सहवाग की शानदार वापसी का राज़

विरेंद्र सहवाग
Image caption सहवाग तीन सौ का अंक पार करने से चूके

सहवाग के बारे में जो चीज़ मुझे काफ़ी आश्चर्यजनक लगी वह उनके व्यक्तित्व के दो पहलू हैं जो एक दूसरे से मेल नहीं खाते.

जब सहवाग अपने कंधे की चोट से ठीक हो रहे थे तो मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी.उनका कहना था कि हम में से हर कोई अपनी किस्मत लेकर आया है चाहे हम कुछ भी करें, कोई और है जो हमारे भाग्य और भविष्य को तय करता है.

दूसरे, उनका इस बात में ज़बर्दस्त विश्वास है कि जब वह एक बार फिर से क्रिकेट के मैदान में उतरेंगे तो वह उससे बेहतर प्रदर्शन करेंगे जो उन्होंने अभी तक किया है. यानी उनके बल्ले का और भी जौहर देखने में आएगा.

भाग्य में पूरे विश्वास ने उन्हें ऐसे समय में शांति प्रदान की है जब वह मैदान से बाहर थे और इस पर उनका कोई ज़ोर नहीं था. किसी खिलाड़ी के लिए शांत स्वभाव बरक़रार रखना असामान्य बात है वह भी ऐसे समय में जब उन्हें बुलावा नहीं आ रहा हो.

कहा जाता है कि वह अपने वर्तमान साथियों में फूट पैदा करने वालों में से हैं और इसके साथ ही वह भारतीय क्रिकेट टीम के उपकप्तान रहना नहीं चाहते हैं और ये कि किसी युवा खिलाड़ी को भरात का नेतृत्व करने के लिए तैयार करने के पक्ष में हैं.

उनसे मुलाक़ात के दौरान मुझे नहीं लगा कि वह ऐसे स्वभाव के आदमी हैं जो अपनी प्रवृति और स्वभाव को योजना और बुद्धि पर महत्ता दें. इसके विपरीत मुझे ऐसा महसूस हुआ कि उन्होंने न केवल अपनी बल्लेबाज़ी पर काफ़ी चिंतन किया है बल्कि वह क्या करते हैं और क्या बोलते हैं इस बात पर भी उन्होंने काफ़ी सोच विचार किया है.

उनके इस घोर चिंतन का सबूत हमें उनके एक इंटरव्यू में नज़र आता है जो उन्होंने एक क्रिकेट वेबसाइट को दिया जिससे पता चलता है कि वह बल्लेबाज़ी की कला और अपनी क्षमता से बख़ूबी वाक़िफ़ हैं.

क्रिकेट से ज़बर्दस्ती के निर्वास ने उन्हें बोर कर दिया लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल अपनी फ़िटनेस को बढ़ाने में लगाया ताकि उनपर निष्फलता हावी न हो सके.

खेल के दम पर टीम में

Image caption सहवाग ने छह दोहरे शतक लगाए हैं

वह हक़ीक़त में एक ऐसे दौर से गुज़र रहे थे जिसपर उनका कोई क़ाबू नहीं था इसी लिए उसपर हंगामा मचाने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

जिस राज्य से वह क्रिकेट खेलते हैं वहां फैले भाई-भतीजावाद के ख़िलाफ़ अगर उन्होंने आवाज़ उठाई और भारत की उपकप्तानी छोड़ी क्योंकि जैसा वह चाहते थे वैसे नहीं हो पा रहा था तो इन सब पर उनका मानना है कि वह ठीक थे.

वह ग़ुस्सा भी नहीं हुए बल्कि अपने आस-पास की दुनिया में मश्ग़ूल रहे जिसने उन्हें इतना कुछ दिया था.

ऐसा लगा कि वह दिल्ली के अपने ऐसे साथी खिलाड़ियों के लिए हमेशा बोलने को तैयार रहते जो जो चुपचाप झेल रहे थे और जिन्हें अपने लिए एक बुलंद आवाज़ की ज़रूरत थी.

भारत में आम तौर पर खिलाड़ी संस्था को चुनौती नहीं देते. ऐसे में क्या वह इसके नतीजे से परेशान नहीं हुए. उनका जवाब 'नहीं' था क्योंकि वह भारतीय टीम में सिर्फ़ अपनी सलाहियत की बदौलत थे.

उन्होंने कहा, "मैं भारत के लिए इसलिए खेल रहा हूं क्योंकि मैं रन बना रहा हूं. जिस दिन मैं विफल हो जाउंगा, मुझे टीम से निकाल दिया जाएगा, तो फिर किस बात की परेशानी."

उनकी अगली बात अत्याधिक महत्वपूर्ण थी. "मैं किसी भी चुनौती का सामना करने की सलाहियत रखता हूं."

जिसका मतलब ये था कि वह ये जानते थे कि एक बार जब वह मैदान में वापस आएंगे तो वह इतने रन बनाएंगे कि कोई भी उनके करियर से खेलने की हिम्मत न कर सके.

उन्होंने वापसी की, और किस शानदार अंदाज़ में वापसी की! चुनौतियों को क़बूल करते हुए उन्होंने ऐलान किया कि 'मैं बेहतरीन हूँ'.

जब वह क्रिकेट की अपनी एक और शानदार पारी के दौरान गेंद की धुनाई कर रहे थे, उसे बस छू कर बाउंड्री के बाहर पहुंचा रहे थे तो उसके लिए सिर्फ़ हुनर और महारत की ही ज़रूरत नहीं थी बल्कि ज़बर्दस्त ताक़त और स्टेमिना की ज़रूरत थी. इस पर मुझे उनकी एक और बात याद आ गई.

इतने कम समय में इतनी तेज़ी से इतने ज़्यादा रन बनाने के पीछे क्या राज़ है? जैसे एक सवाल के जवाब में उन्होंने ज़रा रुक कर मुस्कुराते हुए कहा था, "मुझे नहीं मालूम, शायद यह उस शुद्ध दूध का नतीजा है जिसे मैं अपने शुरू के ज़माने में पीता था जब मैं क्रिकेट खिलाड़ी बन रहा था."

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