केवल विदेशी कोच काफ़ी नहीं

भारत में हॉकी की दुनिया ग्लैमर, चकाचौंध और करोड़ो रुपयों की बौछार से कोसों दूर है- जैसा कि कुछ अन्य खेलों में होता है.

ये ऐसी दुनिया है जहाँ खिलाड़ियों को अपने देश के प्रतिनिधित्व के लिए लाखों रुपए नहीं दिए जाते, न उनके पास अच्छी नौकरी होती है और न ही उनकी तनख्वाहें इतनी होती हैं कि उनका भविष्य सुरक्षित समझा जा सके.

हॉकी जगत में ऐसे लोगों की भरमार है जो बैंकों में क्लर्क हैं, विश्वविद्यालयों में छात्र हैं, अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर हॉकी खेलते हैं या फिर अपनी पढ़ाई और नौकरी को कुछ समय के लिए छोड़कर अपने देश के लिए खेलते हैं.

ये अजीब विसंगति है कि जो देश हॉकी विश्व कप में खेले उनमें से भारतीय खिलाड़ी शायद सबसे ‘बेहतर’ स्थिति में हैं.

भारतीय खिलाड़ियों को 'बेहतर' सुविधाएँ

भारतीय खिलाड़ियों से उलट अन्य देशों में हॉकी खिलाड़ियों को सरकार नौकरी नहीं देती. तुलना में भारतीय टीम को ‘बेहतर’ सुविधाएँ मिलती हैं और अगर अच्छा प्रदर्शन रहता है तो खिलाड़ियों को पैसे भी मिलते हैं- जैसे पाकिस्तान को हराने के बाद टीम को ईनाम दिया गया.

दक्षिण अफ़्रीका की टीम के ख़िलाफ़ मैच में भारत को कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा था.

लेकिन प्रतियोगिता शुरु होने से पहले दक्षिण अफ़्रीकी टीम के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वो हॉकी विश्व कप में हिस्सा ले सके. आख़िरकर एक लॉटरी से मिले पैसों की मदद से टीम को विश्व कप में भेजा गया.

पूर्व में भी कई ऐसे किस्से सामने आए हैं जब विभिन्न देशों की सरकारों ने हॉकी टीम को पैसा देने से मना कर दिया था और टीम को ख़ुद पैसे जुटाने पड़े.

इसके बावजूद भारत पिछले तीन दशकों से हॉकी में अन्य देशों से पिछड़ गया है. भारतीय टीम के ताज़ा प्रदर्शन को देखते हुए नहीं लगता कि वो अपने गौरवशाली मुकाम को दोबारा हासिल कर पाएगी.

भारतीय हॉकी टीम और शीर्ष की चार टीमों के बीच बहुत फा़सला है-फिर चाहे वो हुनर की बात हो, गति, प्रशिक्षण, रणनीति या शारीरिक क्षमता हो.

या करोड़ों की बरसात या कुछ भी नहीं

ऑस्ट्रेलिया या अन्य टीमों को मैदान पर खेलते देखना मंत्रमुग्ध कर देने वाला अनुभव है.

हमें लंबे अरसे से ये बातें बताई गईं हैं कि भारत की टीम ज़्यादा हुनरमंद है लेकिन कृत्रिम सर्फ़ेस पर यूरोपीय खिलाड़ियों की ताकत भारतीय खिलाड़ियों के हुनर पर भारी पड़ती है. पहले ये बातें शायद सच थीं लेकिन अब ऐसा नहीं है.

यूरोपीय या दक्षिण कोरियाई खिलाड़ियों को खेलते हुए देखना अपने आप में एक अलग अनुभव है.

इससे उलट, भारतीय खिलाड़ियों में न सिर्फ़ हुनर की कमी है बल्कि वे बार-बार फ़ाउल भी करते हैं और बेवजह अन्य खिलाड़ियों से भिड़ते हैं.

भारतीय हॉकी में समस्याओं की जड़ बहुत गहरी है और इसे केवल अच्छे विदेशी कोच लाकर दूर नहीं किया जा सकता.

अगर भारतीय हॉकी टीम के कोच ब्रासा को (जैसा कि रिपोर्टों में कहा गया है) वरिष्ठ खिलाड़ियों की खेल शैली ठीक करनी पड़ रही हो तो ज़ाहिर है कि कहीं न कहीं हमारे प्रशिक्षण में कुछ ग़लत हो रहा है.

ज़रूरत इस बात की है कि जूनियर स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाए.

ब्रासा जैसे लोगों को ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का ज़िम्मा सौंपा जाना चाहिए न कि उन्हें केवल राष्ट्रीय टीम के लिए रख लें और उम्मीद करें कि वो अचानक विश्व विजेता टीम तैयार कर देंगे.

अगर व्यापक पैमाने पर देखें तो हॉकी में समस्याओं की जड़ ये भी है कि आर्थिक स्तर पर भेदभाव है.

विकसित देशों में खिलाड़ियों का हौसला बना रहता है क्योंकि उनके मन में दूसरी अनिश्चितताएं नहीं होती.

लेकिन भारत में हॉकी खेलने का ख़्वाब देखने वाले ज़्यादातर युवा लोगों को गाँवों और कस्बों में खेलने के लिए मूल सुविधाएँ भी नहीं मिलतीं और उन्हें हमेशा चिंता लगी रहती है कि वे अपना भविष्य कैसे संवार सकते हैं.

भारत में ऐसे आसार नज़र नहीं आते कि बीच का कुछ रास्ता निकल पाए. या तो यहाँ क्रिकेट है जहाँ लाखों-करोड़ों रुपए मिलते हैं या फिर कुछ भी नहीं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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