भारतीय टीम का असमंजस

भारतीय टीम

भारतीय क्रिकेट टीम के लिए यह मौक़ा सिर्फ़ बाल बराबर इधर या उधर होने जैसा था जब टीम ने जयपुर में पहले एक दिवसीय मैंच में सिर्फ़ एक ही रन से जीत हासिल की. इस बात पर भी ग़ौर किया जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों में से अगर सभी नहीं तो ज़्यादातर ये सोचकर मैच वाले दिन अपनी दाढ़ी नहीं बनाते हैं कि कहीं उन्हें धूप ना जला दे और ऐसा लगता है कि जयपुर मैच में यही बात उन्हें ज़्यादा परेशान कर रही थी.

बहरहाल, जीत तो ठीक है लेकिन ये एक ऐसा समय है कि भारतीय टीम को इतना कठोर होना सीखना होगा कि अगर किसी लम्हे में वो अपनी ठोस फ़ॉर्म में नहीं हो तो विरोधी टीम इसका फ़ायदा ना उठा सके. भारतीय क्रिकेट में ये पुरानी परंपरा रही है कि टीम जब अच्छा खेलती है तो उसमें कुछ ढीलापन भी आने लगता है और जब अचानक विरोधी टीम की तरफ़ से मज़बूत खेल दिखाया जाता है तो अचानक भारतीय टीम को होश आता है कि स्थिति हाथ से बाहर जाने लगी है और तब आनन-फ़ानन में टीम और खेल रणनीति में फेरबदल किए जाते हैं.

कोई भी चैम्पियन टीम जब अपना दरवाज़ा बंद कर लेती है तो अपनी विरोधी टीम को अंदर झाँकने का मौक़ा नहीं देती यानी अपनी कमियों को विरोधी टीम तक नहीं पहुँचने देती है और ऐसे ही कुछ नुस्ख़ों से चैम्पियन टीमों को शीर्ष पर पहुँचने और क़ायम रहने में मदद मिलती है.

प्रवीण कुमार की कहानी

ऐसा किसी भी खिलाड़ी के साथ हो सकता है कि कोई दिन उसके लिए बहुत बुरा रहे और किसी भी खेल में यह बिल्कुल सामान्य बात है लेकिन अगर कोई खिलाड़ी एक तरह की ग़लती बार-बार करता है तो चिंता ज़रूर होती है और होनी भी चाहिए क्योंकि इससे पता चलता है कि उस खिलाड़ी का दिमाग़ जमने लगा है और किसी भी कड़ी प्रतियोगिता में ऐसा होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है. ऐसा होना किसी भी टीम के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता.

भारत के गेंदबाज़ ख़ासतौर से अंतिम ओवरों में जैसे कुंद पड़ने लगे थे, सिर्फ़ प्रवीण कुमार ही कुछ करिश्मा दिखा सके. प्रवीण कुमार ऐसे गेंदबाज़ हैं जो सितारों से भरी हुई टीम में अपनी ख़ास पहचान नहीं पा सके हैं लेकिन वो मुस्तैदी से अपना खेल दिखाते हैं और ज़्यादातर मैचों में वो अपना सिक्का जमा जाते हैं.

प्रवीण कुमार ऐसे क्रिकेट खिलाड़ी हैं जो सड़क से उठकर आए होते हैं और उन्होंने अपनी जगह कठिम परिश्रम के बल पर बनाई है. हो सकता है कि देश में होने वाले क्रिकेट में उनका कुछ अलग रूप नज़र आता हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें अपनी जगह और कमियाँ अच्छी तरह पता हैं और ऐसी परिस्थितियों में वो अपने पूरे हुनर और दम-ख़म के साथ खेल दिखाते हैं, इसमें कोई शक नहीं है.

प्रवीण कुमार के खेल में कोई नाटक नज़र नहीं आता है और भारतीय क्रिकेट टीम के बाक़ी खिलाड़ी भी उनकी ही तरह सिर्फ़ वो काम करें तो ज़्यादा अच्छा हो जिनके लिए उन्हें टीम में शामिल किया जाता है यानी मन लगाकर सिर्फ़ क्रिकेट खेलें और दर्शक और मीडिया दीर्घा की चिंता ना करें और सिर्फ़ अपने खेल पर ध्यान दें.

हो सकता है कि दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी इस हार से सदमे में हों कि उन्होंने कई ऐसी अपीलें की थीं कि अगर उन्हें स्वीकार कर लिया जाता तो मैच का नतीजा ही कुछ और होता. और इस अनुभव से ये ज़रूरत और पक्की होती नज़र आती है कि टेस्ट मैचों में किसी अंपायर किसी तीसरे देश का होना चाहिए.

सीमित ओवरों के मैचों में घरेलू अंपायर का होना तो समझ में आता है क्योंकि इससे एक तरह से वो रास्ता निकाला जाता है कि दबाव की स्थिति में वो किस तरह से अपना रास्ता निकालता है मगर क्रिकेट की दुनिया में उच्च कोटि का खेल अब भी टेस्ट मैच ही है. इसलिए टेस्ट मैचों में तीसरे देश का अंपायर होना बेहद ज़रूरी है.

दक्षिण अफ्रीका की टीम के बारे में कहा जाने लगा था कि जैसे-जैसे खेल समाप्ति की ओर बढ़ता है तो वो हौंसला गँवाने लगते हैं और उन्होंने इस मैच में भी इस स्थिति से बचने के लिए ख़ूब प्रयास किए मगर मैच की अंतिम गेंद पर दक्षिण अफ्रीका की हार से यह राय आख़िर साबित ही हो गई.

दूसरी तरफ़ भारतीय खिलाड़ी अंतिम गेंद पर जीते तो सही मगर उन्हें ये भी बख़ूबी मालूम है कि वो हार से सिर्फ़ बाल-बाल बचे हैं.

(प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट ग्रुप के सौजन्य से)

संबंधित समाचार