विजेंदर सिंह और राजीव शुक्ला की यादें

विश्व कप 2010 दक्षिण अफ़्रीका में हो रहा है. विश्व कप फ़ुटबॉल का इतिहास बहुत पुराना है. हमने इस साल के विश्व कप के मद्देनज़र कुछ चर्चित चेहरों से विश्व कप से जुड़ी उनकी यादों को टटोलने की कोशिश है.

इसी कड़ी में राज्यसभा सांसद और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला और मुक़्क़ेबाज़ विजेंदर सिंह अपनी यादें हमसे बाँट रहे हैं.

राजीव शुक्ला (राज्य सभा सांसद और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष)

Image caption राजीव शुक्ला राज्यसभा के सांसद, पत्रकार और बीसीसीआई के प्रवक्ता और उपाध्यक्ष हैं.

फ़ुटबॉल निश्चित तौर पर विश्व का नंबर एक खेल है. लगभग पूरी दुनिया में खेला जाता है, जबकि क्रिकेट केवल 14 देशों में ही खेली जाती है ऐसे में फ़ुटबॉल का महत्व बहुत ही अधिक है.

दुर्भाग्य से भारत में फ़ुटबॉल को लेकर कभी कोई जुनून नहीं बन पाया. तीन साल ऐसे ही गुज़र जाता है और जब चौथे साल विश्वकप के दिन नज़दीक आते हैं तो लोगों में इसे लेकर सुगबुगाहट शुरू होती है और टेलीविज़न पर लोग इसके मैच का मज़ा लेते हैं.

भारत में घेरेलू स्तर पर फ़ुटबॉल पश्चिम बंगाल और गोवा तक ही सीमित है. मैं समझता हूं कि भारत में फ़ुटबॉल को आगे बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए कोशिश करने की ज़रूरत है. हम लोग (क्रिकेट से जुड़े लोग) फ़ुटबॉल को बढ़ाने के लिए सेवाएं देने के लिए तैयार हैं और बीसीसीआई ने फ़ुटबॉल के विकास के लिए 25 करोड़ रुपए दिए भी हैं.

मैं पिछले 20 साल से विश्वकप फ़ुटबॉल के मैच देख रहा हूं. वैसे मैंने विश्वकप के मैच कभी मैदान पर नहीं देखे हैं, लेकिन इस बार फ़ाइनल मुक़ाबला देखने के लिए दक्षिण अफ़्रीक़ा जा रहा हूं.

पहले मेरी पसंदीदा टीम अर्जेंटीना हुआ करती थी लेकिन पिछले विश्वकप में मैंने जो खेल देखें उसके बाद पुर्तगाल के खिलाड़ियों का खेल मुझे काफ़ी पसंद आया. स्पेन और जर्मनी की टीमें अच्छी हैं. वैसे जैसे जैसे खेल आगे जाएगा और जो टीम अच्छा खेलेगी भारतीयों की पसंदीदा टीमों में उसी तरह से परिवर्तन होता रहेगा.

फ़ुटबॉल क्रिकेट से अलग है और इसमें काफ़ी ऊर्जा है. जिस खेल में जितनी ऊर्जा होती है लोग उसे उतनी ही पसंद करते हैं. लेकिन क्रिकेट के टी-20 फ़ॉर्मेट ने क्रिकेट में फ़ुटबॉल जैसी ऊर्जा पैदा की है और यही कारण है कि भारत में लोगों को टी-20 काफ़ी पसंद है.

मुझे पूरा विश्वास है कि अगर भारत की फ़ुटबॉल टीम पर ध्यान दिया जाए तो यह अच्छा करेगी और कम से कम क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुंच ही सकती है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करने की ज़रूरत है.

मैं समझता हूं कि आने वाले दिनों में भारत में फ़ुटबॉल के विकास पर ध्यान दिया जाएगा.

विजेंदर सिंह (मुक़्क़ेबाज़)

Image caption विजेंदर सिहं 75 किलोग्राम वर्ग में दुनिया के नंबर एक मुक्केबाज़ हैं

फ़ुटबॉल से भी मेरा काफ़ी लगाव है. इस बात का अंदाज़ा इससे ही लगाया जा सकता है कि प्रत्येक शुक्रवार को हम लोगों की एक मॉर्निंग सेशन होती है जिसमें हम लोग मुक़्क़ेबाज़ी को छोड़कर दूसरा खेल खेलते हैं और इस सेशन में हम लोग अधिकतर फ़ुटबॉल ही खेलते हैं.

वर्ष 2006 के विश्वकप के दौरान ज़िनेदिन ज़िदान का इटली के खिलाड़ी मैतरात्सी को सिर से धक्का मारना मुझे याद है. वो फ़ाइनल मुक़ाबला था लेकिन बाद में जिस तरह से ज़िनेदान ज़िदान ने साथी खिलाड़ी पर जैसा आरोप लगाया उससे मुझे मायूसी हुई. लेकिन कुल मिलाकर मुक़ाबला काफ़ी अच्छा था.

मेरी पसंदीदा टीम इटली है क्योंकि उस देश में मैंने मेडल जीता है. मेरी दुआ है कि भारत जल्दी से फ़ुटबॉल विश्वकप के लिए क्वालीफ़ाई करे ताकि मैं अपने देश की टीम को अपनी पसंदीदा टीम बना सकूं.

मैंने इटली के लोगों के बीच फ़ुटबॉल के प्रति काफ़ी लगाव देखा. इटली में लोग फ़ुटबॉलरों को वैसा ही प्यार देते हैं जैसा भारत में लोग क्रिकेटरों से प्यार करते हैं.

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