बारूद के ढेर पर भारतीय क्रिकेट

दिल्ली रणजी टीम की चयन प्रक्रिया पर वीरेंदर सहवाग ने जो बाग़ी रवैया अपनाया उसके अपेक्षित नतीजे भले न निकले हों लेकिन एक संदेश तो गया ही है.

खेलप्रेमियों को इस बात का अंदाज़ा तो हो ही गया होगा कि चयन प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ हैं और ये दिल्ली तक ही सीमित नहीं है.

दिल्ली सबसे ख़राब उदाहरण हो सकता है. यहाँ जिनके पास सत्ता की चाबी है वे इस तरह व्यवहार कर रहे हैं जैसे उन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं है और वो भ्रष्टाचार के भँवर को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन सफल नहीं हो पा रहे हैं.

किसी भी फ़ैसले में व्यक्तिगत झुकाव की गुंजाइश रहती ही है, ख़ास कर जब जूनियर स्तर पर टैलेंट पहचानने की बात आती हो.

और इस को आधार मानते हुए टीम में उन लोगों को धकेला जाता है जिनके ‘सही संपर्क’ होते हैं.

और ऐसा सभी राज्यों में होता है इस बात को युवराज सिंह के बयान से बल मिला है. उनके बयान की बोर्ड ने आलोचना तो की लेकिन उसमें तल्खी नहीं थी.

लेकिन इस सच्चाई को कोई छिपा नहीं सकता कि भारतीय क्रिकेट बारुद के ढेर पर बैठा है और किसी दिन इसमें विस्फोट हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर भी चयनकर्ताओं के बेपर्दा होने का ख़तरा है.

ज़रा पीछे मुड़े

ज़रा पीछे चलिए जब मैच फिक्सिंग की कहानियों को ऐसे लोगों की साजिश कहा जाता था जो भारतीय क्रिकेट की विश्वसनीयता ख़त्म करने पर अमादा हैं. इन चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया गया और हमें इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े

Image caption सहवाग ने दिल्ली टीम के चयन में धांधली का आरोप लगाया था.

आज हम ऊपरी स्तर पर भी घूसखोरी और भ्रष्टाचार की कहानियाँ सुनते हैं, कुछ ऐसा ही जैसा हम मैच फिक्सिंग स्कैंडल के उजागर होने से पहले सुना करते थे.

स्पष्ट तौर पर इसके सही होने के पुख़्ता प्रमाण नहीं हैं. भारी मीडिया की मौजूदगी और राष्ट्रीय टीम में चयन के लिए प्रदर्शन के मापदंड को अनदेखा करना आसान नहीं है

इसके बावजूद हमेशा ये महसूस होता है कि कुछ गड़बड़ है, ख़ास कर जब बढ़िया प्रदर्शन करने वालों की भीड़ लगी हो और उसमें से टीम चुननी हो. जहां अमुक खिलाड़ी सामने वाले कहीं कमतर न दिखे लेकिन जगह किसी एक हो ही मिलनी हो.

जब बोर्ड के सदस्य चयनकर्ता हों, खिलाड़ियों के एजेंट बोर्ड के साथ ही व्यवसाय करे, अपने उत्पादों का ब्रांड एंबेसडर खिलाड़ियों को बनाने वाले ही क्रिकेट के प्रशासक बन जाएँ, क्रिकेट अधिकारी ही आईपीएल टीम के मालिक बन जाएँ और चयनकर्ता उनके ब्रांड एंबेसडर, तो क्या होगा?

पैसा तो है पर..

जब मैं कॉलेज में था तब की कहानी याद आ गई. एक प्रतिभाशाली लेग स्पिनर दोस्त को रणजी टीम में चुने जाने के लिए एसोसिएशन के सचिव को बतौर घूस सूट पीस देना पड़ा. ये वो दौर था जब खिलाड़ियों की जेब खाली होती थी.

आज एक रणजी खिलाड़ी हर साल 15 से 20 लाख रूपए कमाता है और टेस्ट क्रिकेटर एक करोड़ से ज़्यादा.

हर साल हर एसोसिएशन को भारतीय बोर्ड के मुनाफ़े से 25 से 30 करोड़ रूपए मिलता है.

पैसों की बरसात का स्वागत है लेकिन जब तक ठोस नियामक प्रक्रिया नहीं बनती और बोर्ड को इसके खर्च के लिए जवाबदेह नहीं बनाया जाता तब तक संदेह का घेरा बना रहेगा.

लबालब भरे बैंक एकाउंट और टीम की मज़बूती की बदौलत भारतीय क्रिकेट दुनिया पर राज कर रहा है. ऐसे में कोई भी स्कैंडल देश को शर्मसार कर सकता है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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