'शूटिंग मेरे वजूद का हिस्सा'

अभिनव बिंद्रा

बीजिंग ओलंपिक खेलों में 11 अगस्त 2008 को 10 मीटर एअर राइफ़ल में जीता था गोल्ड मैडल

अभिनव बिंद्रा ने पिछले साल 11 अगस्त को बीजिंग ओलंपिक्स में अपने निशाने से सारे भारत का सर गर्व से ऊंचा कर दिया था. बिंद्रा ने दस मीटर एयर राइफ़ल प्रतियोगिता में देश का सबसे पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता था. उस ऐतिहासिक जीत के एक साल बाद बीबीसी संवाददाता साई सुधा सुगवनम और ऋचा शर्मा एक विशेष बातचीत के लिए चंडीगढ़ के पास उनके घर पहुंचीं.

आपको ओलंपिक गोल्ड मेडल जीते एक साल हो गया. इस एक वर्ष में आपकी ज़िंदगी किस तरह बदली है.

एक तरह से तो ज़िंदगी बिल्कुल नहीं बदली लेकिन एक तरह से बदल भी गई है. मेरा मतलब मेरे लिए सबसे ज़रुरी चीज़ ये है कि मैं अब भी वही व्यक्ति हूं, मेरे जीवन मूल्य नहीं बदले हैं. इस लिहाज से कोई परिवर्तन नहीं आया है. बदला यह है कि पिछले साल मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना पूरा किया, पंद्रह साल से यही मेरा लक्ष्य था. लेकिन ये लक्ष्य पाने के बाद मुझ में एक खालीपन आ गया था और मुझे अपने लक्ष्यों का पुनर्निधारण करना पड़ा.

आपने कहा कि आपमें एक खालीपन आ गया था, क्या ये मुश्किल वक़्त था? हमें उम्मीद है कि आप ऐसे ही निशाना लगाते रहेंगे?

हां, बिल्कुल. आप हमेशा जीवन में एक लक्ष्य रखना चाहते हैं. लेकिन परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन करने में समय लगता है. मैं भविष्य में जो भी करुं, उसके लिए पूरा जोश होना चाहिए. मुझे उस राह पर यक़ीन रखना पड़ेगा जिसपर मैं चलना चाहता हूं.

आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि आप कुछ समय के लिए शूटिंग के अलावा कुछ करेंगे ताकि आप अपने पसंदीदा खेल में पूरे जोश के साथ लौट पाएँ. क्या आपने ऐसा ही किया है?

नहीं, मैं अब भी निशानेबाज़ी के प्रति जोश से भरा हुआ हूं. ओलंपिक्स के बाद मैंने कही महीने अभ्यास में गुजारे हैं. अब मैं फ़िट हूं. मैं शूटिंग का अभ्यास करता हूं क्योंकि वो मेरे वजूद, मेरे ख़ून का हिस्सा है. मैं ये ख़ुश रहने के लिए भी करता हूं. लेकिन आवश्यक ये है कि आप अपने लक्ष्य तय करें, यही एक चुनौती है.

मैं अब भी निशानेबाज़ी के प्रति जोश से भरा हुआ हूं. ओलंपिक्स के बाद मैंने कही महीने अभ्यास में गुजारे हैं. अब मैं फ़िट हूं. मैं शूटिंग का अभ्यास करता हूं क्योंकि वो मेरे वजूद, मेरे ख़ून का हिस्सा है. मैं ये ख़ुश रहने के लिए भी करता हूं. लेकिन आवश्यक ये है कि आप अपने लक्ष्य तय करें, यही एक चुनौती है.

अभिनव बिंद्रा

आप ओलंपिक के बाद एक साल का ब्रेक लेना चाहते थे?

हां, मैं बीजिंग के बाद एक साल का ब्रेक लेना चाहता था लेकिन ओलंपिक्स के दो महीने बाद ही में दोबारा अभ्यास में जुट गया. मैंने इसकी घोषणा नहीं की थी लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि शूटिंग से ज़्यादा देर दूर रहना मेरे लिए संभव नहीं. और मैं इस साल के आख़िर तक प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी लेने लगूंगा.

