कुंबले से नाखुश कोहली, अफवाह या हकीकत?

  • 31 मई 2017
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"कैप्टन विराट कोहली अपनी टीम के कोच अनिल कुंबले से नाखुश हैं."

चैंपियंस ट्रॉफी के शुरू होने में कुछ ही दिन पहले अख़बारों की ये सुर्खियां भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खतरे की घंटी की तरफ इशारा कर रही हैं.

ये सुर्खियां तकलीफ तो देती हैं. ऐसा लग रहा था कि भारतीय क्रिकेट अपने उरूज पर है. टीम इंडिया ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है, सिरीज जीती है.

कोई इशारा तक नहीं था कि कोच और कैप्टन के बीच किसी तरह की अनबन है.

अगर ये बात सही है तो ये अफसोस वाली बात है और अगर गलत है तो ऐसी अफवाहें नहीं होनी चाहिए.

इस सिलसिले में बीसीसीआई, उसकी प्रशासन समिति और सलाहकार कमिटी को एक प्रोएक्टिव रोल प्ले करना चाहिए.

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हार्ड टास्क मास्टर

जो भी हो और जिस हद तक मुमकिन हो, आपस में बात करके मामले को सुलझाना चाहिए. कुंबले सख्ती से काम लेने वाले कोच के तौर पर जाने जाते हैं.

हालांकि ये बात बाहर से कहना मुश्किल है. कोई अगर चाहे कि परफॉर्मेंस अच्छा हो, वो एक्सिलेंस की तरफ अपनी तवज्जो देता हो तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है.

ये कहना कि कुंबले हार्ड टास्क मास्टर हैं, और इस वजह से कुछ खिलाड़ी उनसे खुश नहीं हैं, मैं नहीं मानता.

मुझे लगता है कि अगर कुछ ऐसा है तो इसकी कुछ और वजह हो सकती है. मुझे लग रहा है कि मीडिया में इस मामले को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.

अगर कुछ है तो कोहली, कुंबले, बीसीसीआई, प्रशासन समिति, सलाहकार समिति सभी को इस पर सामने आकर रुख साफ कर देना चाहिए.

इसकी वजह ये है कि 2006-07 के वक्त ग्रेग चैपल के जमाने में भारतीय क्रिकेट के साथ क्या गुजरा था. ग्रेग चैपल भी अपने जमाने के दिग्गज खिलाड़ी थे.

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कल्चरल गैप

जब वे कोच बनकर आए थे तो बहुत तारीफ हुई थी लेकिन मामला बिगड़ने लगा तो बात हाथ से बाहर निकल गई थी. ऐसा दौर लौटकर नहीं आना चाहिए.

मुझे लगता है कि उस वक्त विदेशी कोच होने की वजह से कोई कल्चरल गैप रह गया था. लेकिन अभी ऐसी कोई बात नहीं है.

अनिल कुंबले को बहुत उम्मीदों के साथ यहां पर अप्वॉयंट किया गया था. कोच, खिलाड़ी और कप्तान के तौर पर उनके प्रदर्शन के बारे में सब जानते हैं.

वे क्रिकेट प्रशासक भी रह चुके हैं, उन्होंने कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन की जिम्मेदारी संभाली है. वे आईपीएल खेल चुके हैं.

उनकी उम्र इतनी ज्यादा भी नहीं है कि ये कहा जाए कि सोच में फर्क आ गया हो और इस वजह से कैप्टन के साथ उनकी आपस में नहीं बनती हो.

मुझे लगता है कि जो भी बात हो, मीडिया में जो कहानियां बन रही हैं, या तो ये खुराफाती दिमाग की उपज हैं या फिर इनमें कोई सच्चाई तो इन्हें एड्रेस किया जाना चाहिए.

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बोर्ड का प्रोटोकॉल

इन कहानियों की शुरुआत दरअसल उस समय शुरू हुई जब बीसीसीआई ने चीफ कोच के लिए आवेदन मंगाए.

सबको ये लगा कि अगर अनिल कुंबले ने इतने अच्छे नतीजे दिए हैं तो फिर चीफ कोच की जरूरत क्या है. उनकी सेवाओं का विस्तार खुद ब खुद क्यों नहीं हो गया.

इसको देखने के दो तरीके हैं. एक तो ये कि बोर्ड प्रोटोकॉल फ़ॉलो कर रही है. पिछले साल जब कुंबले को कोच नियुक्त किया गया था तभी ये प्रोटोकॉल बना था.

और पांच छह ऐप्लिकेशन आए थे, जिनमें रवि शास्त्री भी एक थे. उस वक्त कुंबले को चुना गया था.

उनका एक साल का कार्यकाल खत्म हो रहा है और नियमों के हिसाब से आवेदन बनाए गए हैं.

दूसरा पहलू ये है कि बीसीसीआई अनिल कुंबले से नाखुश है, इस वजह से आवेदन मंगाए गए हैं.

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कोच और कैप्टन

ये दोनों वजहें तो फिर भी समझ में आती हैं लेकिन कोच और कैप्टन के बीच मनमुटाव की बात समझ से परे है.

अगर बीसीसीआई और कुंबले के बीच पैसों को लेकर कोई मतभेद है तो उसे फिर भी सुलझाया जा सकता है लेकिन कोच और कैप्टन के बीच भरोसे का रिश्ता होता है.

अगर इस रिश्ते में कोई दरार आ जाए तो इसकी भरपाई बहुत मुश्किल होती है.

इसी लिए मुझे लगता है कि अगर ऐसी कोई बात है तो इसका फौरन कोई समाधान निकाला जाना चाहिए.

अगर ये कहानियां बकवास हैं तो इससे जुड़े पक्षों का अपना स्टैंड क्लियर करना चाहिए.

हां ये सवाल जरूर प्रासंगिक है कि जब विदेशी कोचों को लंबा कार्यकाल दिया गया तो कुंबले को एक साल का ही टर्म क्यों दिया गया और कुंबले इस पर क्यों तैयार हुए.

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(बीबीसी संवाददाता वैभव दीवान से बातचीत पर आधारित)

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