसोसिएट देशों के लिए कुल 280 मिलियन डॉलर की व्यवस्था है.

और इसी मुद्दे पर बीसीसीआई, आईसीसी से नाराज़ है.

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इस मॉडल को 14 में से 13 वोटों के साथ पास किया गया है. दुख की बात ये है कि बीसीसीआई अपने टेलीकास्ट राइट्स और आईपीएल समेत तमाम अन्य तरीकों से अरबों रुपये कमाती है फिर भी और पैसों के लिए हायतौबा मचा रही है.

आईसीसी के नए मॉडल में भी भारत को विशेष दर्जा हासिल है. लेकिन इस मुद्दे पर चैंपियंस ट्रॉफी का बहिष्कार करने की धमकी देना भारत जैसे देश को शोभा नहीं देता जो क्रिकेट के विकास यात्रा का नायक हो.

भारत को आईसीसी प्रमुख शशांक मनोहर की आलोचना करने की जगह गर्व करना चाहिए कि वे एक ऐसा मॉडल लेकर आए हैं जो उचित और व्यक्तिगत लालच की जगह न्यायसंगत प्रशासन को तरजीह दे रहा है.

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