एक मौका अफ़गानिस्तान के लिए

सुनील गावस्कर

गावस्कर के मुताबिक इस बार के आईपीएल मैचों में रणनीतियां ज्यादा कारगर नहीं रहीं

क्या ही रोमांचक फ़ाइनल था आईपीएल का! काफी नजदीकी मामला था और एक ऐसे ही मैच की ज़रूरत थी इंडियन प्रीमियर लीग के एक और महान संस्करण के समापन के लिए.

इस बात से अधिक निराशाजनक और कुछ नहीं हो सकता है कि फाइनल मैच एकतरफा हो जाय या विजेता टीम के बारे में लीग के आखिरी कुछ मैचों के पहले ही ठीक-ठीक अनुमान लगा लिया जाए.

जो बात ग़ौर करने वाली थी, वो ये कि नतीजा हासिल करने में किन खास रणनीतियों को अपनाया गया.

ईमानदारी से बात करूं तो मुझे नहीं लगता कि ताबड़तोड़ अंदाज़ के इस खेल के फार्मेट में रणनीतियों की एक बड़ी भूमिका थी.

निश्चित तौर पर नई गेंद के साथ सीधे-सीधे धीमी गति वाले गेंदबाजों का इस्तेमाल एक रणनीति है लेकिन इसके पहले 50 ओवरों वाले मैचों में इसका इस्तेमाल होता रहा है.

फील्ड प्लेसिंग का विचार सबसे ज़्यादा रोचक था क्योंकि इसने दिखाया कि कप्तान न केवल गेंदबाज़ों को रोटेट करवा रहे हैं, उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर रहे हैं बल्कि वो अलग-अलग बल्लेबाजों के लिए होमवर्क भी करके आए थे उसी के अनुसार गेंदबाजों का इस्तेमाल करते रहे.

ऐसा शायद ही कभी हुआ कि बल्लेबाजी करते वक्त एडम गिलक्रिस्ट के सामने तेज गेंदबाज रखा गया हो. तकरीबन हर कप्तान ने यह तय किया कि जब यह आस्ट्रेलियाई बैटिंग कर रहा हो तो उनके सामने कोई स्पिन गेंदबाज ही गेंद डाल रहा हो.

जो बात आश्चर्यजनक थी, वह यह कि खतरनाक पिचों पर भी गिलक्रिस्ट अपनी बल्लेबाजी के क्रम को नीचे नहीं लाए. भले ही इस बात की संभावना रही हो कि पारी के उस चरण में हर हाल में दो स्पिनर रखे जाएंगे.

बहरहाल, लगता है कि किसी ने भी उनके ख़राब फ़ॉर्म पर उस तरह ध्यान नहीं दिया जैसे युवराज की खराब बल्लेबाज़ी पर नज़र डाली गई.

भारतीयों को लेकर पूर्वाग्रह

यह एक आम धारणा है कि अगर कोई भारतीय खिलाड़ी असफल होता है तब इसका मतलब कि वह या तो खराब खेल रहा है या फिर वह टीम भावना नहीं दिखा रहा है.

लेकिन अगर कोई विदेशी खिलाड़ी असफल होता है तो इसे महज खराब फॉर्म भर ही माना जाता है.

कोच, चयनकर्ताओं और प्रशासनिक अधिकारियों पर भी यही लागू होता है.

हमेशा से ही यह माना जाता है कि भारतीय कोच, चयनकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी अपने क्लब, स्टेट या ज़ोनल खिलाड़ियों का पक्ष लेंगे लेकिन विदेशी कोच, चयनकर्ता और अधिकारी ऐसा नहीं करेंगे.

विदेशी कप्तानों, कोच की ओर से लाए गए सभी लोगों पर नजर डालें तो देखेंगे कि कोई बड़ा अंतर नहीं है.

राजस्थान रॉयल्स के ज्यादातर विदेशी खिलाड़ी विक्टोरिया या हैम्शायर से हैं जहां से वार्न खेलते थे.

गिलक्रिस्ट

खतरनाक पिचों पर भी गिलक्रिस्ट ने अपनी बल्लेबाजी क्रम को नीचे नहीं किया

सही बात तो यह है कि लोग उनको लेकर ज्यादा सुविधाजनक होते हैं जिनको वे या तो जानते हैं या देख चुके होते हैं. राजस्थान रॉयल्स के लिए 40 वर्षीय डैमियन मार्टिन के चयन पर किसी ने भी क्या सवाल उठाया?

क्या कोई अन्य भारतीय खिलाड़ी तीन या चार साल तक प्रथम श्रेणी का क्रिकेट खेलने के बाद मार्टिन की उम्र में पहुंचने के बाद लिया जाएगा?

कप्तानों को कोच के रूप में अपना दोस्त मिल गया है, जबकि कोच को सपोर्ट स्टॉफ के रूप में दोस्त मिल गया है.

