शिमला के गांव से भारतीय क्रिकेट टीम तक का सफ़र

सुषमा वर्मा इमेज कॉपीरइट Getty Images

हिमाचल प्रदेश के छोटे से गांव से भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिलाड़ी सुषमा वर्मा के संघर्ष से कामयाबी की कहानी बेहद दिलचस्प है.

वो भारतीय टीम में विकेटकीपर-बैट्समैन के तौर पर खेलती हैं.

शिमला से क़रीब सौ किलोमीटर दूर गढ़ेरी गांव की सुषमा को बचपन से ही खेलों से लगाव था.

बेहद कठिन और दुर्गम इस पहाड़ी इलाक़े में खेल और सुविधाओं का अभाव था. इसके बाबजूद भी सुषमा ने अपने जीवन का लक्ष्य खेल को ही चुना.

लड़कों के साथ खेलने को मजबूर थी हरमनप्रीत!

इनकी बदौलत दुनिया जीतने से एक क़दम दूर

इमेज कॉपीरइट PAnkaj sharma
Image caption सुषमा वर्मा के पिता भोपाल सिंह वर्मा

सरकारी स्कूल से...

सुषमा वर्मा के पिता भोपाल सिंह वर्मा कहते हैं, "माँ-बाप का सपना होता है कि हमारे बच्चे कुछ बन जाएं. जब बच्चों से माँ बाप की पहचान बन जाए तो ये सबसे बड़ा सौभाग्य होता है. बेटी के शौक़ को देख कर मैंने उसके लिए कम खर्चे में परिवार की ज़रूरतों को पूरा करके उसके सपने को सच करने की हर संभव कोशिश की."

शिमला के सुन्नी तहसील के एक सरकारी स्कूल में सुषमा ने वॉलीबॉल को अपना करियर चुना. इस खेल में नेशनल खेलने के बाद सुषमा रुकी नहीं.

सुषमा के हुनर का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुषमा ने वॉलीबॉल के साथ-साथ हैंडबॉल और वाटर पोलो में भी नेशनल खेला.

''...तो रोहित शर्मा कर रहे थे बारिश की दुआ''

महिला क्रिकेट: ऑस्ट्रेलिया पर भारत की शानदार जीत

इमेज कॉपीरइट PAnkaj sharma
Image caption सत देव शर्मा

ऑलराउंडर सुषमा

उनके खेल के बारे में बताते हुए उनके स्कूल कोच सतदेव शर्मा बताते हैं कि स्कूल में जब लड़कों की क्रिकेट मैच की टीम बनी तो सुषमा ने क्रिकेट खेलने की इच्छा जताई और एक महीने की मुश्किल प्रैक्टिस और अपने खेल से सुषमा ने सबको प्रभावित किया.

सतदेव शर्मा कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है जब वो वॉलीबॉल खेलती थीं तो अकेले अपने दम पर उन्होंने कई मैच जिताए. वो ऑलराउंडर थीं. यहाँ पहले कपड़े के बॉल से क्रिकेट खेलते थे. तो मैंने लेदर बॉल से लड़कों को क्रिकेट खेलाना शुरू किया. तो सुषमा बोलीं कि मुझे भी आप के साथ खेलना है और उसने बैटिंग के साथ-साथ विकेट कीपिंग भी शुरू की. वो यहाँ से वॉलीबॉल छोड़ क्रिकेट में आईं जो सुषमा का एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट बना."

आख़िर कौन हैं हरमनप्रीत कौर

'वो सहवाग और विराट की तरह नहीं खेलती'

इमेज कॉपीरइट Satish mehta

दमदार खेल

ये एक ऐसा मौक़ा था जहाँ से सुषमा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

2009 में शिमला में हिमाचल क्रिकेट एसोसिएशन के ट्रायल में सुषमा ने अपने दमदार और उम्दा खेल से टीम हिमाचल में जगह पाई.

इसके बाद 2013 में घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन कर सुषमा वर्मा ने भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाई.

भोपाल सिंह वर्मा कहते हैं, "वर्ल्ड कप के लिए खेलना एक बड़ी बात है. इस ख़ुशी को बयान नहीं कर सकता, मुझे पूरी उम्मीद है कि हम वर्ल्ड कप जीतेंगे."

इंग्लैंड महिला क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में

महिला क्रिकेट विश्वकप: भारत सेमीफ़ाइनल में

इमेज कॉपीरइट Satish mehta
Image caption सुषमा वर्मा अपने परिवार के साथ

गांव के लिए गर्व की बात

महिला क्रिकेट को लेकर आज देश की जनता की सोच में अचानक से एक बदलाव नज़र आ रहा है.

हाल के दिनों में क्रिकेट प्रशंसक महिला क्रिकेट में काफ़ी दिलचस्पी दिखा रहे हैं.

सुषमा के गाँव के निवासी सुरेंद्र वर्मा बताते हैं कि ये उनके लिए एक गर्व का क्षण है कि एक छोटे-से गाँव की लड़की आज इतने बड़े मुक़ाम पर पहुँची है.

वो बताते है, "जब सुषमा छोटी थी तो वो हमारे साथ आकर खेलती थी. आज वो देश के लिए खेल रही है. ये हमारे गांव के लिए बहुत बड़ी बात है."

मिताली राज जिन्होंने भरतनाट्यम छोड़ बल्ला थामा

मिताली राज ने तोड़ा वनडे में सर्वाधिक रन का रिकॉर्ड

इमेज कॉपीरइट Sushma verma family

2005 के बाद ये दूसरा मौका है. जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पहुँची है.

इमेज कॉपीरइट Sushma verma family
Image caption सुषमा वर्मा अपने परिवार के साथ के लोगों के साथ

इन महिला खिलाड़ियों ने ये साबित किया है कि वो किसी से कम नहीं हैं और अपनी मेहनत और काबिलियत की बदौलत वो पूरी दुनिया में एक अलग पहचान बनाने का माद्दा रखती हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)