तो क्या क़तर ने फ़ुटबॉल विश्व कप की मेज़बानी 'खरीदी' थी?

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साल 2022 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप की मेजबानी हासिल करने के लिए क़तर ने कथित तौर पर रिश्वत दी थी. जर्मनी की मीडिया में छपी ख़बर में ये दावा किया गया है.

जर्मन अख़बार बिल्ड ने इस सिलसिले में 2014 की फ़ीफ़ा रिपोर्ट हासिल करने का दावा किया है. अख़बार के दावे के बाद फ़ीफा ने इससे संबंधित अपनी गुप्त रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया है.

अख़बार का कहना है कि फ़ीफ़ा के इंडिपेंडेंट एथिक्स इन्वेस्टीगेटर माइकल गार्सिया की ये रिपोर्ट 'दबा दी गई' थी.

बिल्ड की रिपोर्ट में फ़ीफ़ा के एक अधिकारी की दस साल की बेटी को 20 लाख अमरीकी डॉलर दिए जाने का भी जिक्र है.

गार्सिया दिसबंर, 2014 में विरोध जताते हुए इस मामले से अलग हो गए थे. उनका कहना था कि बिडिंग की प्रक्रिया के दौरान उनकी रिपोर्ट के साथ छेड़खानी की गई.

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उन्होंने फ़ीफ़ा की गवर्निंग बॉडी से अलग होते हुए 'नेतृत्व की कमी' का आरोप लगाया था.

माइकल गार्सिया ने कहा था कि फ़ीफ़ा के अधिकारी उनकी रिपोर्ट को 'कानूनी तौर पर वाजिब स्वरूप' में पब्लिश करने के लिए 'आम सहमति से तैयार' हो गए थे.

गार्सिया की रिपोर्ट के '42 पन्नों वाले संस्करण' में क़तर को करप्शन के आरोपों से बरी कर दिया गया था.

बिल्ड ने कहा है कि वो गार्सिया के 403 पन्नों की पूरी रिपोर्ट को मंगलवार से छापना शुरू करेगा.

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अख़बार का दावा

2018 और 2022 के मेजबानी के अधिकार पर फैसला देने के लिए वोटिंग से पहले फ़ीफ़ा के अधिकारियों को रियो में एक पार्टी में शरीक कराने के लिए एक प्राइवेट जेट से ले जाया गया था. ये प्राइवेट जेट क़तर की एक संस्था का था.

फ़ीफ़ा के अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए क़तर की एस्पायर एकेडमी ने कोशिश की थी.

रिपोर्ट हासिल करने वाले पत्रकार पीटर रॉसबर्ग ने कहा है कि रिपोर्ट में इस बात के सबूत नहीं हैं कि 2018 या 2022 के वर्ल्ड कप की मेजबानी ख़रीदी गई थी.

उन्होंने अपनी पड़ताल को एक ऐसी पहेली करार दिया है जिसमें सभी पहलुओं को एक साथ रखने पर एक मतलब निकलता है.

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फ़ीफ़ा की जांच में 2018 या 2022 के इवेंट की मेजबानी हासिल करने की कोशिश कर रही नौ टीमों के तौर तरीकों की पड़ताल की गई थी.

2018 की मेजबानी रूस ने हासिल की और 2022 का फैसला क़तर के पक्ष में गया. इसका फ़ैसला 2010 के इसी समारोह में हुआ था.

बीबीसी के स्पोर्ट्स एडिटर डैन रोआन का कहना है कि गार्सिया के नाटकीय इस्तीफ़े के बाद से ही उनकी गुप्त रिपोर्ट को लेकर रहस्य बना हुआ है.

भले ही लीक हुए दस्तावेज़ 'अकाट्य सबूत' न हों, लेकिन इस बात के संकेत हैं कि असहज सवाल उठेंगे. ख़ासकर 2014 में क़तर को करप्शन से बरी करने फ़ीफ़ा के फ़ैसले पर.

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