इसमें कुछ भी गलत नहीं है. यह महज एक सुविधा का मामला भर है कि आप जिन्हें जानते हैं या जिनमें आपका भरोसा है, उनके साथ काम करने में सुविधा महसूस करते हैं.

लेकिन कल्पना करें कि अगर कोई भारतीय ऐसा करे?

उस पर भाई भतीजावाद, संकीर्णतावाद और न जाने क्या-क्या आरोप लग जाएंगे.

भारतीय क्रिकेट को लाभ पहुंचाएं

बंगलौर की राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी हर साल कोच, ट्रेनर और फिजियो तैयार करती है.

लेकिन उनमें से किसी को भी आईपीएल का हिस्सा बनने का मौका नहीं मिलता है यहां तक कि असिस्टेंट के तौर पर भी.

यह इंडियन प्रीमियर लीग है. अगर यहां पर योग्य भारतीय कोच, ट्रेनर और फिजियो को सीखने और अपने कौशल को दिखाने का मौका नहीं मिलेगा तो फिर किसे मिलेगा?

एक क्षण के लिए भी मैं ये सुझाव नहीं दे रहा हूं कि इस काम के लिए सिर्फ़ भारतीय ही लिए जाने चाहिए. यह शायद काफी अच्छी बात होगी कि राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी से निकलने वाले हर ग्रैजुएट को दुनिया के इन जाने माने खिलाड़ियों के साथ काम करने और सीखने का मौका दिया जाए.

विदेशों से सहायक कोच लेने के बजाय ऐसा करने से क्या भारतीय क्रिकेट को ज्यादा फायदा नहीं पहुंचेगा?

अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि क्लबों को भी अपना पैसा बचाने में मदद मिलेगी.

हरभजन सिंह

गावस्कर मानते हैं कि भारतीय टीम की गेंदबाजी में विविधता है

क्रिकेट का ट्वेंटी-20 संस्करण लगातार मजबूती की ओर बढ़ रहा है. और अब आईपीएल खत्म हो चुका है और आईसीसी का ट्वेंटी-20 विश्व कप शुरू हो चुका है. भारत ने उद्घाटन मैच जीत लिया है और पाकिस्तान ने अगला मैच जीत लिया.

दोनों देशों की टीमों की गेंदबाजी में विविधता है और बैटिंग में गहराई है. और इसी वजह से इन टीमों को ये टूर्नामेंट जीतने में मदद मिली है.

पाकिस्तानी टीम खतरनाक

पाकिस्तान लगातार दो बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंच चुका है. इससे जाहिर होता है कि क्रिकेट के इस संस्करण में वे एक तरह से कितने खतरनाक हैं.

उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात है उनकी टीम में ऑलराउंडरों की मौजूदगी. वे इस टूर्नामेंट में काफ़ी तरोताज़ा आए हैं लेकिन कुछ विवादों और अपने कुछ खास खिलाड़ियों पर प्रतिबंध के बोझ के साथ भी.

लेकिन फिर भी कोई मूर्ख ही पाकिस्तान को हल्का आंकने की गलती करेगा.

सबसे ज़्यादा रोचक टीम होगी अफ़गानिस्तान की और उनपर बहुतों की नज़र होगी. भारत और दक्षिण अफ्रीका का ग्रुप सबसे तगड़ा है और वहां का प्रदर्शन काफ़ी हद तक उनके भविष्य की नींव रखेगा. अगर वो अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो उनको अधिक स्पांसर मिलेंगे और इससे उनके क्रिकेट को आगे ले जाने में मदद मिलेगी. लेकिन अगर उनका प्रदर्शन खराब रहता है तो वो तब तक के लिए भुला दिए जाएंगे जबतक कि वो दुबारा क्वालिफाई न कर लें.

आस्ट्रेलिया की टीम हमेशा की ही तरह एक खतरनाक टीम होगी. चूंकि यही एक ट्राफी अभी तक उनके खाते में नहीं आई है. सो, वे इसे हासिल करने के लिए जी जान लगा देंगे.

घरेलू मैदान पर वेस्टइंडीज की टीम भी खतरनाक साबित हो सकती है और अगर गेल चल जाते हैं तो कुछ भी संभव है और जिस तरह से पोलार्ड ने हाल में हुए आईपीएल में प्रदर्शन किया, उसको देखते हुए कुछ भी उलटफेर हो सकता है.

कैरेबियाई द्वीप मेरे लिए पसंदीदा जगहों में से एक रहा है और काफ़ी समय से मैं मैं वहां नहीं गया हूं.

इस बार 15 मई को सर गैरी सोबर्स को नाइट की उपाधि मिलने की 35वीं वर्षगांठ है और इस मौके पर होनेवाले समारोह में वेस हाल, इयान चैपल और ब्रायन लारा की मौजूदगी रात को यादगार बना देगी.

(प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट ग्रुप के सौजन्य से)

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