बेदम टेस्ट की 'दमदार' पारियाँ

सचिन तेंदुलकर

नागपुर टेस्ट में मिली शर्मनाक हार पर चिंतन मनन छोड़कर कोलकाता टेस्ट की फ़िक्र करनी चाहिए.

टीम से जुड़े हर किसी की आलोचना समझ में आती है, इसलिए अभी तक इस पर जो लिखा-बोला गया है, उसमें मैं कुछ और नहीं जोड़ना चाहता.

मैं तो दक्षिण अफ़्रीका के आक्रमण में ध्वस्त हुई भारतीय टीम के मलबे से एक-दो शानदार बल्लेबाज़ी को निकाल कर आपके सामने पेश करना चाहता हूँ.

इस बारे में किसी को संदेह नहीं कि डेल स्टेन की स्विंग गेंदबाज़ी ज़बरदस्त थी. ज़्यादातर भारतीय बल्लेबाज़ उनके सामने बच्चे नज़र आए और गेंद किधर घूमेगी, ये उन्हें पता ही नहीं लग पाया.

मॉर्केल भी डेल स्टेन से बहुत पीछे नहीं थे. तो पॉल हैरिस ने भी विकेट का अच्छा इस्तेमाल किया और बल्लेबाज़ों को मजबूर किया कि वे स्वीप करने के लालच में आए.

ये ऐसी रणनीति थी, जिसने भारत को काफ़ी पीड़ा पहुँचाई. कभी-कभी ही इस तरह की नकारात्मक गेंदबाज़ी किसी टीम के लिए इतना सकारात्मक साबित होती है. जैसा कि हैरिस की बाएँ हाथ की स्पिन गेंदबाज़ी ने नागपुर टेस्ट के चौथे दिन किया.

उनका सबसे अहम विकेट था सचिन तेंदुलकर का. उस समय तक सचिन ने अपनी पारी को सँवार लिया था.

यह सचिन की सबसे यादगार और सार्थक पारियों में से एक साबित हो सकती थी, जिसमें अच्छी रणनीति बनाई गई थी और दक्षिण अफ़्रीका के आक्रमण से पार पाने की कोशिश थी.

पीड़ा

अब सचिन की ये पारी सिर्फ़ उनके 46वें टेस्ट शतक के रूप में जानी जाएगी. और मैं सोचता हूँ कि ये उन्हें सबसे ज़्यादा पीड़ा पहुँचाएगी.

Image caption स्टेन के सामने बच्चे साबित हुए भारतीय बल्लेबाज़

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? जिस परिस्थिति में सचिन क्रीज़ पर पहुँचे थे, उसे याद कीजिए. पहली पारी में भी वे उस समय तक पिच पर अच्छे दिख रहे थे, जब तक डेल स्टेन की सनसनाती आउटस्विंगर ने उनका धैर्य तोड़ दिया.

एक ओवर पहले सचिन डेल स्टेन की ऐसी ही गेंद को सफलतापूर्वक खेल चुके थे. लेकिन इस बार स्टेन की गेंद उनके लिए ख़तरनाक साबित हुई.

दूसरी पारी में सचिन का जवाब क्या था? इस बार वे जाल में नहीं फँसे. उन्होंने अपने शॉट्स में से ड्राइव को पूरी तरह हटा दिया.

वर्ष 2004 के सिडनी टेस्ट में भी उन्होंने ऐसा ही किया था. इस टेस्ट में उन्होंने अपने सबसे ज़्यादा रन बटोरने वाले शॉट्स में से एक को बिल्कुल ही नहीं खेला क्योंकि इस शॉट के कारण कई बार उन्हें पवेलियन का रास्ता देखना पड़ा था.

सिडनी की सचिन की पारी की ख़ास बात ये थी कि इस शॉट को बिल्कुल न खेलने के बावजूद भी उन्होंने दोहरा शतक लगाया था.

प्रखर पारी

ऐसा लगता था कि नागपुर में भी वे ऐसा ही करने का मन बना चुके हैं. सचिन अपने शॉट चयन से यह साबित कर रहे थे कि पाँच साल बाद भी न ही उन्होंने अपनी मानसिक शक्ति गँवाई है और न ही अपनी प्रखरता.

Image caption सहवाग की शतकीय पारी भी यादगार रही

ये कितनी अजीब बात है कि अपनी योजना का सबसे कठिन हिस्से पर विजय हासिल करने के बाद वे एक स्वीप शॉट के असहाय शिकार बन गए. जबकि ज़्यादातर मौक़े पर वे ऐसी गेंद पर आउट नहीं होते.

अब लाते हैं वीरेंदर सहवाग को. सहवाग की पहली पारी को. सचिन से अलग सहवाग ने अपने ऊपर कोई लगाम नहीं लगाया, लेकिन शॉट्स को खेलने में थोड़ी सावधानी बरती.

गेंद के लगातार इधर-उधर घूमते रहने के बावजूद अन्य बल्लेबाज़ों से अलग सहवाग ने भरोसे वाली शतकीय पारी खेली.

अगर आप घातक गेंदबाज़ी और मैच की परिस्थिति के हिसाब से सहवाग की पारी को आँकें तो उनकी ये पारी अब तक की बेहतरीन पारियों में से एक है.

दक्षिण अफ़्रीका की बल्लेबाज़ी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की परख के लिए एक कठिन चुनौती है. कितनी दुर्भाग्य की बात है कि राहुल द्रविड़ इस सिरीज़ में नहीं खेल पा रहे हैं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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