उस मैडल के बाद से लगातार आप पर मीडिया निगाह जमाए हुए है. कैसे सामना करने हैं आप इस का?

मैं शर्मीला व्यक्ति नहीं हूं, शायद शुरु-शुरु में था, लेकिन अगर आप मुझे कुछ अरसे से जानते तो मैं इतना शर्मीला भी नहीं हूं. ओलंपिक्स के बाद ये एक चुनौती थी लेकिन मैंने ये सब कभी चाहा नहीं. मेरी चाह तो बस स्वर्ण पदक जीतने भर की थी. इस जीत के साथ को प्रसिद्धि आई वो मेरे बिल्कुल ग़ैर-ज़रुरी है. मुझे उसकी कतई परवाह नहीं.

मेरी चाह तो बस स्वर्ण पदक जीतने भर की थी. इस जीत के साथ को प्रसिद्धि आई वो मेरे बिल्कुल ग़ैर-ज़रुरी है. मुझे उसकी कतई परवाह नहीं.

अभिनव बिंद्रा

लंदन ओलंपिक्स के बारे क्या ख़याल है?

हां, लंदन ओलंपिक्स एक संभावना तो है. उम्मीद है कि मुझे अभ्यास के लिए सही वातावरण मिल पायेगा. क्योंकि मैं बिना मज़बूत तैयारी के हिस्सा नहीं लूंगा. अगर उपयुक्त वातावरण नहीं मिलता है तो मुझे पुनर्विचार करना पड़ सकता है.

अभिनव आप जीवन में कुछ भी कर सकते थे जैसे अपने पिता के साथ बिज़नेस में शामिल हो सकते थे, लेकिन आपने ये पंद्रह साल में गोल्ड मेडल जीतने का लक्ष्य रखा. क्यों?

मुझे ख़ुशी है कि आपने ये पूछा. सभी को लगता है कि मेरे लिए ये सब आसान था. एक लिहाज से मैं ख़ुशकिस्मत हूं कि मेरे पास बहुत सारी सुविधाएं हैं. लेकिन मैंने आसान ज़िंदगी को नहीं चुना. मैंने एक मुश्किल खेल को चुना जिसमें मैं बेहतरीन होना चाहता था. बहुत सारे लोग खेलों से रोज़ी-रोटी के लिए जुड़ते हैं, इसमें कोई ख़राबी नहीं. दरअसल ये एक बहुत अच्छी बात है. लेकिन मैंने आसान ज़िंदगी को छोड़ कर अपने पंद्रह साल इस खेल के लिए क़ुर्बान कर दिए. मैं इन सालों में बहुत कुछ कर सकता था. लेकिन मुझे कोई पछतावा नहीं है.

आपके माता-पिता ने काफ़ी अहम रोल अदा किया होगा आपके करियर को संवारने में में?

उन्होंने अपने सपनों के उपर मेरे सपनों की तरजीह दी है. उन्होंने मेरे ख़्वाब को अपना बना लिया. ये एक बड़ी क़ुर्बानी है. उनका किरदार मेरी इस पूरी यात्रा में सबसे निर्णायक था.

दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल हो रहे हैं. इसकी तैयारियों पर कई सवाल उठ रहे हैं. आपकी क्या राय है?

मैं मानता हूं कि भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के होने से हमें अपने देश को दुनिया के सामने रखने का एक बढ़िया मौक़ा मिलेगा, साथ ही हम अपनी संस्कृति को भी दुनिया भर को दिखा पाएँगे. और दिल्ली को भी हम एक विश्व-स्तरीय शहर के तौर पर पेश कर पाएँगे. लेकिन मुझे लगता है कि हमारा पहला लक्ष्य होना चाहिए भारत को एक उभरती महाशक्ति के रुप में प्रस्तुत करना.

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