भारत बनाम पाकिस्तान: दीवानगी जो जुनून में बदल जाती है

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"यह महज क्रिकेट का खेल नहीं होता है, यह इससे कहीं ज्यादा है."

इस साल के क्रिकेट के सबसे बड़े मुकाबले के पहले ये लफ्ज़ पूर्व पाकिस्तानी कप्तान आसिफ इकबाल के हैं.

रविवार को चैंपियंस ट्रॉफ़ी में एजबैस्टन में भारत और पाकिस्तान का मुकाबला है. और इस मैच के साथ दोनों टीमें चैंपियनशिप में अपनी शुरुआत कर रही हैं.

अगर पिछले मुकाबलों को ध्यान में रखें तो दोनों ही टीमों के करोड़ों चाहने वालों की नज़रें बर्मिंघम पर टिकी हैं.

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Image caption ऑलराउंडर आसिफ इकबाल ने 1964 से 1980 के बीच पाकिस्तान के लिए 58 टेस्ट और 10 वनडे मैच खेले

भारत-पाक रिश्ते

भारत और पाकिस्तान की पिछली वनडे भिड़ंत 2015 के वर्ल्ड कप में हुई थी. ऑस्ट्रेलियाई जमीन पर भारत ने पाकिस्तान को आसानी से शिकस्त दी थी.

आसिफ इकबाल की पैदाइश भारत के हैदराबाद शहर की है. बाद में वे पाकिस्तान जाकर बस गए थे.

73 वर्षीय आसिफ इकबाल कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया का ये सबसे बड़ा क्रिकेट मुकाबला होता है. यह इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जाने वाले एशेज सिरीज जैसा है. लेकिन मेरे लिए उससे कहीं बढ़कर है और यह भारत-पाक के इतिहास, अपने अतीत और राजनीतिक वजहों के कारण है."

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भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद पर जिस तरह का तनाव होता है, सियासी रिश्तों पर जैसे उतार-चढ़ाव आते हैं, उन सब के बीच क्रिकेट दोनों देशों के लोगों के लिए गुरूर दिखलाने का जरिया होता है.

इस उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के लिए क्रिकेट दीवानगी की हद से गुजरकर जुनून में बदल जाता है और कई बार तो सारी हदें टूट जाती हैं.

ये कोई असामान्य बात नहीं है हार के बाद दोनों ही टीमों के चाहने वाले अपने खिलाड़ियों के पुतले जलाने लगते हैं, उनके खिलाफ नारेबाज़ी पर उतर जाते हैं.

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पलड़ा किसका भारी

आसिफ इकबाल कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान में ये बर्ताव केवल क्रिकेट मैचों को लेकर देखने को नहीं मिलता.

वे कहते हैं, "फैंस फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी टीम से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगा रखी होती हैं. वे ये बात स्वीकार नहीं कर पाते कि अच्छा खेलने वाली टीम जीतती है. यह महत्वपूर्ण है कि भारत और पाकिस्तान की टीम अगर विदेश में जाकर ख़राब खेलती है तो भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं."

भारत और पाकिस्तान के दरमियान हाल के सालों में खेले गए मुकाबलों को देखें तो भारत का पलड़ा भारी लगता है.

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भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा मानते हैं कि भारत के नजरिये से अब इस दुश्मनी का कोई मतलब नहीं रह गया है क्योंकि वे हमेशा जीत जाते हैं.

चोपड़ा कहते हैं, "पाकिस्तान के साथ मुकाबले को लेकर भारत के खिलाड़ी अपनी नींद नहीं खराब करते. भारतीय खिलाड़ी अब पहले से ज्यादा सहज हैं. पाकिस्तान के साथ खेलने पर ऊपर से भी कोई दबाव नहीं रहता है."

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Image caption आकाश चोपड़ा भारत के लिए 10 टेस्ट मैच खेल चुके हैं, उन्होंने आईपीएल में भी हिस्सा लिया है

रंजिश वाली पिच

उन्होंने कहा, "एक देश के तौर पर हम आगे बढ़ गए हैं. एक वक्त था जब पाकिस्तान को हराना जिंदगी और मौत का सवाल हुआ करता था और इससे देश की सर्वोच्चता का भाव जुड़ा होता था."

इस क्रिकेट की रंजिश वाली पिच को थोड़ा कुरेद कर देखें तो दोनों टीमों का एक दूसरे के लिए सम्मान साफ तौर पर दिखता है.

इसमें कोई शक नहीं कि दोनों टीमों के सांस्कृतिक अनुभव, खान-पान और पहनावा एक जैसे हैं. ज्यादातर वक्त दोनों को एक दूसरे का साथ पसंद होता है.

इकबाल कहते हैं, "खिलाड़ियों की निजी पार्टियां हुआ करती थीं. भारत की टीम पाकिस्तान दौरे पर आती थी तो हमारे घर पर खिलाड़ी डिनर के लिए आते थे. ऐसी कई सोशल एक्टिविटिज़ हुआ करती थीं."

हाल ही में क्रिकेट से रिटायर हुए शाहिद अफरीदी भी आसिफ इकबाल से सहमित जताते हैं.

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बर्मिंघम का फायदा

वे कहते हैं, "खिलाड़ियों का अच्छे से स्वागत होता है. बेशक, गौतम गंभीर जैसे अपवाद भी हैं जो उतने दोस्ताना नहीं हैं. लेकिन युवराज सिंह, जहीर खान और हरभजन सिंह के साथ मेरी अच्छी दोस्ती है. और ये तीनों मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में शामिल हैं."

ठीक इसी तरह आकाश चोपड़ा तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख्तर को अपना नजदीकी दोस्त बताते हैं.

उन्होंने बताया, "हमारी अक्सर बात होती है. मैं पहला शख्स था जिसे उन्होंने अपने बेटे का नाम बताया था."

मार्केटिंग बर्मिंघम का अनुमान है कि केवल इस मैच से शहर की अर्थव्यवस्था को पांच मिलियन पाउंड का फायदा होने वाला है.

बर्मिंघम में दक्षिण एशियाई लोगों की बड़ी तादाद रहती है और इस बड़े मुकाबले को लेकर वेस्ट मिडलैंड्स में कौतूहल महसूस किया जा सकता है.

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Image caption 2007 में भारत दौरे पर आई पाकिस्तान टीम के साथ खेले गए मैच में विवाद होने पर गंभीर और अफरीदी को अलग करना पड़ा था

यादों के झरोखे से

भारत और पाकिस्तान के कुछ खिलाड़ी भले ही ये कहें कि वे मैदान के बाहर अच्छे दोस्त हैं लेकिन इतिहास बताता है कि मैदान पर कई बार रिश्ते आसानी से भुला दिए जाते हैं.

1992 के वर्ल्ड कप के दौरान सिडनी में जावेद मियांदाद इस बात को लेकर भड़क गए थे कि भारतीय विकेट कीपर किरण मोरे ज्यादा अपील कर रहे थे.

2007 में भारत दौरे पर आई पाकिस्तान टीम से कानपुर में मैच के दौरान शाहिद अफरीदी और गौतम गंभीर के बीच मामला इस हद तक बिगड़ गया था कि अंपायरों को दखल देना पड़ा था.

2010 के एशिया कप के दौरान भी ऐसा ही कुछ हुआ था. दाम्बुला में हरभजन सिंह और शोएब अख्तर के बीच कहासुनी हो गई थी.

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